उत्तराखंड की हसीन वादियाँ जितनी अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाती हैं, उतनी ही यहाँ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ भी चर्चा का विषय रहती हैं। पहाड़ की जवानी आज भी देश की सरहदों की रक्षा करने और आजीविका की तलाश में पलायन करने को मजबूर है। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पलायन के बाद जब इंसान बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंचता है, तब उसके हिस्से में क्या आता है? स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के अभाव में तिल-तिल कर जीने को मजबूर पहाड़ का बुढ़ापा आज एक गंभीर मानवीय संकट बन चुका है।
पलायन और बुढ़ापे की अनकही त्रासदी
यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि यह उन हजारों बुजुर्गों की चीख है जो अपनों की उपेक्षा, कठिन परिस्थितियों और व्यवस्था की उदासीनता के शिकार होकर धीरे-धीरे सामाजिक रूप से असहाय बना दिए जाते हैं। पूर्व सैनिक संघर्ष समिति, कोटद्वार के अध्यक्ष महेन्द्र पाल सिंह रावत द्वारा उठाया गया यह मुद्दा आज के दौर में हर उस इंसान को झकझोर देने के लिए काफी है, जो संवेदनाओं को ताक पर रख चुका है।
जब एक 85 साल के बुजुर्ग को अस्पताल तक पहुंचने के लिए मीलों का सफर तय करना पड़े, जब उसके अपने बच्चे उसे बोझ समझने लगें और कहें कि 'आप बूढ़े हो गए हैं, हमारे लिए मैदानी इलाकों में जमीन खरीदिए', तब उस बुजुर्ग के दिल पर क्या गुजरती होगी? अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई को जोड़कर जमीन खरीदने के बाद जब यह पता चले कि पूरा सौदा ही फर्जी था और जमीन कागजों में है ही नहीं, तो न्याय की उम्मीदें दम तोड़ने लगती हैं।
सामाजिक विकलांगता: शरीर की नहीं, सोच की विफलता
विकलांगता केवल शारीरिक नहीं होती। जब समाज, व्यवस्था और अपने ही लोग किसी बुजुर्ग का हाथ छोड़ देते हैं, जब उसकी हर जरूरत को एक आर्थिक बोझ मान लिया जाता है, और जब न्याय पाने के लिए उसे इस उम्र में अदालत के चक्कर काटने पड़ें—तब वह व्यक्ति शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से विकलांग हो जाता है।
कोटद्वार का यह मामला इसी कड़वी सच्चाई का आईना है। साल 2022 में पहाड़ की दुश्वारियों से तंग आकर एक 85 वर्षीय पूर्व सैनिक ने सोचा कि जीवन के आखिरी दिन सुकून से कटेंगे। उसने अपनी जमा-पूंजी से सवा चार बिस्वा जमीन खरीदी। लेकिन मैदान की चकाचौंध में छिपे जमीन के दलालों और ठगों ने उसे अपने जाल में फंसा लिया। जिस जमीन को उसने बुढ़ापे का सहारा समझा, वही उसके लिए अदालती लड़ाइयों का अखाड़ा बन गई। परिवार की तरफ से भी ताने मिलने लगे— 'पैसे कहां डुबो दिए, आप पर तो दिमाग ही नहीं है।'
माइनस 30 डिग्री से लेकर रेगिस्तान की तपिश तक
यह कोई आम बुजुर्ग नहीं हैं। यह वही फौजी हैं जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपनी जवानी कुर्बान कर दी। जिन्होंने जम्मू-कश्मीर की माइनस 30 डिग्री की बर्फीली चोटियों पर देश की सरहदें संभालीं, राजस्थान की 50 डिग्री तपती रेत में गश्त की और अंडमान के समंदर के बीच तिरंगे की शान को बनाए रखा। 1971 के युद्ध से लेकर 'ऑपरेशन रक्षक' तक, इन्होंने राष्ट्र की हर पुकार पर खुद को समर्पित कर दिया।
तब देश को इनकी जरूरत थी, और ये बिना किसी शिकायत के सीमा पर तैनात रहे। लेकिन आज, जब इन्हें खुद देश और समाज के सहारे की जरूरत है, तो ये अदालतों की देहरी पर न्याय की भीख मांग रहे हैं। एक अदालत से राहत मिलने के बाद मामला आगे की बेंच में चला गया है। सवाल यह है कि 85 साल की उम्र में कोई बुजुर्ग आखिर कितने साल और केस लड़ेगा?
प्रशासन और समाज के नाम खुला संदेश
- क्या न्याय पाने के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए?
- क्या न्याय केवल उसी को मिलेगा जिसके पास पैसा और ताकत है?
- क्या देश की रक्षा करने वाले को अपने अंतिम दिनों में इस तरह की जिल्लत झेलनी पड़ेगी?
पूर्व सैनिक संघर्ष समिति, कोटद्वार इस मामले को केवल एक जमीनी विवाद नहीं मानती, बल्कि इसे एक बड़े सामाजिक पतन के रूप में देखती है। समिति ने इस संबंध में उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं से कानूनी परामर्श लिया है ताकि उस बुजुर्ग को अकेला न छोड़ा जाए।
प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग
समय आ गया है कि प्रशासन जागे। भोले-भाले पहाड़ के बाशिंदों और पूर्व सैनिकों को ठगने वाले इन भू-माफियाओं और दलालों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। वरिष्ठ नागरिकों के मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सुना जाना चाहिए ताकि न्याय में देरी के चलते किसी को न्याय से वंचित न होना पड़े।
अंत में समाज से यह सवाल है कि अपने बुजुर्गों को सामाजिक रूप से असहाय या विकलांग मत बनाइए। आज वे 85 वर्ष के हैं, कल हम भी उसी उम्र की दहलीज पर होंगे। अगर आज हम उनके हक के लिए आवाज नहीं उठाएंगे, तो कल हमारी आवाज उठाने वाला कोई नहीं होगा। 'पहले देश सेवा, अब समाज सेवा' के संकल्प के साथ हमें समस्या नहीं, बल्कि समाधान बनना होगा।