क्रिसेंट से लेकर चौके-छक्कों के इस रोमांचक खेल में एक बार फिर बड़े बदलाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है। सदियों से टेस्ट क्रिकेट की पहचान रही लाल गेंद (Red Ball) के वजूद पर अब एक नया संकट या यूं कहें कि एक नया सुधारवादी कदम मंडराने लगा है। दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में हमेशा से पारंपरिक सफेद पोशाक और लाल गेंद का कॉम्बिनेशन बसा हुआ है, लेकिन अब खेल की सर्वोच्च संस्था इसे बदलने की एक बड़ी योजना पर काम कर रही है।
आधुनिक समय में क्रिकेट ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। टी20 फॉर्मेट के आने के बाद से खेल का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है। दर्शकों को लुभाने के लिए डे-नाइट टेस्ट मैचों की शुरुआत हुई, जिसमें पिंक बॉल यानी गुलाबी गेंद का इस्तेमाल किया गया। लेकिन अब बात सिर्फ दिन-रात के मैचों की नहीं है, बल्कि पूरे लॉन्ग फॉर्मेट यानी पारंपरिक टेस्ट क्रिकेट की मूल आबोहवा में ही बड़ा बदलाव लाने की तैयारी चल रही है।
क्यों पड़ी रंग बदलने की जरूरत?
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी के गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, टेस्ट मैचों के दौरान विजिबिलिटी (Visibility) और खिलाड़ियों की सहूलियत को लेकर लगातार चर्चाएं हो रही हैं। कई मौकों पर यह देखा गया है कि पारंपरिक लाल गेंद पुराने होने के बाद पिच के रंग में मिल जाती है, जिससे बल्लेबाजों को उसे पिक करने में परेशानी होती है। इसके अलावा, टीवी और डिजिटल ब्रॉडकास्टिंग के इस दौर में दर्शकों के अनुभव को और ज्यादा शानदार बनाने के लिए गेंद के रंग पर मंथन चल रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि टेस्ट क्रिकेट को आज की युवा पीढ़ी के बीच और अधिक आकर्षक बनाने के लिए कुछ क्रांतिकारी कदम उठाने जरूरी हो गए हैं। वनडे और टी20 की चमक-धमक के आगे कई बार पांच दिन के खेल की सुस्ती दर्शकों को दूर ले जाती है, ऐसे में गेंद के रंग या उसकी चमक को लेकर यह नया प्रयोग गेम-चेंजर साबित हो सकता है.
खिलाड़ियों और एक्सपर्ट्स की क्या है राय?
क्रिकेट जगत के तमाम दिग्गज इस संभावित बदलाव पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ पूर्व क्रिकेटरों का मानना है कि लाल गेंद टेस्ट क्रिकेट की आत्मा है और इसके साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। उनका तर्क है कि लाल गेंद की सीम और उसकी स्विंग कराने की क्षमता का अपना एक अलग इतिहास और तकनीक है। दूसरी ओर, कई मॉडर्न एरा के खिलाड़ी और कोच इस बात से सहमत हैं कि अगर खेल की बेहतरी और विजिबिलिटी के लिए कोई वैज्ञानिक बदलाव किया जाता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए।
- पारंपरिक पहचान: लाल गेंद से ही टेस्ट क्रिकेट की असली रूह जुड़ी हुई है।
- ब्रॉडकास्टिंग एंगल: आधुनिक कैमरों और एचडी विजन के लिए गेंद का रंग ऐसा होना चाहिए जो साफ नजर आए।
- खिलाड़ियों की सहूलियत: धूप और छांव के खेल में बल्लेबाजों को गेंद देखने में कोई दिक्कत न हो।
क्या गुलाबी या किसी अन्य रंग की होगी गेंद?
फिलहाल आईसीसी के अधिकारी इस योजना के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रहे हैं। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि लाल रंग की जगह ठीक-ठीक किस रंग को प्राथमिकता दी जाएगी, लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि ड्यूक (Duke) और कूकाबुरा (Kookabura) जैसी प्रमुख गेंद निर्माता कंपनियों के साथ मिलकर कुछ नए टेस्ट ट्रायल किए जा सकते हैं। गुलाबी गेंद पहले से ही डे-नाइट मैचों में अपनी जगह बना चुकी है, लेकिन क्या अब सामान्य लाल गेंद की जगह भी किसी ऐसे ही चमकीले विकल्प को चुना जाएगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
क्रिकेट के इतिहास में बदलाव की बयार
यह पहला मौका नहीं है जब क्रिकेट के नियमों या उपकरणों में ऐसा कोई बड़ा फेरबदल करने की बात सामने आई हो। इससे पहले जब वनडे क्रिकेट में सफेद गेंद और रंगीन कपड़ों की शुरुआत हुई थी, तब भी पारंपरिकवादियों ने इसका कड़ा विरोध किया था। लेकिन समय के साथ यह बदलाव क्रिकेट का अभिन्न अंग बन गया। ठीक इसी तरह, टी20 फॉर्मेट ने तो खेल के सारे समीकरण ही बदलकर रख दिए। अब देखना यह होगा कि क्या टेस्ट क्रिकेट के पारंपरिक प्रेमी इस संभावित बदलाव को स्वीकार करते हैं या इसके खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराते हैं।
आने वाले महीनों में आईसीसी की सालाना बैठकों में इस प्रस्ताव पर औपचारिक मुहर लग सकती है। यदि यह योजना पास होती है, तो क्रिकेट के सबसे शुद्ध प्रारूप यानी टेस्ट मैच में एक ऐतिहासिक अध्याय का समापन और नए युग की शुरुआत होगी। फैंस की निगाहें अब पूरी तरह से इस बात पर टिकी हैं कि बोर्ड क्या अंतिम फैसला लेता है और क्या वाकई खेल का वह पुराना लाल रंग इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगा।