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यश के KGF लुक पर तिग्मांशु धूलिया का बड़ा बयान, कह दी ऐसी बात

यश के KGF लुक पर तिग्मांशु धूलिया का बड़ा बयान, कह दी ऐसी बात

सिनेमा जगत में इन दिनों फिल्मों के बदलते स्वरूप, किरदारों के लुक्स और उनमें परोसी जा रही हिंसा को लेकर बहस छिड़ी हुई है। इसी बीच, हिंदी सिनेमा के जाने-माने निर्देशक और अपनी बेबाक शैली के लिए पहचाने जाने वाले तिग्मांशु धूलिया ने कुछ ऐसा कह दिया है, जो सोशल मीडिया से लेकर फिल्मी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। हाल ही में एक साहित्यिक उत्सव के दौरान उन्होंने साउथ सिनेमा की ब्लॉकबस्टर फिल्म फ्रैंचाइजी 'केजीएफ' (KGF) के मुख्य अभिनेता यश के लुक और फिल्मों में लगातार बढ़ते खून-खराबे पर खुलकर अपनी बात रखी।

कोशाला लिटरेचर फेस्टिवल में दिया बड़ा बयान

घटना की शुरुआत तब हुई जब तिग्मांशु धूलिया कोशाला लिटरेचर फेस्टिवल में शिरकत करने पहुंचे थे। इस दौरान बातचीत का दौर जब सिनेमा और उसमें आ रहे बदलावों की तरफ मुड़ा, तो निर्देशक ने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी राय रखी। उन्होंने मुख्यधारा की फिल्मों में आजकल अभिनेताओं को पेश किए जा रहे तौर-तरीकों पर सवाल उठाए। विशेष रूप से उन्होंने उन फिल्मों का जिक्र किया जहां हीरो को बेहद रफ और टफ, लंबे बालों और बड़ी दाढ़ी के साथ दिखाया जाता है।

तिग्मांशु ने चुटीले अंदाज में लेकिन बेहद गंभीर लहजे में कहा कि आज के दौर में फिल्मों के हीरो जिस तरह के गेटअप में नजर आ रहे हैं, वे पारंपरिक रूप से हीरो कम और किसी असुर या राक्षस जैसे ज्यादा प्रतीत होते हैं। उनके इस बयान के बाद से ही सिने प्रेमियों के बीच दो धड़े बन गए हैं—एक जो उनके इस नजरिए का समर्थन कर रहे हैं, और दूसरे जो इसे रचनात्मक स्वतंत्रता का हवाला देकर खारिज कर रहे हैं।

'रामायण और महाभारत के राक्षसों जैसे दिखते हैं हीरो'

अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए तिग्मांशु धूलिया ने पौराणिक कथाओं का हवाला दिया। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि हमारे इतिहास, यानी रामायण और महाभारत में जिस प्रकार के वर्णन राक्षसों या असुरों के लिए किए गए हैं—लंबे उलझे बाल, बड़ी हुई दाढ़ी और डरावना चेहरा—आजकल के आधुनिक नायक बिल्कुल उसी रूप में पर्दे पर उतारे जा रहे हैं।

उन्होंने हैरानी जताई कि आखिर क्यों इस तरह के डरावने और आक्रामक दिखने वाले किरदारों को आज का युवा वर्ग इतना अधिक पसंद कर रहा है। निर्देशक के मुताबिक, सिनेमा समाज का आईना होता है, और अगर समाज में ऐसे आक्रामक किरदार पंसद किए जा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि दर्शकों की पसंद और मानसिक बनावट में एक बड़ा बदलाव आया है।

फिल्मों में बढ़ती हिंसा और 'बाहुबली' के बाद का दौर

सिर्फ लुक्स तक ही सीमित न रहते हुए, तिग्मांशु धूलिया ने भारतीय सिनेमा में हिंसा (Violence) के बढ़ते स्तर पर भी गहरी चिंता जताई। उन्होंने विश्लेषण करते हुए बताया कि किस तरह से ब्लॉकबस्टर फिल्म 'बाहुबली' की सफलता के बाद से पर्दे पर मार-धाड़, खून-खराबा और क्रूरता का ग्राफ तेजी से ऊपर गया है। 'बाहुबली' के बाद 'केजीएफ' और 'कांतारा' जैसी फिल्मों ने इस चलन को और अधिक मजबूती दी।

हालांकि, निर्देशक ने यह भी स्वीकार किया कि भले ही व्यक्तिगत तौर पर उन्हें इस प्रकार की अति-हिंसक फिल्में ज्यादा न भाती हों, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बॉक्स ऑफिस पर इन फिल्मों को जनता का अपार समर्थन मिला है। दर्शक सिनेमाघरों में इन कहानियों को देखने के लिए बड़ी संख्या में उमड़ते हैं।

जनता के मन में दबे गुस्से का परिणाम है हिंसा?

फिल्मी पर्दे पर हिंसा की स्वीकार्यता पर बात करते हुए तिग्मांशु ने एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि ऐसा मुमकिन है कि आज के दौर में आम आदमी के जीवन में तनाव, खीझ और गुस्सा बहुत ज्यादा बढ़ गया हो। समाज में लोग कई तरह के दबावों से गुजर रहे हैं, लेकिन उनके पास उस दबे हुए गुस्से को बाहर निकालने का कोई स्वस्थ या वैध माध्यम नहीं बचता।

यही वजह है कि जब वे सिनेमाघरों की अंधेरी दुनिया में जाते हैं, तो परदे पर गुस्से से भरे, सिस्टम से बगावत करने वाले और बेखौफ हिंसा करने वाले किरदारों से खुद को तुरंत जोड़ लेते हैं। स्क्रीन पर नायक का यह आक्रामक रूप दर्शकों को उनके अपने जीवन की कुंठाओं से कुछ पलों के लिए मुक्ति दिलाता है, और वे इसे एक कैथार्सिस (मनोवैज्ञानिक विरेचन) के रूप में अनुभव करते हैं।

तिग्मांशु धूलिया का वर्कफ्रंट: हाल ही में रिलीज हुई 'घमासान'

अपने बयानों से हमेशा सुर्खियां बटोरने वाले तिग्मांशु धूलिया इन दिनों अपने नए प्रोजेक्ट को लेकर भी चर्चा में हैं। बतौर निर्देशक उनकी ताजा पेशकश फिल्म 'घमासान' (Ghamasaan) ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 (ZEE5) पर रिलीज हो चुकी है। इस फिल्म में मंजे हुए कलाकार प्रतीक गांधी और अरशद वारसी मुख्य भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं।

यह फिल्म बुंदेलखंड के डकैतों की पृष्ठभूमि और उनकी दुनिया से प्रेरित है। अपनी इस कलाकृति में भी तिग्मांशु ने अपनी पुरानी और जमीन से जुड़ी शैली को बरकरार रखा है। ओटीटी पर इस क्राइम ड्रामा को दर्शकों और समीक्षकों की तरफ से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है, जो साबित करती है कि भले ही वह कमर्शियल मसाला फिल्मों के आलोचक हों, लेकिन दमदार और यथार्थवादी कहानी कहने की उनकी कला आज भी उतनी ही मजबूत है।

निष्कर्ष

सिनेमा में बदलाव और दर्शकों की पसंद का यह दौर लगातार विकास के चरण में है। एक तरफ जहां मास सिनेमा और पैन-इंडिया फिल्में बॉक्स ऑफिस के सभी रिकॉर्ड तोड़ रही हैं, वहीं तिग्मांशु धूलिया जैसे गंभीर और यथार्थवादी सिनेमा के पक्षधर निर्देशक इन बदलावों पर सवालिया निशान भी लगा रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या फिल्म निर्माता इस आलोचना को ध्यान में रखकर अपने किरदारों के हुलिए में कुछ बदलाव लाते हैं, या फिर बॉक्स ऑफिस के आंकड़े ही तय करते रहेंगे कि परदे का हीरो कैसा दिखेगा।

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रोली सिंह

रोली सिंह

Writer (स्थानीय खबरें)

रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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