आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में युवाओं के सामने अकादमिक दबाव, करियर की चिंता और सोशल मीडिया का ऐसा मायाजाल है, जो कई बार उन्हें भीतर से तोड़ देता है। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं पर खुलकर बात करना और समय पर मदद मांगना बेहद जरूरी हो गया है। इसी गंभीर विषय को केंद्र में रखते हुए वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के वेलनेस सेंटर की पहल पर एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को मानसिक तनाव, भावनात्मक संकट और उससे उबरने के व्यावहारिक तरीकों से अवगत कराना था।
मानसिक संकट से निपटने की सामूहिक जिम्मेदारी
कार्यक्रम के दौरान वेलनेस सेंटर के समन्वयक प्रो. अजय प्रताप सिंह ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में अब भी कई तरह की झिझक बनी हुई है, जिसे तोड़ना समय की सबसे बड़ी मांग है। उन्होंने कहा कि मानसिक संकट के पीछे सामाजिक परिस्थितियां, पारिवारिक कलह, या व्यक्तिगत जीवन की असफलताएं जैसे कई कारण हो सकते हैं। जब कोई व्यक्ति अंदर से टूट रहा होता है, तो उसे अक्सर एक सकारात्मक वातावरण और संवेदनशील संवाद की आवश्यकता होती है।
प्रो. सिंह ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में समझाया कि किसी की जान बचाने या उसे डिप्रेशन से बाहर निकालने की जिम्मेदारी अकेले उस व्यक्ति की नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की सामूहिक नैतिक जिम्मेदारी है। यदि हम अपने आस-पास के लोगों के व्यवहार में आए बदलावों को समय रहते पहचान लें, तो कई जिंदगियों को बचाया जा सकता है।
मानसिक प्राथमिक सहायता के तीन अचूक चरण
वेलनेस सेंटर की नोडल अधिकारी डॉ. अन्नू त्यागी ने कार्यक्रम में मानसिक प्राथमिक सहायता (Mental First Aid) के तीन बेहद महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक चरणों की जानकारी दी। उन्होंने इन चरणों को बहुत ही सरल अंदाज में समझाया:
- देखें (Look): इसका मतलब है कि व्यक्ति के व्यवहार, उसके खान-पान, सोने के तरीकों और बातचीत में आए अचानक बदलावों और संकट के संकेतों को पहचानना।
- सुसुनें (Listen): व्यक्ति की बात को बिना किसी पूर्वाग्रह के पूरी संवेदनशीलता और गहरी सहानुभूति के साथ सुनना। उसे यह महसूस कराना कि वह अकेला नहीं है।
- सहायता करें (Help): पीड़ित व्यक्ति को तुरंत आवश्यक भावनात्मक सहयोग देना और जरूरत पड़ने पर किसी पेशेवर मनोचिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ तक पहुंचाना।
डॉ. त्यागी ने विशेष रूप से आज की युवा पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की आवश्यकता जताई, क्योंकि युवा सबसे ज्यादा सोशल मीडिया और पीयर प्रेशर का शिकार हो रहे हैं।
व्यावहारिक मनोविज्ञान की दृष्टि और परामर्श का महत्व
व्यावहारिक मनोविज्ञान विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. जाह्नवी श्रीवास्तव ने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज की सोच पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि जिस तरह शारीरिक बीमारी होने पर हम तुरंत डॉक्टर के पास जाते हैं, ठीक उसी तरह मानसिक या भावनात्मक रूप से परेशान होने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श (Psychological Counseling) लेना किसी भी तरह की कमजोरी की निशानी नहीं है, बल्कि यह एक समझदारी भरा कदम है।
डॉ. श्रीवास्तव ने बताया कि जब कोई व्यक्ति गहरे तनाव में होता है, तो सिर्फ उसकी बात को धैर्यपूर्वक सुन लेना और उसे थोड़ा सा भावनात्मक संबल देना ही उसके लिए बहुत बड़ा सहारा बन जाता है। कई बार लोग अपनी बातें अपनों से भी शेयर नहीं कर पाते, ऐसे में यूनिवर्सिटी स्तर पर इस तरह के वेलनेस सेंटर्स जीवन रक्षक साबित होते हैं।
छात्र जीवन में बढ़ते दबाव और साइबर तनाव के खतरे
जनसंचार विभाग के शिक्षक डॉ. दिग्विजय सिंह राठौर ने आज के विद्यार्थियों के सामने मौजूद आधुनिक चुनौतियों पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि पढ़ाई का भारी दबाव, परिवार और समाज की उम्मीदों का बोझ, और डिजिटल माध्यमों के अत्यधिक इस्तेमाल से पैदा होने वाला मानसिक दबाव छात्रों की मानसिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।
इसके अलावा, वर्तमान समय में साइबर अपराध या ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार होना भी युवाओं को गंभीर मानसिक आघात (Trauma) दे रहा है। ऐसी घटनाओं के बाद पीड़ित व्यक्ति अक्सर गहरे अपराध बोध या शर्मिंदगी में चला जाता है। डॉ. राठौर ने समाज और परिवार को सलाह दी कि ऐसे संकट के समय पीड़ित व्यक्ति को दोषी ठहराने के बजाय, उसके साथ खड़े हों, उसकी सुनें और उसे पूरी ताकत के साथ सहयोग प्रदान करें।
खुले सत्र में विद्यार्थियों ने पूछे सवाल
इस जागरूकता कार्यक्रम का सबसे आकर्षक हिस्सा इसका खुला प्रश्नोत्तर सत्र रहा, जिसमें विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। छात्रों ने खुलकर अपनी मानसिक उलझनों, परीक्षा के डर, और भविष्य को लेकर होने वाली एंग्जायटी से जुड़े कई सवाल पूछे। उपस्थित विशेषज्ञों ने हर एक सवाल का बहुत ही सकारात्मक और वैज्ञानिक तरीके से समाधान किया, जिससे छात्रों को एक नई दिशा और राहत महसूस हुई।
कार्यक्रम के अंत में यह संदेश दिया गया कि यदि आप या आपके आसपास कोई भी व्यक्ति कभी मानसिक परेशानी या अकेलेपन से गुजर रहा हो, तो चुप बिल्कुल न रहें। अपनों से बात करें, दोस्तों से शेयर करें या तुरंत विशेषज्ञों की मदद लें। जिंदगी बहुत अनमोल है, और हर समस्या का समाधान बातचीत से संभव है।