देश की सियासत में चुनावी सुधारों और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर घमासान छिड़ गया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। ओवैसी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उन्होंने संसद के पटल पर पहले ही चेताया था कि 'एसआईआर' (SIR) असल में पिछले दरवाजे से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू करने का ही एक गुप्त तरीका है, और आज के हालात इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि उनकी आशंका बिल्कुल सही थी।
चुनाव आयोग के भीतर मतभेद और विश्वसनीयता पर उठे सवाल
हैदराबाद में मीडिया से बात करते हुए ओवैसी ने चुनाव आयोग के दावों की हवा निकाल दी। आयोग के उस दावे पर सवाल उठाया गया जिसमें कहा गया था कि सभी फैसले पूरी तरह से सर्वसम्मति से लिए गए हैं। ओवैसी ने चौंकाने वाला आंकड़ा सामने रखते हुए कहा कि पिछले 10 महीनों की छोटी सी अवधि के भीतर दो चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 बार गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा, "यदि एक संवैधानिक संस्था के भीतर ही आयुक्तों को अंधेरे में रखा जा रहा है और फैसलों पर इस तरह का मतभेद है, तो देश की आम जनता को इससे क्या संदेश जा रहा है? क्या यह लोकतंत्र की पारदर्शिता के अनुकूल है?" ओवैसी का मानना है कि चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संस्था की साख पर इस तरह के आंतरिक विवादों से गहरा बट्टा लग रहा है।
फॉर्म-6 के नए नियमों और कानूनी दायरे पर बहस
वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले 'फॉर्म-6' में किए गए बदलावों को लेकर भी ओवैसी ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। है। उन्होंने देश के कई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों (CEC) के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि आयोग के पास फॉर्म-6 के प्रावधानों में अपनी मर्जी से मनमाने बदलाव करने का कानूनी अधिकार नहीं है।
कानूनविदों और पूर्व अधिकारियों का भी मानना है कि इस तरह के बड़े प्रशासनिक संशोधनों के लिए विधिवत कानूनी प्रक्रिया और संसद की मंजूरी की जरूरत होती है। लेकिन नियमों को ताक पर रखकर जो बदलाव किए जा रहे हैं, वे आम नागरिकों के लिए परेशानियों का सबब बन रहे हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और 2:1 का विवाद
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े नए कानून की आलोचना करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि जब 2023-24 के दौरान संसद में यह बिल लाया गया था, तभी उन्होंने इसके दूरगामी परिणामों से आगाह किया था।
उन्होंने कहा, "मैंने संसद में साफ-साफ तर्क दिया था कि यदि सरकार अपनी सुविधानुसार और अपनी पसंद के चुनाव आयुक्तों का चयन करेगी, तो देश की आम जनता की नजरों में इस निष्पक्ष संस्था की विश्वसनीयता हमेशा शक के घेरे में रहेगी। चयन समिति की संरचना में प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता को रखा गया, जिससे शुरुआत से ही 2:1 का बहुमत सरकार के पक्ष में हो जाता है। आज जो कुछ भी हो रहा है, वह उसी चिंता का सच साबित होना है।"
'10 करोड़ लोगों के नाम गायब, कैसे बनेगा नया वोटर?'
ओवैसी ने सबसे गंभीर मुद्दा देश की मतदाता सूची से लाखों-करोड़ों लोगों के नाम कटने या शामिल न होने को लेकर उठाया। उन्होंने दावा किया कि पूरे देश में चल रही SIR प्रक्रिया की वजह से लगभग 10 करोड़ लोगों के नाम वोटर लिस्ट में शामिल होने से छूट गए हैं।
एक बेहद व्यावहारिक और गंभीर समस्या सामने रखते हुए उन्होंने पूछा, "मान लीजिए कि परिवार के किसी बुजुर्ग सदस्य या पिता का नाम किसी वजह से नई वोटर लिस्ट में नहीं है, तो उस परिवार का 18 साल का युवा जब पहली बार अपना नाम दर्ज कराने के लिए फॉर्म-6 भरेगा, तो वह क्या करेगा? जब उस युवा पर माता-पिता के घोषणा पत्र की अनिवार्य शर्त थोप दी जाएगी, तो वह कहां जाएगा? यही कारण है कि मैंने संसद में जोर देकर कहा था कि यह और कुछ नहीं, बल्कि पिछले दरवाजे से एनआरसी (NRC) को लागू करने का षड्यंत्र है।"
बीएलओ (BLOs) की कार्यप्रणाली और व्यावहारिक मुश्किलें
चुनाव आयोग के उस प्रेस नोट पर भी सवाल उठाए गए जिसमें कहा गया था कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) दस्तावेज इकट्ठा करने के लिए घर-घर जाकर सत्यापन करेंगे। ओवैसी ने इसे पूरी तरह से 'अव्यावहारिक' और 'जमीनी हकीकत से परे' करार दिया।
तेलंगाना और हैदराबाद के जमीनी अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर बीएलओ को केवल नोटिस बांटने में ही पसीने छूट गए थे और भारी प्रशासनिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। अब यदि आयोग यह दावा कर रहा है कि दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में बीएलओ उन 40 लाख लोगों के घर-घर जाकर दस्तावेज इकट्ठा करेंगे जिन्हें नोटिस मिले हैं, तो यह इंसानी तौर पर असंभव है। बुनियादी और तीखे सवालों का जवाब देने के बजाय आयोग केवल बड़े-बड़े और हवाई बयान देने में व्यस्त है।
राजनीतिक गलियारों में तेज होती प्रतिक्रियाएं
इस पूरे घटनाक्रम के बीच देश की सियासत में उबाल आ गया है। एक तरफ जहां विपक्ष लगातार चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ टीडीपी प्रमुख और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता चुनाव आयोग के समर्थन में भी उतर आए हैं, उनका कहना है कि आयोग के तमाम फैसले सामूहिक सहमति से लिए गए हैं। बहरहाल, SIR और मतदाता सूची पुनरीक्षण का यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ने की पूरी उम्मीद है, क्योंकि इससे सीधे तौर पर करोड़ों मतदाताओं के लोकतांत्रिक अधिकार जुड़े हुए हैं।