महाराष्ट्र की राजनीतिक और सामाजिक फिजा इन दिनों एक बार फिर सुलग रही है। मराठा आरक्षण की मांग को लेकर पिछले करीब दो हफ्ते से अधिक समय से अनशन पर बैठे मनोज जरांगे पाटील की सेहत अब चिंता का विषय बनती जा रही है। आंदोलन के 14वें दिन अंतरवली सराटी में उस वक्त एक भावनात्मक और अहम मोड़ आया, जब सेंटर फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके खुद उनसे मिलने पहुंचे। दीपके ने जरांगे की बिगड़ती सेहत का हवाला देते हुए उनसे फौरन अपना अनशन वापस लेने का पुरजोर आग्रह किया है।
अअंतरवली सराटी में मची हलचल, स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता
मराठा आरक्षण के प्रबल समर्थक और आंदोलन के अगुआ मनोज जरांगे पाटील का शरीर अब लगातार चल रहे इस लंबे अनशन के कारण जवाब देने लगा है। पिछले चौदह दिनों से अन्न और जल का त्याग कर चुके जरांगे के चेहरे पर कमजोरी साफ झलक रही है। डॉक्टरों की टीम लगातार उनके स्वास्थ्य पर पैनी नजर बनाए हुए है, लेकिन जरांगे अपनी जिद और समुदाय के अधिकारों के प्रति अडिग हैं।
इसी बीच, विभिन्न सामाजिक संगठनों और चिंतकों का अंतरवली सराटी पहुंचने का सिलसिला लगातार जारी है। आज जब अभिजीत दीपके वहां पहुंचे, तो माहौल काफी भावुक हो गया। दीपके ने सीधे तौर पर कहा कि सरकार का रुख भले ही कठोर और सुस्त नजर आ रहा हो, लेकिन महाराष्ट्र की जनता और मराठा समाज को आज मनोज जरांगे की सबसे ज्यादा जरूरत है।
'सरकार निर्दयी है, पर आपको अपनी जान बचाकर लड़ना होगा'
मनोज जरांगे से मुलाकात के बाद अभिजीत दीपके ने मीडिया से मुखातिब होते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि मौजूदा शासन व्यवस्था का रवैया इस पूरे आंदोलन को लेकर बेहद असंवेदनशील और क्रूर हो चुका है।
सरकार पूरी तरह से निर्दयी हो चुकी है, उसे जनता के दर्द और एक आंदोलनकारी की सेहत से कोई सरोकार नहीं है। लेकिन, महाराष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य और मराठा समाज के हक की इस लंबी लड़ाई के लिए मनोज जरांगे का जीवित और स्वस्थ रहना सबसे बड़ी शर्त है। अनशन ही एकमात्र रास्ता नहीं है, समाज को उनकी आगे की अगुवाई की बहुत आवश्यकता है।
दीपके की इन बातों ने वहां मौजूद समर्थकों की आंखें नम कर दीं। हर कोई इस बात से इत्तेफाक रखता है कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए आंदोलन जरूरी है, लेकिन अपने नेता की जान जोखिम में डालना किसी को भी मंजूर नहीं है।
क्यों नहीं निकल पा रहा है समाधान?
मराठा आरक्षण का यह मुद्दा महाराष्ट्र की सियासत का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बन चुका है। पिछले कई सालों से राज्य के कुनबी और मराठा समाज को ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण दिए जाने की मांग को लेकर संघर्ष चल रहा है। जरांगे पाटिल की मुख्य मांग है कि सभी मराठों को कुनबी प्रमाण पत्र दिया जाए ताकि उन्हें शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिल सके।
- मुख्य मांग: सगे-सोयरे (रक्त संबंधियों) की अधिसूचना को तुरंत और पूरी तरह से लागू किया जाए।
- कानूनी पेंच: सरकार का तर्क है कि हर मांग को कानूनी ढांचे और संवैधानिक कसौटी पर कसना जरूरी है ताकि बाद में अदालत में मामला खारिज न हो।
- राजनीतिक असर: आगामी चुनावों और राजनीतिक समीकरणों के बीच इस आंदोलन ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की नींद उड़ा रखी है।
अभिजीत दीपके की अपील का क्या होगा असर?
क्या अभिजीत दीपके के समझाने और स्वास्थ्य की तिहाई देने के बाद मनोज जरांगे पाटील अपना अनशन तोड़ेंगे? यह वह सवाल है जिसका जवाब पूरा महाराष्ट्र जानना चाहता है। अब तक के अपने सभी आंदोलनों में जरांगे अपनी बात पर पूरी तरह अड़े रहे हैं और जब तक ठोस सरकारी आदेश हाथ में न आ जाए, वे पीछे हटने का नाम नहीं लेते।
हालांकि, इस बार डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि अनशन जल्द समाप्त नहीं किया गया, तो उनके अंगों (Organs) पर इसका स्थायी और खतरनाक प्रभाव पड़ सकता है। मराठा समाज के भीतर भी अब इस बात को लेकर मंथन शुरू हो गया है कि आंदोलन को हिंसक या शारीरिक रूप से आत्मघाती बनाने के बजाय रणनीतिक रूप से आगे बढ़ाया जाए।
आंदोलन की अगली दिशा
अंतरवली सराटी में इस वक्त भारी पुलिस बल तैनात है और चारों तरफ से समर्थकों का हुजूम उमड़ा हुआ है। हर कोई यही प्रार्थना कर रहा है कि मनोज जरांगे की सेहत जल्द ठीक हो और इस अनिश्चितता के दौर का कोई संवैधानिक हल निकले। अभिजीत दीपके की यह मुलाकात इस लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है कि यह सिर्फ एक राजनीतिक या सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी और मानवीय अपील थी।
आने वाले कुछ घंटों में यह साफ हो पाएगा कि जरांगे पाटिल अपने अनशन को लेकर क्या अंतिम फैसला लेते हैं। लेकिन यह तय है कि महाराष्ट्र का राजनीतिक पारा अभी और चढ़ने वाला है, और सरकार पर इस बात का भारी दबाव है कि वह बिना किसी और देरी के इस ज्वलंत मुद्दे पर कोई ठोस और पारदर्शी कदम उठाए।