नागपुर के जरीपटका थाने में भ्रष्टाचार के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) द्वारा बिछाया गया एक जाल इन दिनों प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है। यह मामला किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, जिसमें रिश्वतखोरी, पुलिसिया पैंतरेबाजी, अचानक आया मिर्गी का दौरा और सबसे अहम बात—रिश्वत की रकम का रहस्यमयी तरीके से गायब हो जाना शामिल है। कानून के रखवाले ही जब कानून से खेलने लगें, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। आइए जानते हैं कि इस सनसनीखेज मामले की परतें क्या कहती हैं और इसके पीछे की पूरी सच्चाई क्या है।
एनसी मामले के नाम पर शुरू हुआ डराने का खेल
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत एक मामूली पारिवारिक विवाद से हुई थी। एक 23 वर्षीय युवक के खिलाफ उसके ही एक रिश्तेदार ने जरीपटका पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने युवक के खिलाफ अदखलपात्र यानी एनसी (NC) मामला दर्ज कर लिया। कागजों पर यह एक साधारण मामला दिख रहा था, लेकिन थाने की चारदीवारी के भीतर कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी।
इस मामले की जांच का जिम्मा हेडकांस्टेबल सचिन मानिकराव तायडे (48) को सौंपा गया था। तायडे और उसके साथी कांस्टेबल मनीष उत्तम मेश्राम (30) ने इस एनसी मामले को हथियार बना लिया। उन्होंने युवक को बुरी तरह डराना शुरू कर दिया। उसे यह कहकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा कि उसके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं और उच्चाधिकारियों के सख्त निर्देश हैं कि उसे तुरंत सलाखों के पीछे भेजा जाए। युवक डर गया और यहीं से शुरू हुई सौदेबाजी।
20 हजार रुपये में तय हुआ सौदा और फिर रचा गया जाल
युवक को कानूनी शिकंजे से बाहर निकालने और 'सहयोग' करने के एवज में खाकी वर्दी वाले इन नुमाइंदों ने शुरुआत में 40,000 रुपये की मांग की। हालांकि, काफी मोलभाव के बाद आखिरकार मामला 20,000 रुपये पर तय हुआ। लेकिन वह युवा अंदर ही अंदर घुट रहा था और इस अवैध वसूली के खिलाफ उसने हिम्मत जुटाते हुए एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) का दरवाजा खटखटाया।
एसीबी ने योजना के मुताबिक पूरी औपचारिकताएं पूरी करते हुए रिश्वत की मांग का सत्यापन (Verification) किया। इसके बाद एसीबी की टीम ने एक सटीक जाल बिछाया। तय योजना के अनुसार, फरियादी युवक जरीपटका थाने पहुंचा और हेडकांस्टेबल सचिन तायडे को पैसे देने की बात कही। तायडे ने शातिर तरीके से युवक से कहा कि वह रुपये अपनी मेज पर रख दे और सामान्य बातचीत करता रहे ताकि किसी को शक न हो।
अखबार में लिपटे नोट और पलक झपकते ही गायब हुई रकम
एसीबी के निर्देशों के मुताबिक, फरियादी को पैसे देने के तुरंत बाद बाहर आकर टीम को इशारा करना था। जैसे ही युवक ने पैसे मेज पर रखे, उसके ठीक दो मिनट बाद सचिन तायडे ने अपनी टेबल पर रखे एक अखबार के टुकड़े से उन रुपयों को उठाया, अपनी जेब में डाला और तेजी से नीचे की ओर चला गया।
फरियादी का इशारा मिलते ही एसीबी की टीम ने तायडे के कक्ष पर धावा बोल दिया। तायडे को तुरंत दबोच लिया गया, लेकिन यहीं पर कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट आ गया। जब एसीबी के अधिकारियों ने तायडे की तलाशी ली, तो उनके होश उड़ गए—रिश्वत की वह रकम उसकी जेब या पास से गायब मिल चुकी थी। पलभर में पैसे हवा हो चुके थे।
साथी सिपाही का 'मिर्गी का ड्रामा' और अस्पताल से फरार
मामले का दूसरा मुख्य आरोपी कांस्टेबल मनीष मेश्राम भी उसी थाने में मौजूद था। जैसे ही उसने देखा कि उसके साथी सचिन तायडे को एसीबी ने पकड़ लिया है, उसने अचानक नाटक शुरू कर दिया। मनीष मेश्राम को अचानक तेज 'मिर्गी के दौरे' (Seizures) आने लगे। उसकी हालत देखकर ऐसा लगा कि उसकी जान खतरे में है।
मानवीय दृष्टिकोण और चिकित्सीय आपातकाल को देखते हुए उसे तुरंत इलाज के लिए अस्पताल रवाना किया गया। लेकिन, यह अस्पताल पहुंचना केवल एक बहाना साबित हुआ। मौका मिलते ही शातिर मेश्राम पुलिस और एसीबी को चकमा देकर अस्पताल से फरार हो गया। इसके बाद से वह एसीबी की पकड़ से कोसों दूर है और उसने बाद में अदालत से अंतरिम जमानत भी हासिल कर ली।
कानूनी पेच और बेबस होता फरियादी
एसीबी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सचिन तायडे से गायब हुई रिश्वत की रकम को बरामद करना थी। अदालत में पेश करने के बाद एसीबी को पहले 5 दिन और फिर 2 दिन की कस्टडी यानी कुल 7 दिन की रिमांड मिली। लेकिन सचिन तायडे खुद एक पुलिसकर्मी होने के नाते कानून के सारे पैंतरे और खामियां अच्छी तरह जानता था। उसने पूरी रिमांड के दौरान पूछताछ में सहयोग नहीं किया और मुंह नहीं खोला।
अब स्थिति यह है कि न तो रिश्वत के नोट बरामद हुए और न ही दूसरा आरोपी मनीष मेश्राम हाथ आया। ऐसे में आने वाले दिनों में कोर्ट में इस मामले को साबित करना अभियोजन पक्ष के लिए एक टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।
अकेला पड़ गया शिकायतकर्ता, सता रहा है डर
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे डरावना पहलू यह है कि न्याय की लड़ाई लड़ने वाला वह युवा अब पूरी तरह अकेला पड़ गया है। जब 16 सितंबर को यह ट्रैप हुआ था, तब स्थानीय नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और तमाम लोग उस फरियादी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। लेकिन जैसे ही मामला गोलमाल हुआ और कानूनी पेचीदगियां सामने आईं, सभी ने उससे दूरी बना ली।
अरे-सरे अकेले छूट चुके इस युवक के मन में अब एक गहरा डर बैठ गया है। उसे आशंका है कि सचिन तायडे और मनीष मेश्राम कल को सेवा में वापस लौटेंगे और उससे बदला लेंगे। उसे झूठे मामलों में फंसाए जाने और अपनी जान का खतरा सता रहा है। समाज के ठेकेदारों द्वारा यूं बीच मझधार में छोड़ दिए जाने से आम आदमी का सिस्टम से भरोसा उठने लगा है।
एसीबी का पक्ष: 'घबराने की जरूरत नहीं, हम साथ हैं'
इस पूरे सनसनीखेज प्रकरण पर जब नागपुर एंटी करप्शन ब्यूरो के एसपी दिगांबर प्रधान से बात की गई, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मामले की जांच बेहद गंभीरता से चल रही है। उन्होंने स्वीकार किया कि रिश्वत की रकम अभी तक बरामद नहीं हो पाई है क्योंकि आरोपी पुलिसकर्मी ने जांच में कोई सहयोग नहीं किया है।
एसपी दिगांबर प्रधान ने आगे कहा कि सचिन तायडे के खिलाफ विभागीय रिपोर्ट सिटी पुलिस को भेजी जा रही है। साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया है कि एसीबी पूरी मजबूती के साथ फरियादी के साथ खड़ी है। उसे किसी भी प्रकार से डरने या घबराने की आवश्यकता नहीं है।
निष्कर्ष
जरीपटका थाने की यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब खाकी ही दागदार हो जाए और कानून के रखवाले ही सबूतों को गायब करने के माहिर खिलाड़ी बन जाएं, तो एक आम नागरिक का न्याय व्यवस्था पर से विश्वास कैसे टिकेगा। अदालत में यह मामला किस करवट बैठता है और क्या गायब हुए पैसे कभी बरामद हो पाते हैं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इस घटना ने नागपुर पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर एक गहरा दाग जरूर छोड़ दिया है।