विदेशों में रोजगार तलाशने वाले भारतीय कामगारों के लिए एक बड़ा और दूरदर्शी कदम
देश के निर्माण श्रमिकों और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की दिशा में सरकार ने एक अहम खाका तैयार किया है। मौजूदा समय में जब भारतीय युवा और कुशल श्रमिक दुनिया के विभिन्न देशों में अपनी आजीविका तलाशने के लिए रुख कर रहे हैं, तब उनके सामने आने वाली सबसे बड़ी बाधाओं में से एक भाषा की होती है। इसी चुनौती से निपटने और उन्हें वैश्विक स्तर पर सुरक्षित व सम्मानजनक रोजगार दिलाने के लिए केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण पहल की है।
हाल ही में मुंबई में आयोजित एक उच्चस्तरीय राष्ट्रीय श्रम परिषद की बैठक के दौरान, केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया ने देश के कामगारों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए एक व्यापक रोडमैप पेश किया। अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि केवल आर्थिक रूप से मजबूत करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि श्रमिकों को बदलते दौर की वैश्विक जरूरतों के हिसाब से तैयार करना भी उतना ही आवश्यक है।
सामाजिक सुरक्षा कवच के बिना अधूरा है विकास
किसी भी देश की रीढ़ वहां के श्रमिक और कामगार होते हैं। विशेषकर कंस्ट्रक्शन सेक्टर या निर्माण क्षेत्र से जुड़े मजदूरों का जीवन तमाम अनिश्चितताओं और जोखिमों से घिरा होता है। केंद्रीय मंत्री ने इसी बात पर जोर देते हुए कहा कि निर्माण मजदूरों को मजबूत सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।
- स्वास्थ्य बीमा और चिकित्सा सुविधाएं: कामगारों और उनके परिवारों को आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता।
- भविष्य निधि और पेंशन: उनके बुढ़ापे को सुरक्षित करने के लिए पारदर्शी वित्तीय योजनाएं।
- कार्यस्थल पर सुरक्षा मानक: दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कड़े नियमों का अनुपालन और आधुनिक सुरक्षा उपकरणों की अनिवार्यता।
सरकार का मानना है कि जब तक श्रमिकों को यह मानसिक शांति नहीं मिलती कि उनका और उनके परिवार का भविष्य सुरक्षित है, तब तक वे पूरी क्षमता के साथ देश के विकास में योगदान नहीं दे सकते।
विदेशी भाषाओं का प्रशिक्षण: ग्लोबल मार्केट में नई छलांग
इस पूरी योजना का सबसे दिलचस्प और क्रांतिकारी पहलू विदेशी भाषाओं का प्रशिक्षण है। आमतौर पर देखा गया है कि जब हमारे कुशल या अर्ध-कुशल श्रमिक खाड़ी देशों, यूरोप या अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं में काम करने के लिए जाते हैं, तो उन्हें स्थानीय भाषा न आने के कारण भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई बार भाषा की दीवार के कारण वे शोषण का शिकार भी हो जाते हैं या अपनी योग्यता के अनुसार सही वेतन प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
इस समस्या की जड़ तक पहुंचते हुए श्रम मंत्रालय ने अब यह निर्णय लिया है कि विदेश जाने के इच्छुक कामगारों को विशेष रूप से विदेशी भाषाओं का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके लिए विभिन्न कौशल विकास केंद्रों और प्रशिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रम में बदलाव किए जा रहे हैं।
प्रशिक्षण कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएं:
इस नई पहल के तहत कामगारों को उन प्रमुख देशों की स्थानीय भाषाओं में दक्ष बनाया जाएगा जहां भारतीय श्रमिकों की मांग सबसे अधिक है। इसमें निम्नलिखित कदम उठाए जाएंगे:
- संबंधित देश की बुनियादी बोलचाल और व्यावसायिक शब्दावली सिखाना।
- वहां के कानूनों, संस्कृति और काम करने के तौर-तरीकों से परिचित कराना।
- धोखाधड़ी से बचाने के लिए कानूनी और डिजिटल साक्षरता प्रदान करना।
- प्रमाणित डिप्लोमा या सर्टिफिकेट देना जिससे वीजा और इमिग्रेशन प्रक्रिया आसान हो सके।
मुंबई कॉन्फ्रेंस के दूरगामी परिणाम
मुंबई में आयोजित इस राष्ट्रीय श्रम परिषद की बैठक में उद्योग जगत के दिग्गजों, नीति निर्माताओं और श्रमिक संघों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। सभी ने इस बात पर सहमति जताई कि भारत के पास डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकी लाभांश) का एक बड़ा फायदा है। यदि हमारे युवाओं को सही दिशा, सुरक्षा और आधुनिक कौशल मिल जाए, तो भारत दुनिया की लेबर कैपिटल बन सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल न केवल देश से बाहर जाने वाले श्रमिकों की आय में वृद्धि करेगी, बल्कि देश में विदेशी मुद्रा (Foreign Remittances) के प्रवाह को भी मजबूती देगी। भारत से हर साल लाखों लोग रोजगार के सिलसिले में बाहर जाते हैं, और यदि वे भाषा में पारंगत होकर जाएंगे, तो उनकी सौदेबाजी की क्षमता (Bargaining Power) में भी काफी इजाफा होगा।
आगामी नीतियां और क्रियान्वयन
केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि इस प्रस्ताव को जमीनी स्तर पर जल्द से जल्द लागू किया जाए। इसके लिए राज्य सरकारों और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर काम करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। जिला स्तर पर ऐसे सेंटर खोले जाने की योजना है जहां युवाओं को विदेश जाने से पहले वन-स्टॉप ट्रेनिंग मिल सके।
यह कदम भारत के लेबर मार्केट को एक ग्लोबल एज देने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस योजना का ज़मीनी क्रियान्वयन कितनी तेजी से होता है और देश के कामगार वर्ग के जीवन में इससे कितना सकारात्मक बदलाव आता है।