भारतीय राजनीति के गलियारों में इस समय चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर जबरदस्त सियासी घमासान मचा हुआ है। एक तरफ जहां तमाम विपक्षी दल लगातार चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त पर निशाना साध रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अब राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। इस गर्मागरम माहौल के बीच शिवसेना ने खुलकर चुनाव आयोग का समर्थन किया है और विपक्ष के सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। शिवसेना के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता संजय निरुपम ने विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि मतदाता सूची के शुद्धिकरण की प्रक्रिया को 'वोट चोरी' का नाम देना सरासर राजनीति है।
संवैधानिक संस्थाओं पर हमला लोकतंत्र के लिए खतरनाक: संजय निरुपम
हाल के दिनों में जिस तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष ने मोर्चा खोला है, उस पर कड़ा एतराज जताते हुए संजय निरुपम ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चुनाव जैसी निष्पक्ष संस्थाओं को विवादों में घसीटना देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। उन्होंने विपक्ष द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त से महज 48 घंटे के भीतर इस्तीफा मांगे जाने की घटना को सीधे तौर पर संवैधानिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं का खुला अपमान करार दिया।
निरुपम का मानना है कि जब भी चुनाव के नतीजे राजनीतिक दलों के मनमुताबिक नहीं आते हैं, तब-तब एक सुनियोजित तरीके से चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवालिया निशान खड़े कर दिए जाते हैं। उनका कहना है कि चुनावी हार की जिम्मेदारी लेने के बजाय अपनी कमियों को छिपाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं पर ठीकरा फोड़ना कुछ राजनीतिक दलों की पुरानी आदत बन चुकी है। लोकतंत्र में जनता का जनादेश सर्वोपरि होता है और हर दल को हार-जीत स्वीकार करते हुए लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।
क्या है एसआईआर (SIR) विवाद और इसका सच?
विपक्ष की ओर से लगातार एसआईआर (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष शुद्धिकरण अभियान पर सवाल उठाए जा रहे हैं और इसे वोटों में हेरफेर या 'वोट चोरी' का नाम दिया जा रहा है। इन तमाम आपत्तियों का खंडन करते हुए शिवसेना प्रवक्ता ने इसके तकनीकी पहलुओं को जनता के सामने रखा।
उन्होंने समझाया कि किसी भी स्वस्थ और पारदर्शी लोकतंत्र के लिए एक त्रुटिहीन मतदाता सूची का होना सबसे पहली शर्त है। मतदाता सूची में उन मतदाताओं के नाम शामिल रहते हैं जो अब इस दुनिया में नहीं रहे (मृत), जो अपनी जगह बदलकर हमेशा के लिए कहीं और चले गए (स्थायी रूप से स्थानांतरित), जो मतदान के समय लंबे समय से अनुपस्थित हैं, या फिर जिनके नाम दो-दो जगहों पर दर्ज हैं (दोहरे मतदाता)। इन सभी अशुद्धियों को नियमानुसार हटाना और सूची को अपडेट करना चुनाव आयोग की नियमित और बेहद जरूरी संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे सीधे तौर पर 'वोट चोरी' बताना पूरी तरह से बेबुनियाद और तथ्यात्मक रूप से गलत है। यदि किसी नागरिक या दल को किसी नाम पर आपत्ति है, तो निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत अपने दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का पूरा अधिकार हमेशा से खुला रहता है।
महाराष्ट्र मतदाता सूची के चौंकाने वाले आंकड़े
प्रेसवार्ता और विभिन्न मंचों पर बात करते हुए संजय निरुपम ने महाराष्ट्र राज्य की मतदाता सूची से जुड़े कुछ चौंकाने वाले और बड़े आंकड़े भी सार्वजनिक किए। उन्होंने दावा किया कि राज्य की वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर अशुद्धियां पाई गई थीं, जिन्हें दुरुस्त करना अनिवार्य था:
- करीब 76 लाख मतदाता ऐसे पाए गए जो लंबे समय से अनुपस्थित चल रहे थे।
- लगभग 75 लाख मतदाता स्थायी रूप से अपनी पुरानी जगह छोड़कर जा चुके थे।
- करीब 34 लाख मतदाताओं के निधन की पुष्टि हुई जिनके नाम अभी भी सूची में थे।
- लगभग 17 लाख नाम ऐसे थे जो दोहरे (डुप्लीकेट) मतदाताओं से जुड़े हुए थे।
निरुपम ने जोर देकर कहा कि यदि इन लाखों अशुद्ध नामों का नियमानुसार भौतिक और तकनीकी सत्यापन कर आवश्यक कार्रवाई नहीं की जाती, तो यह भविष्य के चुनावों की पारदर्शिता पर बड़ा सवालिया निशान छोड़ देता। मतदाता सूची को सटीक बनाना ही आयोग का मुख्य उद्देश्य है।
मुख्य चुनाव आयुक्त पर व्यक्तिगत हमलों की निंदा
मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष की ओर से लगातार व्यक्तिगत और संस्थागत हमले किए जा रहे हैं। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए शिवसेना नेता ने कहा कि किसी चुनाव में अपनी पसंद के परिणाम न मिलने पर किसी एक कमिश्नर या पूरी चुनाव प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा करना पूरी तरह अनुचित है।
चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की खबरों पर भी उन्होंने तीखा सवाल उठाया। उन्होंने स्पष्ट रूप से पूछा कि यदि आयोग की बैठकों में किसी फैसले को लेकर अंदरूनी तौर पर कोई असहमति या मतभेद था, तो क्या संबंधित सदस्यों द्वारा कोई औपचारिक 'नोट ऑफ डिसेंट' (असमर्थता नोट) दर्ज कराया गया था? बिना किसी पुख्ता आधार के हवा में आरोप लगाना केवल जनता को भ्रमित करने का प्रयास मात्र है।
शिवसेना के जनाधार पर सवाल उठाने वालों को करारा जवाब
राजनीतिक गलियारों में शिवसेना को लेकर अक्सर तंज कसे जाते हैं और विरोधी इसे 'शेल कंपनी' या 'प्रॉक्सी पार्टी' कहकर इसके अस्तित्व पर सवाल उठाते हैं। इन बयानों पर पलटवार करते हुए संजय निरुपम ने कहा कि राजनीतिक दलों में वैचारिक मतभेद और टूट-फूट भारतीय राजनीति का कोई नया अध्याय नहीं है। इतिहास गवाह है कि समय-समय पर बड़े राजनीतिक दलों में ऐसी स्थितियां बनी हैं।
उन्होंने साल 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों का हवाला देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के टिकट पर भारी संख्या में उम्मीदवारों का चुनकर विधानसभा पहुंचना इस बात का सबसे बड़ा और अकाट्य प्रमाण है कि पार्टी का वास्तविक जनाधार जनता के बीच पूरी तरह मजबूत है। महाराष्ट्र की जनता ने मुहर लगाकर यह साबित कर दिया है कि असली शिवसेना किसके साथ है।
निष्कर्ष
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में चुनाव जैसी निष्पक्ष संस्थाओं की गरिमा को बनाए रखना हर राजनीतिक दल की नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। शिवसेना का यह रुख साफ करता है कि चुनावी प्रक्रियाओं पर बेवजह के सवाल उठाने से देश के लोकतंत्र को मजबूती मिलने के बजाय नुकसान होता है। मतदाता सूची का शुद्धिकरण कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक आवश्यकता है जिसे निष्पक्ष चुनावों के लिए बेहद जरूरी माना जाता है।