महाराष्ट्र की आर्थिक राजधानी मुंबई की सियासत में आज का दिन बेहद सरगर्मी भरा रहा है। रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को शहर की सड़कों पर एक ऐसा राजनीतिक नजारा देखने को मिला, जिसने सूबे से लेकर देश की राजधानी तक के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे ने एक साझा विरोध मार्च निकाला है। चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर खड़े किए गए सवालों के बीच इन दोनों धुर विरोधियों का एक मंच पर आना राजनीतिक जानकारों को भी हैरान कर रहा है।
बायकुला से सीएसएमटी तक विरोध मार्च का रूट
तय कार्यक्रम के अनुसार, यह संयुक्त विरोध मार्च आज सुबह करीब साढ़े ग्यारह बजे मुंबई के ऐतिहासिक बायकुला इलाके से शुरू हुआ और छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT) की तरफ आगे बढ़ा। शुरुआत में इस मार्च को बीएमसी (BMC) मुख्यालय तक ले जाने की योजना बनाई गई थी, लेकिन सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों के चलते बाद में इसके रूट में बदलाव किया गया। खास बात यह रही कि इस प्रदर्शन को आम राजनीतिक आयोजनों से अलग दिखाने के लिए ठाकरे गुट और मनसे की तरफ से खास अपील की गई थी। प्रदर्शनकारियों से कहा गया था कि वे अपने-अपने दलों के पारंपरिक झंडों के बजाय केवल तिरंगे झंडे के साथ सड़कों पर उतरें, ताकि यह लड़ाई पूरी तरह से लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के सम्मान से जुड़ी नजर आए।
इस बड़े राजनीतिक प्रदर्शन को लेकर मुंबई पुलिस ने भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। बायकुला से लेकर सीएसएमटी तक के पूरे मार्ग पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस प्रशासन ने पहले ही सभी जरूरी मंजूरियों और सुरक्षा स्तरों की समीक्षा कर ली थी।
विपक्षी दलों का समर्थन और आगे की बड़ी रणनीतियां
उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के नेतृत्व में निकाले जा रहे इस मार्च को कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार गुट) समेत तमाम विपक्षी दलों ने खुला समर्थन दिया है। आयोजकों का साफ कहना है कि इस विरोध प्रदर्शन का मकसद किसी एक राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाना या किसी व्यक्तिगत राजनीतिक हित साधना नहीं है, बल्कि यह देश की चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर उठ रहे गंभीर सवालों का जवाब मांगने के लिए है।
शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ सांसद संजय राउत ने इस मुद्दे पर तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि यह केवल एक राजनीतिक दलों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह देश के नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा से जुड़ा हुआ गंभीर मामला है। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग दोहराई। राउत का आरोप है कि हालिया चुनावों और मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां हुई हैं, जिससे आम जनता का भरोसा डगमगाया है। हालांकि, चुनाव आयोग और सत्ता पक्ष ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
महाराष्ट्र तक ही यह विरोध सीमित नहीं रहने वाला है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने मुंबई के शिवाजी पार्क में हुए प्रदर्शन के बाद यह घोषणा की है कि आगामी 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ एक बड़ा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा।
सत्ता पक्ष का तीखा पलटवार, भाजपा ने कांग्रेस को घेरा
विपक्ष के इन हमलों और सड़कों पर उतरे विरोध प्रदर्शनों पर भारतीय जनता पार्टी ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस पार्टी पर पलटवार करते हुए तीखे सवाल दागे हैं। सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से सवाल पूछते हुए कहा, 'जब आपका आंतरिक संगठनात्मक चुनाव हुआ था, तब कांग्रेस पार्टी के भीतर से ही कई नेताओं ने आवाज उठाई थी कि कम से कम निर्वाचक मंडल (इलेक्टोरल कॉलेज) की सूची ही सार्वजनिक कर दी जाए। लेकिन कांग्रेस ने वह सूची कभी साझा नहीं की। ऐसे में सबसे पहला और बड़ा सवाल तो यह उठता है कि क्या कांग्रेस अध्यक्ष पद का आपका अपना चुनाव ही वैध है?'
भाजपा का यह भी तर्क है कि विपक्ष जब लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाता है, तो वह केवल अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर रहा होता है। पार्टी नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक और निष्पक्ष संस्था है, जिसके कामकाज में इस तरह का अनावश्यक राजनीतिक हस्तक्षेप देश की लोकतांत्रिक परंपराओं के लिए ठीक नहीं है।
एसआईआर (SIR) विवाद और गहराता संकट
इस पूरे विवाद के केंद्र में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) है। विपक्षी दलों का दावा है कि इस प्रक्रिया के नाम पर आम मतदाताओं के अधिकारों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है और सूची से नामों को हटाने में मनमानी की जा रही है। पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र में इसको लेकर लगातार विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। 2 अक्टूबर को भी शिवाजी पार्क में इसी मांग को लेकर एक विरोध प्रदर्शन देखा गया था, और अब 4 अक्टूबर को इस बड़े मार्च ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना दिया है।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इन तमाम राजनीतिक दलों के आरोपों पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है और क्या दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाला आगामी प्रदर्शन इस सियासी आग को और भड़काता है या नहीं। फिलहाल, मुंबई की सड़कों पर चल रहा यह विरोध प्रदर्शन महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए और बड़े संघर्ष का संकेत दे रहा है।