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धर्म और राष्ट्र पर मोहन भागवत का बड़ा बयान, कहा- एक-दूसरे से अलग नहीं

धर्म और राष्ट्र पर मोहन भागवत का बड़ा बयान, कहा- एक-दूसरे से अलग नहीं

वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया तमाम तरह के भू-राजनीतिक संघर्षों, वैचारिक मतभेदों और चरमपंथ की चुनौतियों से जूझ रही है, तब मानवता की निगाहें भारत की तरफ टिकी हुई हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने मुंबई के बोरिवली में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के दौरान कहा कि भारत की प्राचीन और समृद्ध ज्ञान परंपरा में आज की वैश्विक समस्याओं का समाधान देने की पूरी क्षमता है।

बोरिवली में आयोजित 'आल इंडिया विहार सेवा ग्रुप' के 14वें अधिवेशन को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख ने राष्ट्र और धर्म के आपसी संबंधों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उनके इस बयान ने देश के वैचारिक गलियारों में एक बार फिर से इस बात को लेकर बहस छेड़ दी है कि आधुनिक दौर में प्राचीन मूल्यों का क्या महत्व है।

धर्म और राष्ट्र: एक ही सिक्के के दो पहलू

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में बहुत स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया कि धर्म और राष्ट्र को कभी भी एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य ही धर्म है और यही धर्म उस राष्ट्र को जीवंत बनाए रखता है। दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर करता है।

इस भव्य कार्यक्रम में जैन युवाओं के साथ-साथ देश के कई जाने-माने संत और आध्यात्मिक गुरु उपस्थित रहे। मंच पर पद्मभूषण परम पूज्य आचार्य श्रीमद् विजय रत्नसुंदरसूरि महाराज, आचार्य महाबोधी सूरीश्वरजी समेत कई गणमान्य हस्तियों की मौजूदगी ने इस आयोजन के आध्यात्मिक महत्व को और अधिक बढ़ा दिया।

भारत की ज्ञान परंपरा का अनूठा इतिहास

आरएसएस प्रमुख ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भारत ने कभी भी अपनी संस्कृति या ज्ञान का प्रसार करने के लिए तलवार का सहारा नहीं लिया। हमने कभी दूसरे देशों पर आक्रमण नहीं किया और न ही कभी बलपूर्वक किसी का मतांतरण कराया।

उन्होंने गर्व के साथ कहा कि भारत ने हमेशा 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना के साथ पूरी दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाया है और ज्ञान साझा किया है। यही हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी और विशिष्ट पहचान है जो हमें दुनिया के दूसरे देशों से अलग करती है।

महान ग्रंथ और मानवता का मार्गदर्शन

देश के प्राचीन ग्रंथों की महत्ता बताते हुए भागवत ने कहा कि हमारे पास वेदों, उपनिषदों, महाकाव्यों (रामायण और महाभारत) के साथ-साथ भगवद्गीता, जैन आगम, बौद्ध धर्म के त्रिपिटक और सिखों के पवित्र ग्रंथ 'श्री गुरु ग्रंथ साहिब' जैसी अमूल्य धरोहरें हैं। इन सभी महान ग्रंथों में पूरी मानवता के मार्गदर्शन की अद्भुत क्षमता समाहित है।

  • वेद और उपनिषद देते हैं जीवन का सार
  • जैन आगम और त्रिपिटक से मिलती है अहिंसा की सीख
  • गुरु ग्रंथ साहिब और संतों की वाणी सिखाती है सेवाभाव

उन्होंने यह भी जोड़ा कि केवल इन ग्रंथों को पढ़ना काफी नहीं है, बल्कि इनसे मिलने वाली शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारना होगा। संतों की शिक्षाएं हमें हमेशा मानव कल्याण, सामाजिक समरसता और निस्वार्थ सेवा का संदेश देती हैं।

ज्ञान संपदा का संरक्षण: हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

डॉ. भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की इस महान ज्ञान संपदा को सहेज कर रखना और आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाना केवल किसी एक धर्म या वर्ग का दायित्व नहीं है। यह हम सबकी, यानी पूरी मानवता की सामूहिक जिम्मेदारी है।

यदि हमें एक सुरक्षित, सुसंस्कृत और कल्याणकारी समाज का निर्माण करना है, तो हमें अपनी संत परंपरा और सेवाभाव की प्रवृत्ति को हर हाल में मजबूत करना होगा। समाज में जब तक सेवा और संस्कार जीवित रहेंगे, तब तक किसी भी बाहरी या भीतरी चुनौती से निपटा जा सकता है।

संस्कृति बचेगी तभी राष्ट्र सुरक्षित रहेगा: आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरि

समारोह को संबोधित करते हुए प्रख्यात जैन संत पद्मभूषण आचार्य श्रीमद् विजय रत्नसुंदरसूरि महाराज ने बेहद सारगर्भित बात कही। उन्होंने आगाह किया कि यदि किसी देश या समाज की संस्कृति नष्ट हो जाती है, तो उस देश को पतन की ओर जाने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।

उन्होंने संस्कारों के महत्व को समझाते हुए कहा कि संस्कृति का संरक्षण केवल संस्कारों के जरिए ही संभव है। उनका यह कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा कि "राष्ट्र बचेगा तो धर्म बचेगा और धर्म बचेगा तो समाज पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।"

आचार्यश्री ने राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करने और इस दिशा में आरएसएस जैसे संगठनों के साथ मिलकर काम करने की बात पर भी जोर दिया।

आनंद यात्रा- अठारह कर्तव्य पुस्तक का विमोचन

इस विशेष आयोजन का एक अन्य मुख्य आकर्षण आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरि महाराज की नई पुस्तक का विमोचन रहा। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अपने कर-कमलों से आचार्यश्री की 536वीं पुस्तक ‘आनंद यात्रा- अठारह कर्तव्य’ का विमोचन किया।

बता दें कि आचार्य महाराज अब तक अपने लेखन के जरिए 500 से अधिक पुस्तकें समाज को समर्पित कर चुके हैं, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक साहित्यिक और आध्यात्मिक उपलब्धि है।

आल इंडिया विहार सेवा Group का सराहनीय कार्य

यह पूरा आयोजन जिस संस्था के बैनर तले हुआ, वह है 'आल इंडिया विहार सेवा ग्रुप'। यह संगठन पिछले कई वर्षों से देशभर में पैदल विहार करने वाले जैन साधु-साध्वियों की यात्राओं को सुगम, सुरक्षित और दुर्घटनामुक्त बनाने में लगातार सहयोग करता आ रहा है। आधुनिक व्यस्तता के दौर में संतों की पैदल यात्राओं को सुरक्षित बनाने का यह कार्य समाज में सेवा और समर्पण की मिसाल पेश करता है।

इस अधिवेशन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ें जितनी गहरी हैं, संकट के समय वे उतनी ही मजबूत ढाल बनकर पूरी मानवता को दिशा दिखाने का कार्य करती हैं।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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