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उल्हासनगर महायुति में भीषण घमासान, विधानसभा चुनाव से पहले BJP-शिवसेना आमने-सामने

उल्हासनगर महायुति में भीषण घमासान, विधानसभा चुनाव से पहले BJP-शिवसेना आमने-सामने

महाराष्ट्र की राजनीति में समय-समय पर नए समीकरण और चौंकाने वाले मोड़ देखने को मिलते हैं। राज्य के ठाणे जिले के तहत आने वाले औद्योगिक और व्यावसायिक शहर उल्हासनगर (Ulhasnagar) में महायुति गठबंधन के भीतर चल रहा अंदरूनी घमासान अब खुलकर सतह पर आ गया है। महानगर पालिका (Municipal Corporation) में स्वीकृत नगरसेवकों (Nominated Corporators) के चुनाव को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब केवल स्थानीय निकाय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका दायरा बढ़कर आने वाले विधानसभा चुनावों (Assembly Elections 2026) तक पहुंच गया है। इस तीखे राजनीतिक टकराव ने सत्ताधारी गठबंधन की एकता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं और सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है अक्टूबर 2026 के इस राजनीतिक घटनाक्रम में दोनों प्रमुख दलों के बीच तलवारें खिंच चुकी हैं।

स्वीकृत नगरसेवक चुनाव: विवाद की असली चिंगारी

इस पूरे राजनीतिक ड्रामे की शुरुआत उल्हासनगर महानगर पालिका में सात स्वीकृत नगरसेवकों के चुनाव की प्रक्रिया के साथ हुई। इस चुनाव परिणाम ने महायुति के भीतर सुलग रही आग को हवा दे दी। चुनाव के दौरान शिवसेना के खाते में पांच और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के खाते में मात्र दो कॉर्पोरेटर आए। इस अनुपात ने स्थानीय स्तर पर बीजेपी खेमे को असहज कर दिया, जिसके बाद पार्टी ने आक्रामक तेवर अपनाते हुए म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में सत्ताधारी गठबंधन से नाता तोड़ने का औपचारिक ऐलान कर दिया।

बीजेपी के स्थानीय नेताओं, जिनमें विधायक कुमार आयलानी और जिला अध्यक्ष राजेश वदारिया प्रमुख रूप से शामिल हैं, ने एक तीखी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर महायुति गठबंधन से बाहर होने की घोषणा की। इतना ही नहीं, पार्टी ने यह भी साफ कर दिया कि वे आने वाले किसी भी चुनाव में शिवसेना के सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे के साथ किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं करेंगे। इस घोषणा ने ठाणे और कल्याण बेल्ट के राजनीतिक तापमान को अचानक बहुत बढ़ा दिया है।

तकनीकी कारणों से उम्मीदवारी रद्द होने पर मचा बवाल

इस विवाद के पीछे की तकनीकी वजहों को टटोलें तो पता चलता है कि मनोनयन प्रक्रिया के दौरान बीजेपी के चार में से दो उम्मीदवारों के आवेदन तकनीकी कमियों (Technical Grounds) के आधार पर खारिज कर दिए गए थे। इसके बाद बाकी बचे पदों और उम्मीदवारों के चयन को लेकर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हुए।

  • बीजेपी ने पूरी चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए और इसे अपनी पार्टी को कमजोर करने की सोची-समझी साजिश करार दिया।
  • पार्टी ने पहले ही इस मामले में कानूनी रास्ता (Legal Action) अपनाने की चेतावनी दी है, जिससे प्रशासनिक अमले में भी हलचल है।
  • उम्मीदवारों के फॉर्म रद्द होने से लेकर परिणामों तक की इस पूरी प्रक्रिया ने दोनों दलों के स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच दूरियां और गहरी कर दी हैं।

शिवसेना का पलटवार: लोकसभा चुनावों का पुराना हिसाब

बीजेपी के आक्रामक रुख के बाद शिवसेना भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। शिवसेना के स्थानीय पदाधिकारियों ने पलटवार करते हुए पिछले लोकसभा चुनावों का कच्चा-चिट्ठा खोलना शुरू कर दिया है। शिवसेना का दावा है कि लोकसभा चुनाव प्रचार और मतदान के दौरान बीजेपी ने सांसद श्रीकांत शिंदे की जीत के लिए अपेक्षित मदद नहीं की थी।

पार्टी नेताओं का आरोप है कि बीजेपी की शीर्ष और स्थानीय लीडरशिप की तरफ से जो दिशा-निर्देश दिए गए थे, उनका जमीनी स्तर पर पालन नहीं हुआ। शिवसेना का कहना है कि उन्होंने गठबंधन धर्म का पूरी ईमानदारी से पालन किया, लेकिन बदले में उन्हें केवल असहयोग और उदासीनता ही मिली। इस खुलासे के बाद दोनों दलों के बीच आपसी भरोसे की कमी खुलकर सामने आ गई है।

रवींद्र चव्हाण पर गंभीर आरोप और गठबंधन तोड़ने की चुनौती

इस पूरे घटनाक्रम में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता विधायक रवींद्र चव्हाण का नाम भी केंद्र में आ गया है। शिवसेना के कुछ नेताओं ने सीधे तौर पर उन पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि वे स्थानीय स्तर पर शिवसेना को दबाने और कमजोर करने की राजनीति कर रहे हैं। शिवसेना की ओर से यहां तक कहा गया कि यदि बीजेपी गठबंधन में सहज महसूस नहीं कर रही है, तो उन्हें हर तरह के पदों से इस्तीफा देकर औपचारिक रूप से गठबंधन तोड़ देना चाहिए।

शिवसेना के पदाधिकारियों ने दावा किया है कि उनके पास ऐसे कई व्हाट्सएप मैसेज और कॉल रिकॉर्ड्स मौजूद हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि बीजेपी नेताओं का रवैया गठबंधन विरोधी रहा है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि (Independent Verification) नहीं हो पाई है, लेकिन राजनीतिक बयानों के इस दौर ने माहौल को जरूर तनावपूर्ण बना दिया है।

आने वाले विधानसभा चुनावों पर मंडराया संकट

उल्हासनगर और कल्याण विधानसभा क्षेत्रों के चुनावी समीकरणों के लिहाज से यह विवाद बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। आने वाले विधानसभा चुनावों में आपसी सहयोग का यह मुद्दा अब महायुति के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह अंदरूनी कलह जल्द ही समाप्त नहीं हुई, तो इसका सीधा असर विधानसभा सीटों के नतीजों पर पड़ सकता है। शिवसेना ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि अगर लोकसभा चुनावों की तरह विधानसभा में भी बीजेपी का यही रवैया रहा, तो वे भी अपने स्तर पर स्वतंत्र निर्णय लेने से पीछे नहीं हटेंगे।

आपसी आरोपों में उछले पुराने नाम और 'मंचेकर गैंग' का मुद्दा

विवाद यहीं नहीं थमता। बीजेपी द्वारा अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पप्पू कलानी और कमलेश निकम का जिक्र किए जाने के बाद शिवसेना ने भी जवाबी हमला बोला। शिवसेना ने प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण पर 'मंचेकर गैंग' के साथ मिलकर काम करने के गंभीर आरोप लगाए।

इसके अलावा, दोनों पक्षों की ओर से व्यक्तिगत और आपराधिक मामलों को लेकर भी बयानबाजी की गई है। शिवसेना ने आरोप लगाया है कि जिन चेहरों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनका अतीत क्या रहा है, यह जनता भली-भांति जानती है। इन तमाम जुबानी जंग और आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच आम जनता और स्थानीय वोटर असमंजस की स्थिति में हैं।

निष्कर्ष: क्या सुधरेगी महायुति की सेहत?

उल्हासनगर महानगर पालिका से उठी यह सियासी चिंगारी अब एक बड़े दावानल का रूप लेती दिख रही है। एक तरफ नगर निगम में सत्ता की मलाई और वर्चस्व की लड़ाई है, तो दूसरी तरफ विधानसभा चुनावों की बिसात पर मोहरें फिट करने की चुनौती। महायुति के वरिष्ठ नेताओं के सामने अब सबसे बड़ा संकट इस कलह को थामने और डैमेज कंट्रोल करने का है। यदि समय रहते शीर्ष नेतृत्व ने इस आंतरिक असंतोष को दूर नहीं किया, तो आगामी चुनावों में इसका भारी खमियाजा गठबंधन को भुगतना पड़ सकता है। राजनीतिक दलों के आधिकारिक बयानों और आगामी बैठकों पर ही अब उल्हासनगर और कल्याण के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय होगी।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

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रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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