राजस्थान क्रिकेट संघ (RCA) के चुनाव इस समय प्रदेश की सियासत और खेल गलियारों में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बने हुए हैं। साल 2026 के इन चुनावों ने राजनीतिक तापमान को अचानक से काफी बढ़ा दिया है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार मैदान में बीजेपी से जुड़े दो कद्दावर नेताओं के पुत्र आमने-सामने आ खड़े हुए हैं, जिससे पार्टी संगठन के भीतर भी खींचतान और मंथन का दौर तेज हो गया है। चुनाव प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे उठापटक और राजनीतिक समीकरणों के नए दौर देखने को मिल रहे हैं, जिनकी गूंज अब राजधानी जयपुर से लेकर दिल्ली तक सुनाई दे रही है।
नामांकन वापसी के दिन टिकी सबकी निगाहें
आरसीए चुनाव के तहत सोमवार का दिन बेहद अहम है क्योंकि यह नाम वापसी की अंतिम तारीख है। रविवार को पूरे दिन राजनीतिक गलियारों में बैठकों और वार्ताओं का दौर चलता रहा। सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आ रही है कि दोनों नेता पुत्रों के बीच सीधी चुनावी टक्कर को टालने के लिए पार्टी के उच्च स्तर पर गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। संगठनात्मक स्तर पर यह कोशिश की जा रही है कि आपसी सहमति बनाकर किसी एक उम्मीदवार को मैदान से हटाया जाए, ताकि बीजेपी समर्थित खेमे में किसी तरह की फूट या बिखराव का संदेश न जाए।
हालांकि, रविवार देर शाम तक चली बैठकों और मुलाकातों के बावजूद स्थिति पूरी तरह से साफ नहीं हो सकी थी। एक गुट जहां शीर्ष नेतृत्व के इशारे पर कदम उठाने को लेकर असमंजस में दिखा, वहीं दूसरा पैनल हर हाल में चुनाव मैदान में डटे रहने के अपने फैसले पर अड़ा हुआ नजर आया। ऐसे में सोमवार को नाम वापसी का समय समाप्त होने के बाद ही असली तस्वीर सामने आ पाएगी कि मुकाबला कितना त्रिकोणीय या आमने-सामने का रह जाता है।
मैदान में सक्रिय हैं तीन मुख्य गुट
मौजूदा चुनावी गणित को समझें तो आरसीए के इस दंगल में मुख्य रूप से तीन गुट सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इनमें एक प्रमुख गुट पराक्रम सिंह का है, तो दूसरा गुट धनंजय खींवसर के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है। वहीं, तीसरी तरफ बृजकिशोर पैनल भी अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रहा है, जिसे साधने के लिए प्रदेश के वरिष्ठ नेता और वित्त आयोग के अध्यक्ष लगातार सक्रिय नजर आए।
शनिवार को जब नामांकन के कागजात दाखिल करने का सिलसिला थमा, तो कई दिलचस्प सियासी समीकरण देखने को मिले। बीकानेर जिला क्रिकेट संघ सचिव रतन सिंह ने पराक्रम गुट के साथ संयुक्त सचिव पद और बृज किशोर गुट के साथ उपाध्यक्ष पद के लिए अपने नामांकन दाखिल किए। इसी तरह, जोधपुर जिला क्रिकेट संघ सचिव अरिष्ट सिंघवी ने धनंजय सिंह और बृजकिशोर गुट की तरफ से कार्यकारी सदस्य पद के लिए पर्चा भरा। हालांकि, इसके बाद धनंजय सिंह की ओर से सोशल मीडिया पर जो प्रत्याशियों की सूची साझा की गई, उसमें अरिष्ट सिंघवी का नाम न होने से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया।
चुनाव अधिकारियों ने खारिज की आपत्तियां
आरसीए के चुनाव अधिकारी ए.के. पांडे ने रविवार को सभी उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों की गहनता से जांच की। जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव अधिकारी ने स्पष्ट किया कि सभी दाखिल किए गए नामांकन पूरी तरह से वैध पाए गए हैं। चुनाव मैदान में कुल 6 पदों के लिए 30 पदाधिकारी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
छानबीन के दौरान अध्यक्ष पद के दावेदार डीडी कुमावत के नामांकन को लेकर सवाई माधोपुर की ओर से एक आपत्ति दर्ज कराई गई थी। हालांकि, चुनाव अधिकारी ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया, जिससे डीडी कुमावत की उम्मीदवारी पर मंडरा रहा खतरा टल गया। सभी कागजी और तकनीकी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद अब सारा दारोमदार प्रत्याशियों के मैदान में बने रहने या हटने पर टिक गया है।
नेता पुत्रों की नाराजगी और पार्टी अध्यक्ष से मुलाकात
रविवार का दिन बैठकों के नाम रहा। दिनभर की सुगबुगाहट के बाद धनंजय खींवसर, आशीष तिवाड़ी और मोहित यादव जैसे युवा चेहरों ने बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान उन्होंने अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की। इन नेताओं का मुख्य सवाल यह था कि यदि पार्टी संगठन या सरकार का इस चुनाव को लेकर कोई पूर्व निर्धारित निर्णय या पैनल था, तो उन्हें समय रहते इस बात की जानकारी क्यों नहीं दी गई।
मुलाकात के दौरान इन युवा नेताओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि सिर्फ किसी बड़े नेता का पुत्र होना कोई कानूनी या नैतिक अपराध नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब वे क्रिकेट प्रशासन में सुधार और सेवा के लिए आगे आए हैं, तो उन्हें चुनाव लड़ने से क्यों रोका जा रहा है। हालांकि, प्रदेश अध्यक्ष के साथ हुई इस लंबी मंत्रणा के बाद भी कोई ठोस और सर्वमान्य समाधान निकलता हुआ दिखाई नहीं दिया। इसके तुरंत बाद पराक्रम सिंह ने भी प्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात कर अपनी तरफ से पूरी स्थिति और जमीनी हकीकत से अवगत कराया।
दिल्ली तक पहुंचा विवाद, अब मंगलवार को होगा फैसला
यह पूरा मामला केवल जयपुर की चार दीवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी आंच दिल्ली तक पहुंच चुकी है। राष्ट्रीय राजधानी में बैठे पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार भी राजस्थान क्रिकेट संघ के इस चुनाव पर बारीक नजर बनाए हुए हैं। बीजेपी संगठन किसी भी कीमत पर यह नहीं चाहता कि पार्टी समर्थित धड़े आपस में ही टकराएं और इसका फायदा किसी तीसरे गुट को मिल जाए।
अब सभी की निगाहें सोमवार शाम के आंकड़ों पर टिकी हैं। यदि नाम वापसी के अंतिम समय में कोई चमत्कारिक सहमति बन जाती है, तो चुनावी समीकरण रातों-रात बदल सकते हैं। अन्यथा, मंगलवार को होने वाले मतदान में आरसीए की जंग बेहद रोमांचक और कांटे की होने वाली है, जिसके परिणाम आने वाले समय में प्रदेश की खेल राजनीति की दिशा तय करेंगे।