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काशी से उठी गूंज: क्षेत्रीय भाषाओं ने कैसे गढ़ा अखंड भारत का भविष्य

काशी से उठी गूंज: क्षेत्रीय भाषाओं ने कैसे गढ़ा अखंड भारत का भविष्य

भारत की असली ताकत उसकी विविधता में छिपी है, और इस विविधता को अगर किसी ने सबसे मजबूती से पिरोया है, तो वे हैं हमारी अपनी क्षेत्रीय भाषाएं और बोलियां। यह बात किसी कागजी अध्ययन से नहीं, बल्कि उस प्राचीन और जीवंत भूमि से निकली है जिसे हम काशी के नाम से जानते हैं। साल 2026 के इस दौर में, जब वैश्वीकरण की आंधी में स्थानीय संस्कृतियां पीछे छूटती सी प्रतीत होती हैं, तब वाराणसी में आयोजित एक खास आयोजन ने देश का ध्यान फिर से अपनी जड़ों की ओर खींचा है।

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन पीठ सभागार में आयोजित 'भारतीय भाषा समागम-2026' के मंच से एक ऐसा वैचारिक मंथन हुआ, जिसने हर सुनने वाले को झकझोर कर रख दिया। इस गरिमामयी कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर शामिल हुए विधायक एवं पूर्व मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी ने अपने संबोधन में भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और क्षेत्रीय भाषाओं के उस अनूठे ताने-बाने को उजागर किया, जिससे देश की राष्ट्रीय चेतना का निर्माण हुआ है।

काशी: केवल धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि ज्ञान और अध्यात्म का सर्वोच्च शिखर

कार्यक्रम के दौरान डॉ. नीलकंठ तिवारी ने काशी के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश में प्रयाग, अयोध्या और मथुरा जैसी तमाम नगरियां हैं जो अपनी अगाध भक्ति और धार्मिक महत्व के लिए जानी जाती हैं, लेकिन जब बात विशुद्ध ज्ञान की प्राप्ति की आती है, तो काशी का विकल्प पूरे ब्रह्मांड में नहीं मिल सकता। यह वह धरती है जहां केवल किताबें नहीं पढ़ाई जातीं, बल्कि जीवन जीना सिखाया जाता है।

उन्होंने अत्यंत विनम्रता के साथ कहा कि इतने विद्वानों और मनीषियों के बीच इस मंच पर खड़े होकर उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे वे किसी ज्ञान यज्ञ में एक भिक्षुक की तरह आए हों। यहां आने वाला हर व्यक्ति कुछ न कुछ अमूल्य लेकर ही लौटता है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि कैसे शोध और गहन खोज के बाद विषयों को समाज के सामने लाना बेहद जरूरी है, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सके।

जब आदि शंकराचार्य को भी मिली काशी में ज्ञान की पूर्णता

भारतीय ज्ञान परंपरा की गहराई को समझाते हुए डॉ. तिवारी ने एक बेहद मार्मिक और ऐतिहासिक प्रसंग का जिक्र किया। उन्होंने आदि शंकराचार्य के जीवन से जुड़ी एक घटना को याद करते हुए बताया कि काशी की भूमि पर ज्ञान केवल शास्त्रों के पन्नों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने इंसानों के भीतर उस परम सत्य को देखने की दृष्टि दी है, जो सबमें समान रूप से व्याप्त है।

शंकराचार्य और एक स्वच्छता कर्मी के बीच के संवाद का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि जब महान संत को यह स्मरण कराया गया कि हर जीव के भीतर उसी एक परमेश्वर का वास है, तो उन्होंने बिना किसी भेद-भाव के उस साधारण व्यक्ति में साक्षात भगवान के दर्शन किए। यही कारण है कि इस पावन नगरी में केवल दर्शनार्थियों का आना ही नहीं होता, बल्कि खुद जगतगुरु को भी यहां ज्ञान की पूर्णता प्राप्त हुई थी।

काशी की गलियों की सफाई भी एक आध्यात्मिक साधना

अपने भाषण के दौरान डॉ. नीलकंठ तिवारी ने हाल ही में अपने द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान का एक अनूठा और दार्शनिक पहलू सबके सामने रखा। उन्होंने साझा किया कि वे पिछले 57 दिनों से लगातार काशी की तंग गलियों में सुबह-सुबह झाड़ू लेकर उतर रहे हैं। अक्सर लोग उनसे यह सवाल पूछते हैं कि आखिर वे ऐसा क्यों करते हैं?

इस सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने बेहद खूबसूरत और आध्यात्मिक नजरिया पेश किया। उन्होंने कहा कि:

"काशी की गलियों में घूमना महज एक शारीरिक श्रम नहीं है, बल्कि यह देव पूजा, आध्यात्मिक चिंतन और साक्षात दर्शन का एक हिस्सा है। हमारी प्राचीन परंपराओं में काशी की तीन अंतरगृह परिक्रमाओं का जिक्र है, और ये सारी परिक्रमाएं इन्हीं गलियों से होकर गुजरती हैं। ऐसे में इन पवित्र गलियों को स्वच्छ रखना किसी सामान्य कार्य से कहीं ऊपर, एक उच्च कोटि का आध्यात्मिक चिंतन और पुण्य का कार्य है।"

संस्कृत से लेकर जन-जन की बोलियों तक: ज्ञान की अद्भुत यात्रा

भाषाओं के विकास और उनके ऐतिहासिक सफर पर बात करते हुए डॉ. तिवारी ने संस्कृत भाषा की प्राचीनता को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि संस्कृत को विश्व की सबसे प्राचीन लिखित भाषाओं में शुमार किया जाता है। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि कैसे इस भाषा के हर एक शब्द में ब्रह्मांड का गहरा ज्ञान छिपा हुआ है।

लेकिन संस्कृत के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं ने जो क्रांतिकारी काम किया, वह भारतीय इतिहास का सबसे स्वर्णिम अध्याय है। उन्होंने कहा कि संस्कृत के गूढ़ ज्ञान को आम जनता तक पहुंचाने का कठिन कार्य हमारी लोक भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों ने किया।

  • रामायण और रामचरितमानस: गोस्वामी तुलसीदास ने संस्कृत के महाकाव्य के मर्म को अवधी भाषा में रामचरितमानस के जरिए घर-घर तक पहुंचाया।
  • संत कवियों का योगदान: सूरदास और अन्य तमाम संत कवियों ने लोक भाषाओं में अपनी रचनाएं रचीं, जिससे समाज का हर तबका भावनात्मक रूप से एक-सूत्र में बंध गया।
  • संवैधानिक मान्यता: आज भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 आधिकारिक भाषाओं को स्थान मिला है, जबकि देश के कोने-कोने में हजारों की संख्या में क्षेत्रीय बोलियां बोली जाती हैं। यही विविधता हमारी असली ताकत है।

क्षेत्रीय भाषाओं ने कैसे थामी राष्ट्र की डोर?

अपने संबोधन के अंत में डॉ. नीलकंठ तिवारी ने मुख्य निष्कर्ष रखते हुए कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं ने केवल हमारे साहित्य को ही अमीर नहीं बनाया, बल्कि भारत की रक्षा, उसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक अखंडता तथा राष्ट्रीयता के निर्माण में रीढ़ की हड्डी का काम किया है।

भारत जैसे विशाल और बहु-सांस्कृतिक देश में जहां कदम-कदम पर पानी और वाणी बदल जाती है, वहां अलग-अलग क्षेत्रों की भाषाओं ने कभी दूरियां नहीं बढ़ाईं, बल्कि एक मजबूत धागे की तरह पूरे राष्ट्र को आपस में पिरोकर रखा। भाषा ने अलग-अलग भूभागों, अलग-अलग परंपराओं और विभिन्न समाजों को आपस में जोड़ते हुए राष्ट्रीय चेतना को अमर कर दिया। यही कारण है कि आज भी भारत की भाषाई और सांस्कृतिक एकता दुनिया भर के लिए एक अजूबा और प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

इस उच्च स्तरीय समागम ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि जब तक हमारी क्षेत्रीय भाषाएं और मातृभाषाएं जीवित हैं, तब तक भारत की सांस्कृतिक आत्मा को कोई आंच नहीं आ सकती। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी इन अनमोल धरोहरों पर गर्व करें और आने वाली पीढ़ियों तक इस थाती को सुरक्षित पहुंचाएं।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

Writer (स्थानीय खबरें)

रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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