स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और प्रशासनिक लापरवाही के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। मध्य प्रदेश के बहुचर्चित छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड, जिसमें मासूम बच्चों की जान चली गई थी, उससे जुड़े एक बेहद संवेदनशील घटनाक्रम में बड़ा मोड़ आया है। इस भीषण त्रासदी के बाद कार्रवाई के तौर पर निलंबित किए गए दो ड्रग इंस्पेक्टरों को महज 11 महीने के भीतर ही दोबारा सेवा में बहाल कर दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में न केवल विभागीय जांच अभी जारी है, बल्कि शासन स्तर पर पूर्व अनुमति लेने के नियमों को भी दरकिनार किए जाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।
कफ सिरप कांड: जब 26 मासूमों ने गंवाई थी जान
यह पूरा मामला उस हृदयविदारक घटना से जुड़ा है जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। छिंदवाड़ा में जहरीले कफ सिरप के सेवन के बाद कुल 26 बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई थी। इस बड़ी स्वास्थ्य त्रासदी के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े हुए थे। लापरवाही के आरोपों के चलते कड़े कदम उठाते हुए 6 अक्टूबर 2025 को दो प्रमुख अधिकारियों—गौरव शर्मा और शरद कुमार जैन—को निलंबित कर दिया गया था।
जनता की नजरों में यह कार्रवाई सिस्टम की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक कदम थी, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने पीड़ित परिवारों के जख्मों पर जैसे नमक छिड़क दिया है। जिन अधिकारियों पर इस त्रासदी के दौरान अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन में कोताही बरतने का शक था, उनका यूं अचानक बहाल होना कई अनसुने सवालों को जन्म दे रहा है।
बिना शासन की अनुमति के कैसे हुई बहाली?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, निलंबित चल रहे गौरव शर्मा और शरद कुमार जैन के खिलाफ 19 फरवरी 2026 से औपचारिक विभागीय जांच शुरू की गई थी। इन अधिकारियों से जवाब तलब किए गए थे, जो शुरुआती स्तर पर संतोषजनक नहीं पाए गए थे। बावजूद इसके, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की संयुक्त नियंत्रक टीना यादव के हस्ताक्षर से 23 सितंबर को दोनों अधिकारियों की बहाली के आदेश जारी कर दिए गए।
सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि इतनी बड़ी और गंभीर घटना से जुड़े अधिकारियों की बहाली से पहले क्या शासन या उच्च स्तर पर कोई औपचारिक अनुमति ली गई थी? शुरुआती पड़ताल में यह बात सामने आई है कि इस मामले में शासन की पूर्व सहमति या अनुमति नहीं ली गई थी, जो प्रशासनिक नियमों के लिहाज से एक बहुत बड़ा विचलन माना जा रहा है।
नई पदस्थापना ने खड़े किए और भी बड़े सवाल
सिर्फ बहाली ही नहीं, बल्कि इन दोनों अधिकारियों को दी गई नई पदस्थापना की जगहों ने भी प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। आदेशों के मुताबिक:
- गौरव शर्मा: इन्हें छिंदवाड़ा से हटाकर गुना में उप संचालक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन के पद पर भेजा गया है।
- शरद कुमार जैन: इन्हें सीधे जबलपुर में उप संचालक के पद पर पदस्थ किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि वे पहले भी इसी शहर में पदस्थ रह चुके हैं।
जांच की आंच झेल रहे अधिकारी को दोबारा उसी या संवेदनशील क्षेत्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपे जाने पर अब विशेषज्ञ भी सवाल उठा रहे हैं कि आखिर किस आधार पर यह निर्णय लिया गया है।
स्वास्थ्य राज्यमंत्री ने लिया कड़ा संज्ञान, दिए जांच के निर्देश
जब यह पूरा मामला मीडिया और शासन के ऊपरी स्तर तक पहुंचा, तो हड़कंप मच गया। स्वास्थ्य राज्यमंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल ने इस पूरी प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि शासन की सहमति के बिना औषधि निरीक्षकों की बहाली किए जाने का यह मामला उनके संज्ञान में आया है, जो कि अत्यंत गंभीर है।
मंत्री ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए उच्चाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही, इस पूरी प्रक्रिया में संलिप्त और बिना अनुमति के आदेश जारी करने वाले संबंधित जिम्मेदार लोगों को कारण बताओ नोटिस जारी करने के भी निर्देश दिए गए हैं।
मुख्य आरोपी की जमानत हो चुकी है खारिज
एक तरफ जहां प्रशासनिक स्तर पर इन अधिकारियों की वापसी से भूचाल आया हुआ है, वहीं दूसरी तरफ इस कांड के मुख्य आरोपी डॉक्टर प्रवीण सोनी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। अदालत में सुनवाई के दौरान मुख्य आरोपी डॉ. प्रवीण सोनी की जमानत याचिका हाईकोर्ट द्वारा पहले ही खारिज की जा चुकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब एक तरफ स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और विभागीय जांच अभी किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है, तब मुख्य जांच के दायरे में आने वाले अधिकारियों को इस तरह क्लीन चिट जैसा लाभ मिलना न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
तीसरे अधिकारी की फाइल भी पहुंची शासन के पास
विवादों का यह सिलसिला यहीं थमता नजर नहीं आ रहा है। इस दर्दनाक कफ सिरप कांड के बाद कुल तीन अधिकारियों पर गाज गिरी थी। दो अधिकारियों की बहाली के बाद अब तीसरे अधिकारी यानी डिप्टी ड्रग कंट्रोलर शोभित कोष्ठा की बहाली की फाइल भी शासन के पास पहुंचने की पुख्ता जानकारी सामने आ रही है।
सामने आए प्रस्ताव के अनुसार, उन्हें भी बहाल कर दोबारा मुख्यालय में पदस्थ करने की तैयारी चल रही है। यदि ऐसा होता है, तो यह मामला और अधिक तूल पकड़ सकता है, क्योंकि एक तरफ जहां बच्चों की मौत के मामलों में इंसाफ की गुहार लगाई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक अमले में इस तरह की बहाली चर्चा का विषय बनी हुई है।
भविष्य में क्या होगी कार्रवाई?
छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड का यह नया अध्याय यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही तय करना इतना आसान नहीं है? आने वाले दिनों में स्वास्थ्य विभाग द्वारा इस मामले में क्या कदम उठाए जाते हैं और मंत्री के निर्देशों के बाद किन अधिकारियों पर गाज गिरती है, यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल, इस पूरी घटना ने एक बार फिर से स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।