आस्था के महापर्व पर प्रशासन की अनदेखी, कीचड़ में उतरने को विवश हुईं माताएं-बहनें
सनातन संस्कृति में जितिया या जूतिया व्रत का विशेष महत्व है। संतान की दीर्घायु और खुशहाली के लिए रखा जाने वाला यह निर्जला व्रत महिलाओं के लिए सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। लेकिन जब यही आस्था प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ जाए, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। उत्तर प्रदेश के रामनगर क्षेत्र से एक बेहद निराशाजनक तस्वीर सामने आई है, जहाँ जूतिया पूजा के पवित्र अवसर पर बलुआ घाट और शास्त्री घाट पर आने वाली महिलाओं को भारी दुश्वारियों का सामना करना पड़ा।
नगर निगम की उदासीनता और लचर व्यवस्था के चलते व्रती महिलाओं को अपने आराध्य की पूजा-अर्चना करने के लिए घुटनों तक कीचड़ और गंदगी के बीच से होकर गुजरना पड़ा। सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर वायरल हो रही इन तस्वीरों ने स्थानीय प्रशासन के उन दावों की पोल खोल दी है, जिनमें त्योहारों के मद्देनजर चाक-चौबंद व्यवस्था के दावे किए जाते हैं।
बलुआ घाट और शास्त्री घाट पर पसरी थी बदइंतजामी
अक्टूबर 2026 के इस पावन पर्व पर सुबह से ही घाटों पर महिलाओं की भारी भीड़ जुटने लगी थी। गंगा नदी में आस्था की डुबकी लगाने और पूजा-पाठ करने के लिए दूर-दूर से महिलाएं बलुआ घाट और शास्त्री घाट पहुंची थीं। लेकिन घाट पर पहुंचते ही उनका सामना विकट परिस्थितियों से हुआ।
घाट के रास्तों पर फैली भारी सिल्ट (कीचड़) और फिसलन के कारण महिलाओं का पैदल चलना भी दूभर हो गया था। स्थिति इतनी भयावह थी कि कई महिलाएं फिसलकर कीचड़ में गिर पड़ीं, जिससे उनके नए वस्त्र और पूजा की सामग्री तक गंदी हो गई। इसके बावजूद, महिलाओं के चेहरे पर अपनी संतान के प्रति अटूट आस्था का भाव साफ झलक रहा था, और वे गिरते-पड़ते किसी तरह गंगा तट तक पहुंचीं।
नदारद रहे नगर निगम के अधिकारी और कर्मचारी
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि ऐसे महत्वपूर्ण और बड़े आयोजनों से पहले नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे? स्थानीय लोगों और चश्मदीदों के अनुसार, जूतिया पूजा के इस पावल अवसर पर घाट पर नगर निगम का एक भी कर्मचारी या अधिकारी मौजूद नहीं था।
- न तो साफ-सफाई की कोई उचित व्यवस्था थी और न ही कीचड़ हटाने के लिए जेसीबी या मजदूरों को लगाया गया था।
- घाटों के पास स्ट्रीट लाइट या रोशनी का कोई प्रबंध नहीं था, जिससे सुबह के वक्त आने वाली महिलाओं को और ज्यादा परेशानी हुई।
- सुरक्षा और सहायता के लिए कोई भी प्रशासनिक सहायता दल मौके पर नजर नहीं आया।
नतीजतन, किसी भी आपात स्थिति या समस्या के समाधान के लिए महिलाएं और उनके परिवारजन इधर-उधर भटकते रहे, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था।
महिलाओं में फूटा गुस्सा, स्थानीय पार्षद ने उठाई आवाज
इस बदइंतजामी को लेकर स्थानीय महिलाओं में भारी आक्रोश देखने को मिला। व्रती महिलाओं का कहना था कि हर साल यह पर्व मनाया जाता है और प्रशासन को पहले से ही पता होता है कि भारी संख्या में लोग घाट पर आएंगे, इसके बावजूद हर बार इस तरह की लापरवाही बरती जाती है। क्या सरकार और प्रशासन महिलाओं की आस्था का इस तरह से मज़ाक उड़ाते रहेंगे?
इस पूरे मामले पर रामनगर के स्थानीय पार्षद रामकुमार यादव ने कड़ा रुख अपनाया है। पार्षद रामकुमार यादव ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि बार-बार चेतावनी देने के बावजूद अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती है। उन्होंने कहा, "यह बेहद शर्मनाक है कि जूतिया जैसी पवित्र पूजा के दिन हमारी माताएं और बहनें इस तरह की नरकीय स्थितियों का सामना करने के लिए मजबूर हुईं। नगर निगम के अधिकारियों की यह उदासीनता शहर के विकास के दावों की पोल खोलती है।"
जिम्मेदारों पर कार्रवाई की उठी मांग
घटना के बाद से ही रामनगर के नागरिकों और प्रबुद्ध वर्ग में रोष व्याप्त है। लोगों की मांग है कि इस प्रकार की लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए और भविष्य में किसी भी त्योहार पर ऐसी पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
फिलहाल, इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फासला कितना बड़ा है। आस्था के इस महापर्व पर महिलाओं को मिले इस कड़वे अनुभव ने सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है।