ममता जब सांसारिक और रक्त संबंधों की सीमाओं को लांघकर पूरे समाज को अपनी गोद में समेट लेती है, तब वह ईश्वर का साक्षात रूप बन जाती है। ऐसी ही एक पावन और रोंगटे खड़े कर देने वाली मिसाल बिहार के भागलपुर जिले में स्थित ऐतिहासिक रामानंदी देवी हिंदू अनाथालय से सामने आई है। यहां की एक ममतामयी महिला ने साबित कर दिया है कि मां बनने के लिए केवल कोख का होना जरूरी नहीं, बल्कि एक विशाल और पवित्र हृदय का होना काफी है।
अनाथालय की दहलीज से शुरू हुआ जीवन का सफर
करीब 62 वर्ष पहले एक नवजात अनाथ बच्ची के रूप में इसी अनाथालय की सीढ़ियों पर पहुंचीं पवन देवी आज यहां पल रहे दर्जनों अनाथ और बेसहारा बच्चों के लिए भगवान का भेजा हुआ फरिश्ता बन चुकी हैं। जिन बच्चों को उन्होंने अपनी कोख से जन्म नहीं दिया, उनकी लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए वे पिछले पूरे 40 वर्षों से लगातार जीवित्पुत्रिका यानी जितिया का कठोर निर्जला उपवास रखती आ रही हैं।
हाल ही में नहाय-खाय के पावन अनुष्ठान के साथ उन्होंने अपने इस 40वें कठिन व्रत का संकल्प लिया। कभी जिस संस्था ने लावारिस और बेसहारा पवन को अपनी छत्रछाया देकर नया जीवन और नई पहचान दी थी, आज उसी अनाथालय के नौनिहालों के लिए पवन देवी का स्नेह, वात्सल्य और ममता सबसे बड़ा संबल और ढाल बनी हुई है।
बचपन की वह टीस, जिसने बदल दी जिंदगी
अपने अतीत के उन दिनों को याद करते हुए 62 वर्षीय पवन देवी की आंखें अक्सर भर आती हैं। वे बताती हैं कि जब वे खुद अनाथालय में एक अबोध बच्ची के रूप में रहती थीं, तब हर साल जितिया पर्व के मौके पर शहर की सुहागन महिलाओं को सज-धजकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते देखा करती थीं। कुछ लोग अनाथालय में आकर बच्चों को प्रसाद भी बांटते थे।
उस बाल मन में अक्सर यह सवाल उठता था कि आखिर उनकी अपनी मां क्यों नहीं है? वे सोचती थीं कि काश उनकी भी कोई मां होती, जो उनके जीवन और लंबी उम्र के लिए यह कठिन उपवास रखती। अनाथालय में पलने वाले अन्य बच्चों के सीने में भी ठीक यही टीस और खालीपन धड़कता था। जैसे-जैसे पवन देवी बड़ी हुईं, उन्होंने अपने भीतर सुलग रही इस पीड़ा को एक सकारात्मक संकल्प में बदल दिया। उन्होंने तय किया कि इस अनाथालय की दहलीज पर आने वाले किसी भी बच्चे को कभी मां के दुलार और अभाव की यह टीस नहीं सहने देंगी। इसी भावना के साथ उन्होंने सभी अनाथ बच्चों को अपनी संतान मानते हुए जितिया का निर्जला व्रत शुरू कर दिया, जो आज भी पूरी निष्ठा से जारी है।
वर्ष 1987 में अनाथालय से ही हुई थी विदाई
पवन देवी के जीवन का यह सफर कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। वर्ष 1987 में अनाथालय प्रबंधन ने ही एक बेटी का फर्ज निभाते हुए उनका विवाह धूमधाम से कराया था। उनके अपने पांच बच्चे हैं, जिनमें से चार की शादी हो चुकी है और वे अपने-अपने परिवारों के साथ खुशहाल जीवन बिता रहे हैं। इसके बावजूद पवन देवी का अनाथालय से नाता एक पल के लिए भी कमजोर नहीं पड़ा।
"इसी अनाथालय ने मुझे जिंदगी, पहचान और दुनिया देखने की ताकत दी है। यह अनाथालय ही मेरा असली मायका है और यहां रहने वाला हर एक बच्चा मेरी अपनी औलाद है। जब तक शरीर में सांस चलेगी, मैं इन बच्चों के लिए निर्जला व्रत रखूंगी, ताकि इनके सिर से कभी मां का साया न हटे।" — पवन देवी
सालों तक बिना मानदेय की असीम सेवा
पवन देवी का इस संस्था के प्रति समर्पण इस बात से भी समझा जा सकता है कि करीब 13 वर्ष पूर्व जब संस्था में उनकी औपचारिक नियुक्ति हुई, उससे ठीक पहले वे वर्षों तक बिना एक पैसा पारिश्रमिक लिए दिन-रात बच्चों की देखरेख और सेवा में जुटी रहीं। उनके मन में कभी पैसे का लालच नहीं आया, बल्कि बच्चों की हंसी और उनकी तरक्की ही उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार रही है।
संस्था के सचिव शरजानंद मिश्र बताते हैं कि पवन देवी का इस संस्थान के साथ केवल एक कर्मचारी का नाता नहीं है, बल्कि उनका रिश्ता बेहद गहरा, भावनात्मक और रूहानी है। वे बच्चों की मां भी हैं और उनकी पहली मार्गदर्शक भी।
एक सदी से बेसहारा का सहारा बनी है यह संस्था
भागलपुर का रामानंदी देवी हिंदू अनाथालय कोई साधारण संस्थान नहीं है। इसकी स्थापना वर्ष 1925 में की गई थी। करीब एक सदी यानी 100 वर्षों से यह ऐतिहासिक संस्था समाज के उपेक्षित, लावारिस और अनाथ बच्चों को सुरक्षित छत, उच्च शिक्षा और बेहतरीन मानवीय संस्कार देकर उन्हें देश का जिम्मेदार नागरिक बनाने का काम कर रही है। पवन देवी का यह 40 वर्षों का कठोर निर्जला तप और त्याग इस संस्था की गरिमा और इसके उद्देश्यों को और अधिक बुलंद करता है।
आज के इस आधुनिक दौर में जहां लोग अपने खून के रिश्तों से भी दूर होते जा रहे हैं, वहीं पवन देवी की यह प्रेरक गाथा यह सिखाती है कि सच्ची ममता और प्रेम की कोई सीमा नहीं होती। निस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही इंसान को फरिश्ता बनाती है।