भारतीय राजनीति में बयानों और पुरानी ऐतिहासिक घटनाओं को आधार बनाकर एक-दूसरे पर हमला बोलने का सिलसिला हमेशा से जारी रहा है। इसी कड़ी में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तेज-तर्रार सांसद निशिकांत दुबे ने एक बार फिर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। इस बार उन्होंने अपनी रणनीति के तहत साल 1969 के ऐतिहासिक 'रबात सम्मेलन' (Rabat Conference) का जिक्र किया है और कांग्रेस पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके इस बयान के बाद सियासी गलियारों में एक बार फिर से पुरानी राजनीतिक बहसों के पन्ने पलटने लगे हैं।
क्या है निशिकांत दुबे का नया संकल्प?
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने हाल ही में सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों के जरिए अपने एक अनोखे संकल्प के बारे में जानकारी दी थी। उन्होंने स्पष्ट किया था कि उन्होंने बीते 17 मार्च को एक खास संकल्प लिया था। इस संकल्प के तहत वह पूरे 365 दिनों यानी एक साल तक रोजाना देश की जनता के सामने कांग्रेस पार्टी के उन कथित गलत फैसलों और कदमों का कच्चा-चिट्ठा खोलेंगे, जो उनके अनुसार देश के हितों के खिलाफ रहे थे।
सांसद का कहना है कि उनका यह अभियान किसी राजनीतिक द्वेष के तहत नहीं, बल्कि इतिहास के उन पन्नों को जनता के सामने लाने के लिए है, जिन्हें दबा दिया गया था या जिन्हें लेकर आम नागरिकों में पर्याप्त जागरूकता नहीं है। इसी कड़ी में उन्होंने 1969 के रबात सम्मेलन की घटना को उठाया है।
1969 का रबात सम्मेलन और उसका विवाद
आखिर 1969 का रबात सम्मेलन क्या था और इसे लेकर इतना हंगामा क्यों बरपा रहता है? इतिहास के पन्नों को पलटें तो सितंबर 1969 में मोरक्को के रबात शहर में इस्लामिक देशों का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया था। यह सम्मेलन भारत के लिए कूटनीतिक रूप से एक संवेदनशील मामला बन गया था। उस समय देश की सत्ता की कमान कांग्रेस पार्टी और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों में थी।
आलोचकों और विपक्षी दलों का हमेशा से यह दावा रहा है कि उस सम्मेलन में भारत को आधिकारिक रूप से आमंत्रित किए जाने के बावजूद और बाद में अपमानजनक तरीके से हटाए जाने या अपेक्षित कूटनीतिक कदम न उठाए जाने को लेकर तत्कालीन सरकार की नीतियां कमजोर थीं। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे इसी घटना को आधार बनाकर कांग्रेस की विदेश नीति और फैसलों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
कांग्रेस पर गंभीर आरोप
निशिकांत दुबे ने अपने बयानों में आरोप लगाया है कि कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में ऐसे कई फैसले लिए गए, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति कमजोर हुई। उनका तर्क है कि इतिहास की इन भूलों के बारे में आज की युवा पीढ़ी और देश के आम नागरिकों को पूरी सच्चाई पता होनी चाहिए।
उन्होंने अपने 365 दिनों वाले अभियान के तहत हर दिन एक नई तारीख और उससे जुड़ी घटना का जिक्र करने का जो बीड़ा उठाया है, वह राजनीतिक रूप से काफी रणनीतिक माना जा रहा है। सांसद का यह प्रयास एक तरह से जनता के बीच ऐतिहासिक घटनाओं को नए सिरे से जीवित करने और अपनी वैचारिक जमीन को और मजबूत करने की एक सोची-समझी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में हलचल
निशिकांत दुबे के इन बयानों के बाद राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। हालांकि कांग्रेस पार्टी की तरफ से अभी तक इस ताजा बयान पर कोई तीखी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा दोनों दलों के बीच जुबानी जंग का एक बड़ा कारण बन सकता है।
- ऐतिहासिक बहस: 1969 के रबात सम्मेलन जैसे पुराने मुद्दों के उठने से राजनीतिक बहसों में एक बार फिर पुराना इतिहास लौट आया है।
- सांसद की रणनीति: 365 दिनों तक लगातार कांग्रेस के कथित गलत कामों को उजागर करने का संकल्प सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में छाया हुआ है।
- कूटनीतिक पहलू: भारत की विदेश नीति के इतिहास को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के अपने-अपने तर्क और दावे हैं।
निष्कर्ष
राजनीति में इतिहास का इस्तेमाल अपने पक्ष में नैरेटिव गढ़ने के लिए हमेशा से होता रहा है। निशिकांत दुबे का यह ताजा हमला उसी रणनीति का एक हिस्सा है। जहां एक ओर भाजपा इस तरह के बयानों के जरिए पुरानी सरकारों की कथित भूलों को जनता के बीच रखना चाहती है, वहीं इस तरह के मुद्दों पर बहस देश के राजनीतिक तापमान को लगातार गरमाए रखती है। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में कांग्रेस पार्टी इस पर क्या प्रतिक्रिया देती है और सांसद के इस 365 दिवसीय अभियान से राजनीति में क्या नए मोड़ आते हैं।