महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से सीटों के बंटवारे को लेकर सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच चुकी है। आगामी पुणे पदवीधर निर्वाचन क्षेत्र (Graduates Constituency) के चुनाव को लेकर सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के भीतर खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। इस प्रतिष्ठित सीट पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP - अजित पवार गुट) दोनों ने ही अपनी दावेदारी बहुत ज्यादा तेज कर दी है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि आखिरकार यह सीट किसके पाले में जाएगी, क्योंकि दोनों ही दल इस पर अपना मजबूत दावा ठोक रहे हैं।
चुनावी कार्यक्रम और समय सीमा: बढ़ रही राजनीतिक सरगर्मी
भारत निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम के अनुसार, इस बेहद महत्वपूर्ण चुनाव के लिए चुनावी प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है। आधिकारिक घोषणा के मुताबिक, इस सीट के लिए मतदान आगामी 23 अक्टूबर 2026 को संपन्न होगा। वहीं, उम्मीदवारों के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 6 अक्टूबर 2026 तय की गई है। जैसे-जैसे नामांकन की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे राजनीतिक दलों के भीतर टिकट के दावेदारों की धड़कनें तेज होती जा रही हैं। समय बहुत कम बचा है और महायुति के शीर्ष नेतृत्व के सामने यह तय करना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है कि किस दल के उम्मीदवार को मैदान में उतारा जाए ताकि गठबंधन के भीतर कोई असंतोष पैदा न हो।
महायुति के सामने सीट शेयरिंग का पेच
महायुति गठबंधन यानी बीजेपी, शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) और एनसीपी (अजित पवार गुट) के लिए आगामी विधानसभा और स्थानीय चुनावों से पहले यह चुनाव एक लिटमस टेस्ट की तरह देखा जा रहा है। पुणे पदवीधर निर्वाचन क्षेत्र हमेशा से राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और प्रभावशालियों का गढ़ रहा है। यहां शिक्षित वर्ग और स्नातकों (Graduates) का मतदाता होना इस चुनाव को आम चुनावों से बिल्कुल अलग और कठिन बनाता है।
- बीजेपी का तर्क: भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि इस शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्र में उनका जनाधार पारंपरिक रूप से मजबूत रहा है और उनके पास जमीनी स्तर पर कैडर का एक बड़ा नेटवर्क है।
- एनसीपी (अजित पवार) की दावेदारी: दूसरी ओर, उपमुख्यमंत्री अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी का पुणे और आसपास के ग्रामीण-शहरी इलाकों में मजबूत प्रभाव माना जाता है, जिसके आधार पर वे इस सीट पर अपना स्वाभाविक अधिकार जता रहे हैं।
यही वजह है कि दोनों ही दल पीछे हटने को तैयार नजर नहीं आ रहे हैं। बंद कमरे में बैठकों का दौर जारी है और सीट बंटवारे के इस फॉर्मूले को सुलझाने के लिए गठबंधन के वरिष्ठ नेता लगातार मंथन कर रहे हैं।
ग्रेजुएट्स वोटर का मूड और चुनावी समीकरण
पदवीधर चुनाव की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इसमें आम मतदाता हिस्सा नहीं लेते, बल्कि इसमें केवल वे नागरिक मतदान करते हैं जिनके पास ग्रेजुएशन (स्नातक) की डिग्री होती है। इस वजह से इस वर्ग की अपनी अलग समस्याएं, अपेक्षाएं और राजनीतिक समझ होती है। बेरोजगारी, शिक्षा का स्तर, टैक्स, और पेशेवर चुनौतियां इस चुनाव के मुख्य मुद्दे बनते हैं।
पुणे, जो कि महाराष्ट्र का एक प्रमुख शैक्षणिक और आईटी हब (IT Hub) है, वहां के स्नातकों का रुझान हमेशा से राज्य की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाता रहा है। ऐसे में महायुति के लिए एक ऐसा उम्मीदवार उतारना अनिवार्य हो गया है जो न केवल राजनीतिक रूप से मजबूत हो, बल्कि शिक्षित वर्ग के बीच भी जिसकी स्वीकार्यता हो। यदि गठबंधन समय रहते आपसी सहमति नहीं बना पाया, तो इसका सीधा फायदा विपक्षी महाविकास आघाडी (MVA) को मिल सकता है, जो इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए है।
आगे की रणनीति और राजनीतिक भविष्य पर असर
आने वाले कुछ दिनों में यह साफ हो जाएगा कि महायुति इस सीट को लेकर किस आपसी समझौते पर पहुंचती है। 6 अक्टूबर तक नामांकन दाखिल होने हैं, इसलिए सीट बंटवारे का ऐलान अगले 24 से 48 घंटों में होने की पूरी संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव भले ही एक एमएलसी सीट के लिए हो, लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक असर पूरे महाराष्ट्र की राजनीति पर पड़ेगा। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी और एनसीपी मिलकर इस चुनौती को पार कर पाते हैं या फिर टिकट वितरण की यह रस्साकशी गठबंधन के भीतर कोई नया सियासी भूचाल लाती है।