उत्तर प्रदेश का औद्योगिक हब कहे जाने वाला कानपुर इन दिनों एक गंभीर और चिंताजनक दौर से गुजर रहा है। कभी अपनी ऐतिहासिक और व्यावसायिक पहचान के लिए जाना जाने वाला यह शहर आज बुनियादी सुविधाओं के आभाव और प्रशासनिक लापरवाही का शिकार बनता जा रहा है। स्थिति यह है कि शहर की सड़कों पर चलना और हवा में सांस लेना दोनों ही नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। सोशल मीडिया पर कानपुर की जर्जर सड़कों और बड़े-बड़े गड्ढों की तस्वीरें लगातार वायरल हो रही हैं, जिन पर तरह-तरह के मजाक बनाए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद दर्दनाक है।
जहरीली हवा और उड़ती धूल से सांस लेना हुआ दूभर
कानपुर की आबोहवा पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। उखड़ी और खुदी हुई सड़कों के कारण वाहनों के चलने से जो धूल उड़ती है, उसने पूरे शहर के वायु प्रदूषण स्तर को खतरनाक सीमा तक बढ़ा दिया है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि स्थानीय नागरिकों को सांस लेने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। बुजुर्गों, बच्चों और अस्थमा के मरीजों के लिए घर से बाहर निकलना भी जोखिम भरा हो गया है। इसके अलावा, जगह-जगह फैला कचरा और गंदगी इस पर्यावरणीय संकट को और अधिक गहरा कर रहे हैं।
वायु स्वच्छता रैंकिंग में भारी गिरावट
पर्यावरण और वायु गुणवत्ता सूचकांक के मोर्चे पर भी कानपुर लगातार पिछड़ता जा रहा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, वायु स्वच्छता रैंकिंग में जो शहर पिछले साल पांचवें पायदान पर काबिज था, वह अब लुढ़ककर सीधे 11वें स्थान पर पहुंच गया है। यह गिरावट इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि शहर की हवा को सुधारने के लिए जो ठोस कदम उठाए जाने चाहिए थे, वे या तो कागजों तक सीमित रह गए या उनका क्रियान्वयन पूरी तरह से विफल साबित हुआ है।
स्मार्ट सिटी का तमगा और बदहाल जमीनी हकीकत
एक तरफ कानपुर को 'स्मार्ट सिटी' की सूची में शामिल किया गया है, वहीं दूसरी तरफ शहर की सड़कों और बुनियादी ढांचे की हालत इस दावे की पोल खोलती नजर आती है। शहरवासी यह सवाल पूछने पर मजबूर हैं कि आखिर स्मार्ट सिटी का यह तमगा किस काम का, जब आम जनता को हर कदम पर गड्ढों और धूल का सामना करना पड़े। सड़कों की इस बदहाली को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानों विकास के मामले में इस शहर के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा हो।
आदर्श स्वच्छ शहरों की सूची से बाहर
स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख शहरों को आदर्श स्वच्छ शहरों के रूप में चुना है। इस सूची में आगरा, अयोध्या, लखनऊ, मथुरा, प्रयागराज और वाराणसी जैसे शहरों को जगह मिली है, लेकिन विडंबना यह है कि कानपुर इस सूची से पूरी तरह नदारद है। हालांकि स्वच्छता सर्वेक्षण रैंकिंग में शहर अभी भी देश में 13वें स्थान पर होने का दावा करता है, लेकिन शहर की मौजूदा जमीनी हालत इस रैंकिंग पर सवालिया निशान खड़े करती है।
सड़कों के गड्ढे बढ़ा रहे हादसों का खतरा
शहर की टूटी-फूटी और खुदी हुई सड़कें केवल प्रदूषण का ही कारण नहीं हैं, बल्कि ये रोजाना सड़क हादसों को भी खुला निमंत्रण दे रही हैं। रात के समय स्ट्रीट लाइटों की कमी और गहरी सड़कों के गड्ढों के कारण दृश्यता (Visibility) बेहद कम हो जाती है, जिससे वाहन चालकों के लिए संतुलन बनाना असंभव सा हो जाता है। कई दोपहिया वाहन चालक इन गड्ढों की वजह से रोजाना चोटिल हो रहे हैं।
प्रशासन की चुप्पी और अधिकारियों के बयान
इस पूरे मामले पर जब जिम्मेदार अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की जाती है, तो अक्सर टालमटोल रवैया देखने को मिलता है। नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अमित सिंह ने इस विषय पर प्रतिक्रिया देते हुए बताया कि अभी उन्हें इस बाबत कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। प्रशासनिक स्तर पर इस तरह की संवेदनहीनता और लचर रवैये से शहरवासियों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
नागरिकों का स्वास्थ्य दांव पर
- श्वसन संबंधी बीमारियां: उड़ती धूल और PM 2.5 के बढ़ते स्तर के कारण फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं।
- दुर्घटनाओं में वृद्धि: गड्ढों और अंधेरे के कारण रोजाना सड़क दुर्घटनाओं के मामले सामने आ रहे हैं।
- मानसिक तनाव: खराब जीवन स्तर और बदहाल बुनियादी ढांचे के कारण आम जनता भारी मानसिक तनाव से गुजर रही है।
सुधार के लिए क्या हैं विकल्प?
यदि कानपुर को इस बदहाली से बाहर निकालना है, तो स्थानीय प्रशासन और सरकार को युद्धस्तर पर काम करना होगा। सड़कों की तत्काल मरम्मत, नियमित रूप से पानी का छिड़काव ताकि धूल न उड़े, और कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए कड़े कदम उठाने की सख्त जरूरत है। सिर्फ कागजी योजनाओं से शहर की तस्वीर नहीं बदलेगी, बल्कि इसके लिए जमीन पर उतरकर पारदर्शिता के साथ काम करना होगा, ताकि कानपुर एक बार फिर अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा और स्वच्छता को वापस पा सके।