डिजिटल युग में तकनीक का वरदान कई बार असामाजिक तत्वों के हाथ में पहुंचकर अभिशाप बन जाता है। ताजा मामला बिहार के सारण और सीवान जिले से जुड़ा है, जहां कानून के रखवाले ही साइबर अपराधियों के नापाक षड्यंत्र का शिकार बन गए हैं। सारण साइबर थाने में तैनात एक पुलिस अवर निरीक्षक (एसआई) की तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ कर उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल करने और इसके एवज में पचास हजार रुपये की रंगदारी मांगने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस घटना के बाद से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है और तकनीकी सेल ने आरोपियों की धरपकड़ के लिए जाल बिछाना शुरू कर दिया है।

वर्दी और सादे लिबास की तस्वीरों को किया गया मॉर्फ
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, सारण साइबर थाने में पदस्थापित एसआई विनोद कुमार सिंह इन दिनों असामाजिक तत्वों के निशाने पर हैं। अपराधियों ने उनकी वर्दीधारी और सिविल ड्रेस (सादे कपड़ों) वाली ऑफिशियल तस्वीरों को बेहद शातिर तरीके से एडिट किया। इन तस्वीरों को एक महिला और एक अन्य युवक की फोटो के साथ जोड़कर इस तरह से पेश किया गया, जिससे उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचे। आपत्तिजनक और भ्रामक सामग्री के साथ इन तस्वीरों को इंटरनेट पर धड़ल्ले से प्रसारित किया गया, ताकि पेशेवर और सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई जा सके।
इस पूरे गंदे खेल का खुलासा तब हुआ जब बीते दिनों कुछ परिचितों ने एसआई विनोद कुमार सिंह को इस वायरल हो रही सामग्री के बारे में जानकारी दी। शुरुआती छानबीन में यह बात सामने आई कि फेसबुक पर सक्रिय कुछ स्थानीय पेजों और प्रोफाइल्स का इस्तेमाल इस दुर्भावनापूर्ण अभियान को चलाने के लिए किया जा रहा था।
इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और पेजों पर चला फर्जीवाड़ा
जांच में जिन प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और पेजों का नाम सामने आया है, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, निम्नलिखित माध्यमों से इस आपत्तिजनक सामग्री को हवा दी जा रही थी:
- 'Siwan Talkies' नामक फेसबुक पेज और ग्रुप।
- 'मैरवा रिपोर्ट' नाम से संचालित लोकल ग्रुप।
- 'Nitesh Singh Sengar' नामक एक विशेष यूजर प्रोफाइल।
इन सभी माध्यमों से न केवल फोटो, बल्कि भ्रामक वीडियो और ऑडियो क्लिप भी शेयर किए जा रहे थे, जिनका मकसद पुलिस अधिकारी पर मानसिक दबाव बनाना और विभाग की साख को धूमिल करना था।
पोस्ट हटाने के नाम पर मांगी गई पचास हजार की रंगदारी
मामले का सबसे डरावना पहलू यह है कि यह केवल छवि खराब करने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरी आपराधिक साजिश और वसूली का खेल चल रहा था। जब पीड़ित अधिकारी और उनके शुभचिंतकों ने संबंधित सोशल मीडिया पेजों के संचालकों से संपर्क कर इन आपत्तिजनक पोस्टों को हटाने का आग्रह किया, तो अपराधियों ने अपनी असलियत दिखा दी।
आरोपियों ने दो टूक कह दिया कि अगर पोस्ट डिलीट करानी है, तो 50,000 रुपये (पचास हजार रुपये) की रंगदारी चुकानी होगी। साथ ही यह धमकी भी दी गई कि यदि तय समय के भीतर फिरौती की रकम नहीं पहुंचाई गई, तो इन अवांछित और अपमानजनक सामग्रियों को और अधिक समूहों में वायरल कर दिया जाएगा।
किन-किन लोगों के खिलाफ दर्ज हुई है नामजद प्राथमिकी?
इस गंभीर कृत्य के सामने आने के बाद पीड़ित अधिकारी ने चुप बैठने के बजाय कानून का दरवाजा खटखटाया। उनकी लिखित शिकायत के आधार पर स्थानीय थाने में प्रासंगिक धाराओं के तहत नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली गई है। पुलिस ने जिन लोगों को मुख्य आरोपी बनाया है, उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- नितेश कुमार सिंह
- दीपांजलि कुमारी
- 'मैरवा रिपोर्ट' नामक फेसबुक ग्रुप का एडमिन
पुलिस अब इन सभी की कुंडली खंगाल रही है और यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इस सिंडिकेट में और कौन-कौन लोग पर्दे के पीछे से शामिल हैं।
पुरानी रंजिश और कार्यशैली से जुड़ा है विवाद का तार?
प्राथमिकी और शुरुआती अंदरूनी रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे प्रकरण के तार एसआई विनोद कुमार सिंह की पिछली कार्यस्थापनाओं और पेशेवर इतिहास से जुड़े हो सकते हैं। पीड़ित अधिकारी ने बताया कि वे इससे पहले मैरवा और मुफस्सिल थाना क्षेत्र में थानाध्यक्ष (SHO) के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। इसके अलावा, उन्होंने संवेदनशील मामलों में एसआईटी (SIT) टीम के प्रभारी की भूमिका भी निभाई है।
अनुमान लगाया जा रहा है कि अपने उस सख्त कार्यकाल के दौरान उन्होंने जिन अपराधियों या असामाजिक तत्वों पर शिकंजा कसा था, वे आज भी रंजिश पाल रखे हैं। उन्हीं पुराने मामलों का बदला लेने और व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए इस सुनियोजित साजिश को अंजाम दिया गया है, ताकि अधिकारी का मनोबल तोड़ा जा सके।
डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी जांच में जुटी पुलिस
साइबर अपराध के मामलों में डिजिटल एविडेंस यानी डिजिटल साक्ष्य सबसे बड़ा हथियार होते हैं। एसआई विनोद कुमार सिंह ने अपनी शिकायत के साथ वे सारे पुख्ता सबूत पुलिस को सौंप दिए हैं, जो इस अपराध की पुष्टि करते हैं। इनमें शामिल हैं:
- आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट्स के स्क्रीनशॉट
- संबंधित पेजों और प्रोफाइल्स के यूआरएल (URL) लिंक
- वायरल किए गए ऑडियो क्लिप्स
- रंगदारी की मांग से जुड़ी चैट्स और अन्य साक्ष्य
अब पुलिस की तकनीकी शाखा (Cyber Cell) इन सभी डिजिटल साक्ष्यों का बारीकी से विश्लेषण कर रही है। आईपी एड्रेस (IP Address), लोकेशन ट्रेकिंग और फेसबुक जैसी कंपनियों से डेटा रिकवरी के जरिए आरोपियों के वर्चुअल ठिकानों का पता लगाया जा रहा है।
साइबर बुलिंग और रंगदारी पर सख्त कार्रवाई का संदेश
यह घटना इस बात का ताजा उदाहरण है कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग किस हद तक मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना का रूप ले सकता है। जब एक वर्दीधारी पुलिसकर्मी ही इस प्रकार के साइबर स्टॉकिंग और रंगदारी का शिकार बन सकता है, तो आम नागरिकों की सुरक्षा का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में पुलिस प्रशासन की ओर से की जाने वाली कार्रवाई बेहद कड़ी होनी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह के मनगढ़ंत और ब्लैकमेलिंग वाले मामलों को बढ़ावा देने वालों के मन में कानून का खौफ पैदा हो सके। पुलिस के उच्च अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि डिजिटल फुटप्रिंट्स के आधार पर सभी नामजद आरोपियों को बहुत जल्द शिकंजे में लिया जाएगा और कानून सम्मत कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।