धार्मिक नगरी उज्जैन में सोमवार, 14 सितंबर 2026 को गणेश चतुर्थी का पर्व बेहद भव्य और दिव्य रूप में मनाया जा रहा है। इस पावन अवसर पर विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में देवाधिदेव महादेव भगवान महाकाल का एक अत्यंत दुर्लभ और मनमोहक स्वरूप देखने को मिला। तड़के होने वाली प्रसिद्ध भस्म आरती के दौरान बाबा महाकाल का प्रथम पूज्य भगवान गणेश के रूप में अलौकिक श्रृंगार किया गया। इस मनमोहक दृश्य को देखने के लिए देश के कोने-कोने से पहुंचे श्रद्धालु अभिभूत नजर आए।
तड़के चार बजे खुले पट, पंचामृत अभिषेक से हुई शुरुआत
सोमवार की सुबह निर्धारित समयानुसार ठीक चार बजे मंदिर के कपाट खोले गए। पट खुलते ही पूरा मंदिर परिसर 'जय महाकाल' के जयकारों से गूंज उठा। इसके बाद मंदिर के पंडे-पुजारियों और पुरोहितों ने गर्भगृह में प्रवेश कर सभी स्थापित देवी-देवताओं का विधिवत पूजन किया। परंपरा के अनुसार, सबसे पहले भगवान महाकाल का पवित्र जल से जलाभिषेक किया गया।
जलाभिषेक के पश्चात दूध, दही, घी, शहद, शक्कर और फलों के रस से तैयार किए गए विशेष पंचामृत से भगवान का महाभिषेक संपन्न हुआ। इस दौरान वैदिक मंत्रोच्चार से पूरा मंदिर परिसर गुंजायमान हो रहा था, जिससे वातावरण पूरी तरह से आध्यात्मिक और ऊर्जावान बन गया था।
भांग और चंदन से सजा गणेश स्वरूप
गणेश चतुर्थी के विशेष पर्व पर भगवान महाकाल के श्रृंगार में विशेष रूप से भांग और चंदन का लेपन किया गया। त्रिपुंड और अन्य पारंपरिक आभूषणों से सजे बाबा महाकाल का यह रूप बिल्कुल वैसा ही प्रतीत हो रहा था जैसे स्वयं विघ्नहर्ता गणेश जी विराजमान हों।
- दिव्य श्रृंगार: मोगरे और ताजे गुलाब के सुगंधित पुष्पों की मालाओं से बाबा का भव्य अलंकरण किया गया।
- रजत आभूषण: गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर बाबा को विशेष रूप से रजत आभूषण और शेषनाग का रजत मुकुट धारण कराया गया।
- मालाएं: रजत मुण्डमाला और रुद्राक्ष की सुंदर मालाओं से महाकाल का स्वरूप और भी अधिक तेजोमय लग रहा था।
भस्म आरती और परंपराओं का निर्वहन
श्रृंगार प्रक्रिया पूरी होने के बाद भस्म अर्पण की मुख्य रस्म शुरू हुई। भस्म चढ़ाने से पहले प्रथम घंटाल बजाकर मंत्रोच्चार के साथ भगवान का ध्यान किया गया। इसके बाद हरिओम का जल अर्पित कर कपूर आरती उतारी गई। परंपरा का पालन करते हुए ज्योतिर्लिंग को एक पवित्र वस्त्र से ढंका गया और इसके बाद महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई।
हिन्दू धर्म और महाकाल मंदिर की परंपराओं में भस्म आरती का अत्यधिक महत्व है। ऐसी मान्यता है कि जब भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है, तो वे निराकार से साकार रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि इस आरती में शामिल होने के लिए देश और दुनिया से श्रद्धालु मीलों का सफर तय करके उज्जैन पहुंचते हैं।
श्रद्धालुओं का उमड़ा जनसैलाब, नंदी हॉल से गूंजे जयकारे
सोमवार और गणेश चतुर्थी का दुर्लभ संयोग होने के कारण आज महाकाल मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिली। भस्म आरती के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे जिन्होंने बाबा के गणेश स्वरूप के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। आरती के बाद भगवान को फल और मिष्ठान का विशेष भोग लगाया गया।
हजारों की संख्या में पहुंचे भक्तों ने मंदिर परिसर में नंदी महाराज के दर्शन किए और उनकी प्रतिमा के कान में अपनी मनोकामनाएं कहीं। ऐसी अटूट मान्यता है कि नंदी जी के कान में कही गई हर मनोकामना सीधी भगवान महाकाल तक पहुंचती है और अवश्य पूरी होती है।
सुरक्षा और व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम
त्योहार के मद्देनजर जिला प्रशासन और मंदिर समिति ने सुरक्षा तथा दर्शन व्यवस्था के कड़े इंतजाम किए थे ताकि किसी भी श्रद्धालु को असुविधा का सामना न करना पड़े। वीआईपी और सामान्य दर्शनार्थियों के लिए अलग-अलग कतारों की व्यवस्था की गई थी। दर्शन के बाद श्रद्धालुओं ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि गणेश स्वरूप में बाबा महाकाल के दर्शन करना उनके जीवन का सबसे सुखद और अविस्मरणीय अनुभव रहा है।
उज्जैन का यह पावन दिन एक बार फिर से शिव और गणेश की संयुक्त आराधना का गवाह बना है, जिससे संपूर्ण मालवा अंचल पूरी तरह से भक्तिमय रंग में रंग चुका है।