भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद हमेशा से जनमत और जनता के अटूट भरोसे पर टिकी रही है। लेकिन जब यही भरोसा चुनावों के बाद सौदेबाजी और अवसरवादी सियासत की भेंट चढ़ जाता है, तो पूरी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगना लाजिमी है। हाल ही में राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। इस लेख में उन पार्षदों और राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार किया गया है, जो जनादेश को ताक पर रखकर सिर्फ कुर्सी की खातिर किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं।
बहुमत के बिना भी बोर्ड गठन का खेल: जनादेश का मज़ाक
स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे अक्सर चौंकाने वाले होते हैं, क्योंकि जमीनी स्तर की राजनीति सीधे जनता से जुड़ी होती है। बावजूद इसके, कई बार चुनाव परिणामों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में जनता के फैसले का सम्मान करते हुए त्रिशंकु स्थिति में गठबंधन या परिपक्व राजनीतिक समझौतों की उम्मीद की जाती है। हालांकि, राजस्थान के संदर्भ में जो तस्वीर उभरकर सामने आई है, वह बेहद चिंताजनक है।
लेख में इस बात पर गंभीर चिंता जताई गई है कि कैसे कई राजनीतिक दलों ने अपने पास स्पष्ट बहुमत न होने के बावजूद जोड़-तोड़ की राजनीति के दम पर अपने बोर्ड का गठन कर लिया। यह स्थिति सीधे तौर पर उन मतदाताओं के साथ छल है, जिन्होंने अपने वार्ड के विकास के लिए उम्मीद के साथ वोट डाला था। जब संख्या बल न होते हुए भी सत्ता हासिल करने की होड़ मचती है, तो लोकतंत्र की मूल भावना तार-तार हो जाती है।
'पलटीमार' पार्षदों की भूमिका और अवसरवादी राजनीति
राजनीति में 'आया राम-गया राम' की संस्कृति कोई नई नहीं है, लेकिन अब यह बीमारी स्थानीय निकायों के स्तर तक अपनी जड़ें गहरी कर चुकी है। चुनावी मैदान में उतरते समय उम्मीदवार किसी खास विचारधारा, पार्टी के चिन्ह या फिर निर्दलीय के रूप में जनता के बीच जाते हैं। जनता उन्हें उनके वाوदों और साख के आधार पर चुनती है। लेकिन चुनाव परिणाम आते ही पाला बदलने का जो खेल शुरू होता है, वह लोकतांत्रिक मूल्यों के पतन का स्पष्ट प्रमाण है।
अग्रलेख में ऐसे पार्षदों को 'पलटीमार' की संज्ञा दी गई है जो चंद स्वार्थों के लिए रातोंरात अपना खेमा बदल लेते हैं। जनता के वोट की गरिमा को दरकिनार कर निजी लाभ को प्राथमिकता देने वाले ऐसे जनप्रतिनिधियों के कारण ही जमीनी स्तर पर लोकतंत्र से जनता का मोहभंग होने लगा है।
स्थानीय निकायों में दल-बदल विरोधी कानून की सख्त जरूरत
भारतीय संसद और विधानसभाओं के स्तर पर दल-बदल को रोकने के लिए कड़े कानून (एंटी-डिफेक्शन लॉ) मौजूद हैं, जिनके तहत पार्टी बदलने वाले विधायकों या सांसदों की सदस्यता रद्द हो सकती है। लेकिन विडंबना यह है कि त्रि-स्तरीय पंचायती राज और स्थानीय निकायों (नगर पालिका, नगर परिषद और नगर निगम) के स्तर पर इस तरह के कड़े कानून का अभाव है।
यही वजह है कि स्थानीय स्तर के जनप्रतिनिधि बिना किसी कानूनी डर के खुलेआम अपनी निष्ठा बदलते हैं। पत्रिका में प्रकाशित लेख में पुरजोर तरीके से यह मांग उठाई गई है कि अब समय आ गया है कि सरकार स्थानीय निकायों के लिए भी दल-बदल विरोधी कानून को सख्ती से लागू करे। जब तक कानूनी शिकंजा नहीं कसा जाएगा, तब तक इस अवसरवादी संस्कृति पर लगाम लगाना नामुमकिन होगा।
सामाजिक बहिष्कार: जनता का नैतिक अस्त्र
कानून अपनी जगह काम करता है, लेकिन समाज की अपनी एक नैतिक ताकत होती है। लेख में एक बेहद कड़ा और विचारणीय सुझाव दिया गया है—ऐसे अवसरवादी पार्षदों का सामाजिक बहिष्कार। लोकतंत्र में जनता ही सर्वविदित मालिक है। यदि मतदाता और स्थानीय समाज ऐसे जनप्रतिनिधियों को जो अपने वादे और निष्ठा से मुकर जाते हैं, उन्हें सामाजिक मंचों या सार्वजनिक कार्यक्रमों से बाहर का रास्ता दिखाने का साहस जुटा ले, तो राजनीतिक दलों और नेताओं में जनता के प्रति जवाबदेही बढ़ जाएगी।
सामाजिक बहिष्कार का यह विचार भले ही कुछ लोगों को अतिवादी लगे, लेकिन राजनीतिक भ्रष्टाचार और नैतिकता के पतन को रोकने के लिए समाज स्तर पर कड़े फैसले लेने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। जब जनप्रतिनिधियों को यह अहसास होगा कि जनता उनके इस 'पलटीमार' रवैया को माफ नहीं करेगी, तभी राजनीति में शुचिता की वापसी संभव हो सकेगी।
निष्कर्ष: सुधार की बयार या यूं ही चलता रहेगा खेल?
राजस्थान के स्थानीय निकायों से उठा यह मुद्दा केवल एक राज्य या एक चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के तमाम स्थानीय निकायों की बीमारी का आईना है। जब तक राजनीतिक दल खुद अपनी आंतरिक शुचिता पर ध्यान नहीं देंगे और कानूनविद् स्थानीय निकायों के लिए विशेष और कड़े प्रावधान नहीं लाएंगे, तब तक जनमत का यूं ही सौदा होता रहेगा। अब देखना यह होगा कि इस वैचारिक बहस के बाद क्या नीति निर्माता इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाते हैं या फिर यह आवाज भी कागजी बहसों में ही दबकर रह जाती है।