अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में इस समय भूचाल सा आया हुआ है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे भीषण संघर्ष को समाप्त करने के लिए अमेरिकी प्रशासन की तरफ से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। हाल ही में अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष शांति दूत और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई उच्चस्तरीय वार्ता के जो नतीजे सामने आए हैं, वे दुनिया भर के लिए चिंता का विषय बन गए हैं। इस गुप्त और बेहद अहम बैठक में पुतिन ने अपने इरादों को लेकर किसी भी प्रकार का संशय नहीं रहने दिया है।
क्रेमलिन की दो टूक: समझौतों की राह बेहद कठिन
मास्को से मिल रही अंदरूनी खबरों के मुताबिक, पुतिन ने अमेरिकी शांति दूत के सामने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि यूक्रेन के साथ चल रहे मौजूदा हालात बेहद जटिल हैं और किसी भी ऐसे समझौते पर मुहर लगाना असंभव है जो रूस के रणनीतिक हितों के खिलाफ हो। पुतिन का यह रुख इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि रूसी नेतृत्व इस युद्ध को आसानी से रोकने के मूड में नहीं है। जब तक रूस के सामरिक और भू-राजनीतिक लक्ष्य पूरे नहीं हो जाते, तब तक मास्को की तरफ से किसी भी बड़े नरमी के संकेत मिलने की उम्मीद न के बराबर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन इस संघर्ष को जल्द से जल्द खत्म कराकर अपनी कूटनीतिक जीत दर्ज करना चाहता है, लेकिन पुतिन की शर्तें अमेरिकी रणनीतिकारों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई हैं। बैठक के दौरान रूसी राष्ट्रपति ने साफ कर दिया कि यूक्रेन के अतिरिक्त क्षेत्रों पर जो नियंत्रण रूस ने हासिल किया है, उसे छोड़ने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
कीव की कड़ी प्रतिक्रिया: शर्तों को सिरे से नकारा
दूसरी तरफ, यूक्रेन की राजधानी कीव से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। यूक्रेनी सरकार और सैन्य नेतृत्व ने उन तमाम प्रस्तावों और मांगों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिसमें देश की संप्रभुता और भौगोलिक अखंडता से समझौता करने की बात कही गई हो। कीव का साफ कहना है कि भारी खून-खराबे और अपनी जमीन के बड़े हिस्से को बचाने के लिए जो कीमत देश ने चुकाई है, उसके बाद वह किसी भी ऐसी शांति संधि को स्वीकार नहीं करेगा जो उसे कमजोर या पंगु बना दे।
- क्षेत्रीय अखंडता पर अड़ा कीव: यूक्रेन अपनी एक इंच भी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं है।
- रूस की जिद बरकरार: पुतिन अपने रणनीतिक लक्ष्यों और सुरक्षा गारंटियों पर अड़े हैं।
- अंतरराष्ट्रीय दबाव बेअसर: अमेरिका और पश्चिमी देशों की मध्यस्थता अभी तक कोई ठोस परिणाम नहीं दे पाई है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति पर असर
इस जारी तनातनी का असर केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था इस संघर्ष की आग में झुलस रही है। ऊर्जा संकट, सप्लाई चेन का टूटना और महंगाई जैसे मुद्दे लगातार वैश्विक स्तर पर आम आदमी की कमर तोड़ रहे हैं। कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि जब तक रूस और यूक्रेन दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिद छोड़कर किसी व्यावहारिक और मध्यमार्ग पर राजी नहीं होते, तब तक इस खूनी खेल का अंत दूर-दूर तक नजर नहीं आता।
ट्रंप की शांति योजना के सामने बड़ी दीवार
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी अभियानों के दौरान बार-बार यह दावा किया था कि वह सत्ता में आने के कुछ ही दिनों के भीतर रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करवा देंगे। लेकिन अब जब उनके दूत धरातल पर उत्रे हैं, तो उन्हें वास्तविकता की कठोर जमीन का सामना करना पड़ रहा है। कूटनीति की यह बिसात बेहद पेचीیدہ हो चुकी है, जहां एक तरफ पुतिन का अटूट आत्मविश्वास है, तो दूसरी तरफ यूक्रेन का अस्तित्व की लड़ाई लड़ने का संकल्प है।
आने वाले हफ्तों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अमेरिकी प्रशासन इस गतिरोध को तोड़ने के लिए कौन सा नया दांव चलता है। क्या कोई नया कूटनीतिक फॉर्मूला इन दोनों धुर विरोधियों को एक टेबल पर ला पाएगा, या फिर यह संघर्ष और अधिक भयानक रूप धारण करेगा? फिलहाल, दुनिया भर की निगाहें इसी बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीति के ये प्रयास इस भीषण युद्ध को रोक पाने में सफल होंगे या नहीं।