पहाड़ की थाप: ढोल-दमाऊ और हुड़का की गूंज से जीवंत हुई उत्तराखंड की लोक विरासत
Breaking
► अमीषा पटेल का बड़ा हमला, बोलीं- 'प्रड्यूसर के पैसों पर पलती हैं एक्ट्रेस की फौज' ► धौलपुर के महाकाल मंदिर में उमड़ी भारी भीड़, जानिए इस 100 साल पुराने मेले और अनोखी परंपरा का सच ► छत्तीसगढ़ कांग्रेस का बड़ा राजनीतिक दांव, 20 नेताओं की घर वापसी ► चीन के मछुआरों का अनोखा कारनामा: खुद के पैसों से बना डाला पहला प्राइवेट रिसर्च जहाज ► अमगांव में शासकीय भवन तोड़े जाने पर प्रशासन का बड़ा खुलासा, जानिए क्या है सच्चाई ► धमतरी में सिन्हा कलार समाज की बड़ी बैठक: आपसी विवादों का हुआ निपटारा, अंतर्जातीय विवाह पर भी चर्चा ► पुणे में शर्मनाक करतूत: खुले में शराब पीने का विरोध करने पर महिला पर चढ़ाई कार ► युवाओं को नशे के दलदल से बचाने के लिए मोहला में उठी बुलंद आवाज, दिलाई गई खास शपथ ► प्रो. रामगोपाल यादव का बड़ा हमला, बोले- प्रदेश में कानून-व्यवस्था ध्वस्त ► जयशंकर और सिसोदिया समेत कई दिग्गजों को एसआईआर मामले में नोटिस ► अमीषा पटेल का बड़ा हमला, बोलीं- 'प्रड्यूसर के पैसों पर पलती हैं एक्ट्रेस की फौज' ► धौलपुर के महाकाल मंदिर में उमड़ी भारी भीड़, जानिए इस 100 साल पुराने मेले और अनोखी परंपरा का सच ► छत्तीसगढ़ कांग्रेस का बड़ा राजनीतिक दांव, 20 नेताओं की घर वापसी ► चीन के मछुआरों का अनोखा कारनामा: खुद के पैसों से बना डाला पहला प्राइवेट रिसर्च जहाज ► अमगांव में शासकीय भवन तोड़े जाने पर प्रशासन का बड़ा खुलासा, जानिए क्या है सच्चाई ► धमतरी में सिन्हा कलार समाज की बड़ी बैठक: आपसी विवादों का हुआ निपटारा, अंतर्जातीय विवाह पर भी चर्चा ► पुणे में शर्मनाक करतूत: खुले में शराब पीने का विरोध करने पर महिला पर चढ़ाई कार ► युवाओं को नशे के दलदल से बचाने के लिए मोहला में उठी बुलंद आवाज, दिलाई गई खास शपथ ► प्रो. रामगोपाल यादव का बड़ा हमला, बोले- प्रदेश में कानून-व्यवस्था ध्वस्त ► जयशंकर और सिसोदिया समेत कई दिग्गजों को एसआईआर मामले में नोटिस

पहाड़ की थाप: ढोल-दमाऊ और हुड़का की गूंज से जीवंत हुई उत्तराखंड की लोक विरासत

पहाड़ की थाप: ढोल-दमाऊ और हुड़का की गूंज से जीवंत हुई उत्तराखंड की लोक विरासत

पहाड़ों की गोद में बसाई गई संस्कृति केवल रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी हर एक थाप में इतिहास, आध्यात्म और पीढ़ियों का संचित ज्ञान पिरोया हुआ है। उत्तराखंड की इसी सांस्कृतिक आत्मा को सहेजने और उसे नई पीढ़ी तक पूरी शुद्धता के साथ पहुंचाने के लिए हल्द्वानी के मंच पर एक अनूठा और भव्य आयोजन देखने को मिला। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के प्रांगण में गूंजी ढोल-दमाऊ और हुड़का की थापों ने हर सुनने वाले को अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए विवश कर दिया।

परंपरागत थाप और शगुन आखर के साथ हुआ भव्य आगाज

रविवार को उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के सीडीएस जनरल बिपिन रावत बहुउद्देशीय सभागार में आयोजित यह कार्यशाला किसी सामान्य सांस्कृतिक कार्यक्रम से कहीं अधिक बढ़कर थी। यह आधुनिकता की दौड़ में पीछे छूटती जा रही अपनी सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने का एक गंभीर और सार्थक प्रयास था। कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोल-दमाऊ की गूंज, दीप प्रज्ज्वलन और मंगलकारी 'शगुन आखर' के साथ किया गया।

इस अवसर पर कार्यक्रम की गरिमा को बढ़ाते हुए उपस्थित अतिथियों को स्मृति चिन्ह के रूप में ढोल-दमाऊ की लघु प्रतिकृति भेंट की गई, जो इस बात का प्रतीक थी कि किस प्रकार आयोजकों ने अपनी माटी के हर एक प्रतीक को सर्वोच्च सम्मान दिया है। सभागार का पूरा माहौल पहाड़ी संस्कृति के रंगों में रंग चुका था और हर तरफ एक अलग ही ऊर्जा का संचार हो रहा था।

सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने की जरूरत: प्रो. दुर्गेश पंत

कार्यक्रम के दौरान उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यू-कॉस्ट) के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत ने अपने विचार रखते हुए कहा कि इस तरह के आयोजन समाज में सांस्कृतिक चेतना की नींव को मजबूत करने का काम करते हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आज के डिजिटल युग में जब युवा अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, तब उन्हें अपनी लोक संस्कृति के करीब लाने के लिए ऐसे आयोजनों का सिलसिला लगातार जारी रहना चाहिए।

प्रो. पंत ने कहा कि ढोल-दमाऊ और हुड़का केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि यह उत्तराखंड के जनजीवन के ऐसे अभिन्न अंग हैं जिनके बिना यहां के संस्कार और अनुष्ठान अधूरे माने जाते हैं। नई पीढ़ी को इनकी महत्ता समझाना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है।

पीढ़ियों के अंतर को पाटने का प्रयास: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह प्रांत प्रचारक चंद्रशेखर ने शिरकत की। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर गहराई से प्रकाश डाला कि किसी भी समाज की संस्कृति और परंपराओं की निरंतरता तभी तक सुरक्षित रह सकती है, जब तक उनके मूल भाव और संस्कारों को बिना किसी मिलावट के अगली पीढ़ी को सौंपा जाए।

उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि हमें अपनी ऐतिहासिक धरोहर पर गर्व होना चाहिए। जब तक युवा अपनी संस्कृति के इन अनमोल मोतियों से भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ेंगे, तब तक हमारी लोक परंपराओं का भविष्य सुरक्षित नहीं कहा जा सकता।

डॉ. सोहन लाल और उनकी टीम की मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुतियां

कार्यशाला का सबसे आकर्षक और भावुक कर देने वाला पल वह था जब मंच पर डॉ. सोहन लाल और उनकी पूरी टीम ने ढोल-दमाऊ की लाइव प्रस्तुतियां दीं। कलाकारों ने एक-एक ताल और प्रहार के पीछे छिपे सांकेतिक महत्व को बहुत ही बारीकी से समझाया। उन्होंने बताया कि किस तरह उत्तराखंड के हर पर्व, हर धार्मिक अनुष्ठान, जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों में इन वाद्यों का विशेष और अलग स्थान होता है।

इस प्रस्तुति में एक बेहद खास बात यह देखने को मिली कि श्री मोहन लाल और उनकी टीम के साथ उनके केवल आठ वर्ष के पौत्र हितेश कुमार ने भी ढोल की थाप पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। इतनी कम उम्र के बच्चे को अपनी पारंपरिक संस्कृति में पूरी तन्मयता से भाग लेते देख पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कलाकारों ने विशेष रूप से कुमाऊंनी संस्कृति में 'जागर' जैसी अत्यंत पवित्र परंपराओं में ढोल-दमाऊ के आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

हुड़का की थाप से जीवंत हुई लोक अनुष्ठानों की गाथाएं

ढोल-दमाऊ के बाद मंच संभाला सुंदर दास और उनकी लोक कलाकारों की टीम ने, जिन्होंने पारंपरिक वाद्य 'हुड़का' की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं। हुड़का बजाने की अपनी एक विशिष्ट शैली होती है, जिसके साथ लोकगाथाएं और श्रम गीत गाए जाते हैं।

कलाकारों ने दर्शकों को बताया कि कैसे हुड़का का प्रयोग केवल उत्सवों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धार्मिक अनुष्ठानों और खेतों में की जाने वाली कृषि गतिविधियों के दौरान भी ऊर्जा का संचार करता है। इसकी हर एक थाप सुनने वाले के भीतर एक अजीब सा उत्साह भर देती है।

विश्वविद्यालय की विकास यात्रा और वृत्तचित्र का प्रदर्शन

इस भव्य सांस्कृतिक आयोजन के दौरान केवल लोक वाद्यों पर ही चर्चा नहीं हुई, बल्कि उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की शैक्षणिक और संस्थागत प्रगति को भी एक विशेष वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) के माध्यम से प्रदर्शित किया गया। इस वृत्तचित्र में विश्वविद्यालय के दूर-दराज के क्षेत्रों तक हुए विस्तार, क्षेत्रीय अध्ययन केंद्रों की कार्यप्रणाली, छात्रों के प्रवेश में आई उल्लेखनीय वृद्धि और संस्थान की संपूर्ण विकास यात्रा को बहुत ही सुंदर ढंग से दर्शाया गया।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहानी ने कलाकारों की इन जीवंत प्रस्तुतियों की भूरी-भूरी प्रशंसा की। उन्होंने सभी अतिथियों, कलाकारों और दर्शकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि, "हमारा यह निरंतर प्रयास है कि विश्वविद्यालय के हर शुभ अवसर और आधिकारिक कार्यक्रमों में उत्तराखंड की समृद्ध लोक संगीत परंपरा को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। आने वाले समय में ऐसे और भी कई बड़े सांस्कृतिक आयोजनों की रूपरेखा तैयार की जा रही है।"

समाजसेवियों और सांस्कृतिक संस्थाओं का सम्मान

अपनी माटी और उसकी कला को बचाने के लिए धरातल पर काम कर रहे लोगों का सम्मान करना इस आयोजन का एक और प्रमुख हिस्सा रहा। इस अवसर पर 'बैणी सेना' और 'साथी' जैसे कई प्रतिष्ठित संगठनों और सांस्कृतिक संस्थाओं को उनकी समाजोपयोगी और सांस्कृतिक सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में हल्둥ानी और आसपास के क्षेत्रों से आए बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक, साहित्यकार, संस्कृति प्रेमी और लोक कला के अनन्य प्रशंसक उपस्थित रहे, जिन्होंने इस पूरी कार्यशाला को एक ऐतिहासिक आयोजन बना दिया।

सफल संचालन और आयोजन टीम का योगदान

इस पूरे कार्यक्रम का बहुत ही सुंदर और सधा हुआ संयोजन एवं संचालन प्रो. राकेश चंद्र रयाल ने किया। उनके कुशल संचालन ने कार्यक्रम के प्रवाह को अंत तक बांधे रखा। इस आयोजन को सफल बनाने के पीछे 'अपनी धरोहर न्यास' की पूरी टीम का अथक परिश्रम शामिल था। न्यास के अध्यक्ष विजय भट्ट, कृष्ण चंद्र बेलवाल, गोपाल सिंह पटवाल और आयोजन समिति से जुड़े अन्य सभी सदस्यों ने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुए इस सांस्कृतिक महाकुंभ को एक मुकाम दिया।

यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि भले ही तकनीक और आधुनिकता कितनी भी आगे बढ़ जाए, लेकिन अपनी मिट्टी की खुशबू और पारंपरिक वाद्यों की गूंज हमेशा दिलों के सबसे करीब रहती है। हल्द्वानी में गूंजी ढोल-दमाऊ और हुड़का की यह थाप आने वाले लंबे समय तक लोगों के जेहन में गूंजती रहेगी और नई पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़े रखने की प्रेरणा देती रहेगी।

About the Author

रोली सिंह

रोली सिंह

Writer (स्थानीय खबरें)

रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

Read More

ज़रूर पढ़ें (You May Also Like)

अगली खबर पढ़ें:

आगे पढ़ें →