भारत के ऊर्जा इतिहास में एक नया और स्वर्णिम अध्याय जुड़ चुका है। देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बेहद बड़ा और दूरदर्शी कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में PM-DHARA योजना को अपनी हरी झंडी दे दी है। इस योजना का कुल आकार सुनने में ही किसी बड़े आर्थिक मील के पत्थर जैसा लगता है—पूरे 1.86 लाख करोड़ रुपये! इस भारी-भरकम निवेश का उद्देश्य केवल बिजली पैदा करना नहीं है, बल्कि उस बिजली को देश के कोने-कोने तक सुचारू रूप से पहुंचाना और उसे सुरक्षित स्टोर करना है।
आखिर क्या है यह PM-DHARA योजना?
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि इस अनोखे नाम का मतलब क्या है। PM-DHARA का पूरा नाम 'PM-Developing Harmonized and Accelerated Renewable-energy Access' है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसका मुख्य मकसद नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) तक पहुंच को आसान और तेज बनाना है। देश में सोलर और विंड (सौर और पवन) ऊर्जा के प्रोजेक्ट्स तेजी से लग तो रहे हैं, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती ग्रिड तक उस ऊर्जा को ले जाने और मौसम पर निर्भरता की होती है।
सूरज ढलने के बाद सोलर पैनल बिजली नहीं बनाते और हवा न चलने पर विंड टर्बाइन थम जाते हैं। ऐसे में अचानक बिजली की मांग बढ़ने पर ग्रिड पर भारी दबाव आ जाता है। इसी तकनीकी और ढांचागत समस्या का समाधान करने के लिए इस योजना को डिजाइन किया गया है। इसके जरिए देश में 135 गीगावाट (GW) तक रिन्यूएबल एनर्जी को ग्रिड से जोड़ने की विशाल क्षमता विकसित की जाएगी।
1,86,405 करोड़ रुपये का फंड कहां और कैसे खर्च होगा?
किसी भी योजना की सफलता उसके वित्तीय प्रबंधन पर निर्भर करती है। सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए 1,86,405 करोड़ रुपये का भारी बजट निर्धारित किया है, जिसे बहुत ही सोच-समझकर दो प्रमुख हिस्सों में बांटा गया है:
- ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर फेज-3: इसके तहत राज्यों के भीतर मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क तैयार करने के लिए 1,36,378 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
- बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS): बिजली के स्टोरेज के लिए 50,000 करोड़ रुपये खर्च करके 50 गीगावाट-घंटे (GWh) क्षमता के बैटरी स्टोरेज सिस्टम स्थापित किए जाएंगे।
इस पूरी परियोजना में केंद्र सरकार की ओर से सीधे तौर पर 54,082 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। बैटरी स्टोरेज का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जब सूरज या हवा से बिजली का उत्पादन अधिक होगा और मांग कम होगी, तब उस अतिरिक्त ऊर्जा को इन बैटरी में सुरक्षित रख लिया जाएगा। जब शाम के वक्त या पीक आवर्स में बिजली की मांग अचानक आसमान छूएगी, तब इसी स्टोर की गई ऊर्जा का इस्तेमाल करके पूरे देश में निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।
राज्यों और पावर कंपनियों की क्या होगी भूमिका?
इस राष्ट्रीय महत्व की योजना को जमीन पर उतारने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल बेहद अहम होगा। राज्यों की स्टेट ट्रांसमिशन यूटिलिटीज (STUs) इस पूरी प्रक्रिया में मुख्य क्रियान्वयन एजेंसी की भूमिका निभाएंगी। नई ट्रांसमिशन परियोजनाओं को पारदर्शी बनाने के लिए इन्हें टैरिफ बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग (TBCB) यानी प्रतिस्पर्धी बोलियों के माध्यम से लागू किया जाएगा। वहीं, जो मौजूदा ट्रांसमिशन नेटवर्क पहले से देश में मौजूद हैं, उन्हें और अधिक मजबूत व आधुनिक बनाने का काम 'कॉस्ट-प्लस' आधार पर किया जाएगा ताकि तकनीकी खामियों की गुंजाइश बिल्कुल न रहे।
आम नागरिक और उपभोक्ता को इससे क्या मिलेगा?
अक्सर बड़े नीतिगत फैसले कागजों तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन PM-DHARA का सीधा असर आम आदमी की जेब और सहूलियत पर पड़ने की पूरी उम्मीद है।
- बिजली की लागत पर असर: केंद्र सरकार की वित्तीय मदद से राज्यों पर ट्रांसमिशन नेटवर्क खड़े करने का बोझ कम होगा, जिसका सीधा सकारात्मक प्रभाव आने वाले समय में बिजली दरों पर पड़ सकता है।
- लोड शेडिंग से राहत: बेहतर ग्रिड और बैटरी स्टोरेज होने से ग्रिड फेल होने या पावर कट जैसी समस्याओं से काफी हद तक निजात मिलेगी।
- नॉन-फॉसिल लक्ष्यों की प्राप्ति: यह योजना भारत के उन दीर्घकालिक लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार साबित होगी, जिसके तहत देश को पर्यावरण के अनुकूल और फॉसिल-फ्री ऊर्जा की ओर बढ़ना है।
- रोजगार के नए अवसर: जब इतने बड़े पैमाने पर ट्रांसमिशन लाइनें बिछेंगी, बैटरी स्टोरेज प्लांट लगेंगे और नए पावर प्रोजेक्ट्स आएंगे, तो इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में लाखों नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
भविष्य की मजबूत नींव
भारत जिस तेजी से डिजिटल और आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हमारी ऊर्जा की मांग भी रिकॉर्ड तोड़ रही है। ऐसे समय में केवल पारंपरिक या कोयले पर आधारित बिजली पर निर्भर रहना पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए खतरनाक हो सकता है। वित्त वर्ष 2032-33 तक पूरी तरह लागू होने वाली यह योजना आने वाले दशकों में भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की ताकत रखती है। ग्रीन एनर्जी ट्रांसमिशन का यह जाल देश की तस्वीर और तकदीर दोनों बदलने का माद्दा रखता है।