राजनीतिक पारा चढ़ा: विपक्षी दलों का चुनाव आयोग की तरफ बड़ा मार्च
देश की राजधानी दिल्ली में सियासी हलचल उस वक्त चरम पर पहुंच गई जब इंडिया ब्लॉक (INDIA bloc) के तमाम सांसद विरोध प्रदर्शन करते हुए चुनाव आयोग की तरफ मार्च निकालने लगे। इस विरोध प्रदर्शन की अगुवाई खुद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी कर रहे थे। विपक्षी दलों की मुख्य मांग मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) को रद्द करने और भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की जगह दोबारा से बैलट पेपर से चुनाव कराने की पुरजोर मांग की गई है।
संसद भवन से शुरू हुआ यह मार्च जैसे ही नीति आयोग के करीब पहुंचा, वहां पहले से तैनात भारी पुलिस बल और बैरिकेड्स ने सांसदों के काफिले को रोक दिया। पुलिस द्वारा आगे बढ़ने से रोके जाने के बाद तमाम सांसद सड़क पर ही धरने पर बैठ गए। दोपहर ढलने तक यह प्रदर्शन जारी रहा, जिसमें विपक्षी नेताओं ने सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और तीखे हमले बोले।
कमेटी की रिपोर्ट और 'वोट चोरी' के गंभीर आरोप
इस पूरे विवाद की जड़ में एक मीडिया इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट है। रिपोर्ट्स कलेक्टिव (Reporters Collective) की एक हालिया पड़ताल में यह खुलासा हुआ था कि उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मतदाता सूचियों में करीब 16.18 लाख नए मतदाताओं को जोड़ा गया है, जिनके विवरण को लेकर कई तरह के गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। इस खुलासे के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में खलबली मची हुई है।
प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी ने सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त को संबोधित करते हुए सोशल मीडिया और बयानों के जरिए कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अब बहुत हो चुका है, बेहतर होगा कि इस्तीफा दे दिया जाए। विपक्षी नेताओं का साफ तौर पर आरोप है कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है और जनता के मताधिकार पर सीधा डाका डाला जा रहा है।
मुख्य मांगें जिन पर अड़ा विपक्ष
- CEC का इस्तीफा: विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग की है।
- यूपी वोटर लिस्ट विवाद: उत्तर प्रदेश में हाल ही में जोड़े गए 16.18 लाख संदिग्ध मतदाताओं के मामले की उच्च स्तरीय जांच और पुनरीक्षण को रद्द करना।
- बैलट पेपर की वापसी: चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की बहाली के लिए ईवीएम की जगह पारंपरिक बैलट पेपर से चुनाव कराने की मांग।
सड़क से संसद तक गूंजता विरोध
प्रदर्शन स्थल पर मौजूद सांसदों हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर सरकार विरोधी नारे लगा रहे थे। उनका कहना था कि देश के संविधान और चुनावी प्रणाली के साथ खिलवाड़ किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रदर्शनकारियों का यह भी आरोप था कि सत्ता पक्ष और प्रशासनिक तंत्र मिलकर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे देश के लोकतंत्र की नींव हिल रही है।
दोपहर भर चले इस सड़क पर धरنے और प्रदर्शन के दौरान राजनीतिक दिग्गजों ने मंच से केंद्र सरकार पर तीखे जुबानी हमले किए। वक्ताओं ने कहा कि देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों और मतदान के अधिकार की रक्षा के लिए उनका यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक चुनाव आयोग पूरी तरह से निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं करता।
भविष्य की रणनीति और राजनीतिक असर
इस बड़े विरोध प्रदर्शन ने आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल को पूरी तरह से गरमा दिया है। एक तरफ जहां विपक्ष इसे जनता के अधिकारों की लड़ाई बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस मोर्चेबंदी से चुनावी सरगर्मी और तेज हो गई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह और अधिक तूल पकड़ सकता है, क्योंकि विपक्ष इस मामले पर पीछे हटने को बिल्कुल तैयार नजर नहीं आ रहा है।
फिलहाल, चुनाव आयोग और सरकार की तरफ से इस भारी विरोध और लगाए गए गंभीर आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया आती है, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम आगामी चुनावी रणनीतियों को तय करने में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।