जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए उस खौफनाक आतंकी हमले के जख्म आज भी देश के जेहन में ताजा हैं, जिसने हर आंख को नम कर दिया था। इस कायराना हरकत के पीछे छिपे चेहरों को बेनकाब करने और उन्हें उनके अंजाम तक पहुंचाने के लिए भारतीय सुरक्षा बलों ने एक लंबी और बेहद खामोश जंग लड़ी थी। अब इस कड़ी का आखिरी सिरा भी हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया है। पहलगाम आतंकी हमले के लिए जिम्मेदार और पिछले 527 दिनों से देश की खुफिया एजेंसियों व सुरक्षा बलों की आंखों में धूल झोंक रहा आखिरी मास्टरमाइंड हाशिम मूसा आखिरकार भारतीय सेना के ऑपरेशन का शिकार बन गया।
527 दिनों का सब्र और सटीक खुफिया तंत्र
किसी भी वांटेड आतंकी को तलाशना और उसे मार गिराना कोई आसान काम नहीं होता, खासकर तब जब वह घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और स्थानीय मददगारों की आड़ में छिपा हो। हाशिम मूसा की तलाश कोई आम सर्च ऑपरेशन नहीं था। पिछले 527 दिनों से भारतीय सेना, राष्ट्रीय राइफल्स, सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस की संयुक्त टीमें इस शातिर आतंकी के पीछे हाथ धोकर पड़ी थीं।
खुफिया एजेंसियों के पास पुख्ता जानकारी थी कि मूसा अपनी पहचान बदलकर और लगातार अपनी लोकेशन बदलकर सुरक्षा बलों को चकमा दे रहा है। लेकिन, कहते हैं ना कि कानून और देश के प्रहरियों के हाथ बहुत लंबे होते हैं। आखिरकार, मुखबिरों से मिले एक छोटे से इनपुट और टेक्निकल सर्विलांस के जरिए सेना को उसका सटीक ठिकाना मिल गया।
ऑपरेशन 'फिनिश लाइन': कैसे घेरा गया हाशिम मूसा?
जिस इलाके में हाशिम मूसा छिपा हुआ था, वह भौगोलिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण था। चारों तरफ ऊंचे पहाड़, गहरी खाइयां और ऐसा घना जंगल जहां सूरज की किरणें भी मुश्किल से पहुंच पाती हैं। सुरक्षा बलों ने बिना किसी जल्दबाजी के एक सुनियोजित रणनीति के तहत उस पूरे क्षेत्र को चारों तरफ से घेर लिया।
- घेराबंदी और पैनी नजर: ऑपरेशन शुरू करने से पहले ड्रोन और नाइट विजन उपकरणों की मदद से यह सुनिश्चित किया गया कि आम नागरिकों को कोई नुकसान न पहुंचे।
- सरेंडर की अपील को ठुकराया: सुरक्षा बलों ने हमेशा की तरह आतंकियों को आत्मसमर्पण करने का मौका दिया, लेकिन मूसा और उसके साथियों ने कानून के आगे झुकने के बजाय सेना पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी।
- मुठभेड़ का निर्णायक दौर: आतंकियों की तरफ से गोलीबारी शुरू होते ही भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई की और कुछ ही घंटों के भीतर इस खूंखार साजिशकर्ता को जहन्नुम पहुंचा दिया।
पहलगाम हमले का हिसाब चुकता
पहलगाम हमला भारतीय सुरक्षा व्यवस्था और देश की एकता पर एक सीधा प्रहार था। इस हमले के बाद से ही देशवासियों के मन में भारी आक्रोश था और सेना ने कसम खाई थी कि एक-एक गुनहगार को चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा जाएगा। इस एनकाउंटर के साथ ही उस हमले की साजिश में शामिल सभी मुख्य आतंकियों का अध्याय समाप्त हो चुका है।
सुरक्षा जानकारों का मानना है कि हाशिम मूसा के मारे जाने से इस इलाके में सक्रिय आतंकी नेटवर्क को एक बहुत बड़ा झटका लगा है। वह न केवल हमलों की प्लानिंग करता था, बल्कि नए युवाओं को बरगलाकर आतंकवाद के रास्ते पर धकेलने का काम भी कर रहा था। उसके खात्मा होने से स्थानीय स्तर पर स्लीपर सेल और रिक्रूटमेंट नेटवर्क को भारी क्षति पहुंची है।
सेना का अदम्य साहस और देश का संदेश
यह सफलता एक बार फिर साबित करती है कि भारतीय सेना कितनी भी लंबी लड़ाई क्यों न हो, न्याय दिलाकर ही दम लेती है। 527 दिनों तक लगातार चले इस खुफिया और मैदानी ऑपरेशन में हमारे जवानों ने जिस धैर्य, अनुशासन और बहादुरी का परिचय दिया है, वह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है।
देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले और आंतरिक सुरक्षा को मजबूत रखने वाले इन जवानों के इस पराक्रम ने एक बार फिर यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि भारत की तरफ आंख उठाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वे कितनी भी गहरी गुफाओं में क्यों न छिप जाएं।