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यूपी के पूर्व प्रधानों को झटका: प्रशासक रहते नहीं मिलेगा मानदेय, शासन ने साफ की स्थिति

यूपी के पूर्व प्रधानों को झटका: प्रशासक रहते नहीं मिलेगा मानदेय, शासन ने साफ की स्थिति

उत्तर प्रदेश के लाखों ग्रामीण इलाकों से जुड़े एक बेहद अहम और बड़े अपडेट सामने आ रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि आपके गांव की कमान संभाल रहे पूर्व प्रधानों को इन दिनों सरकार की तरफ से कोई वित्तीय भत्ता या मानदेय मिल रहा है या नहीं? अगर आपके मन में भी यही सवाल है, तो उत्तर प्रदेश शासन ने इस पर अब पूरी तरह से स्थिति साफ कर दी है।

मई महीने में त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल पूरा होने के बाद ग्राम प्रधानों को प्रशासक (Administrator) के रूप में कार्य करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अब शासन ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासक के रूप में कार्य कर रहे इन पूर्व जनप्रतिनिधियों को किसी भी प्रकार का मानदेय नहीं दिया जाएगा। आइए जानते हैं इस पूरे मामले की पूरी और विस्तृत जानकारी।

क्यों उठाया गया यह सवाल और क्या है शासन का रुख?

बीते कुछ हफ्तों से लगातार यह चर्चा गर्म थी कि कार्यकाल खत्म होने के बावजूद जब ग्राम प्रधान गांव के विकास कार्यों और प्रशासनिक कामों को संभाल रहे हैं, तो उन्हें पहले की तरह वित्तीय लाभ या मानदेय मिलना जारी रहना चाहिए। कई स्तरों पर इसे लेकर मांग भी उठाई गई थी।

लेकिन शासन के उच्च सूत्रों और पंचायती राज विभाग से जो संकेत मिले हैं, उन्होंने इन तमाम उम्मीदों पर विराम लगा दिया है। शासन का तर्क सीधा और स्पष्ट है—'चुनिंदा प्रतिनिधि' और 'प्रशासक' की भूमिका में जमीन-आसमान का फर्क होता है। चूंकि वर्तमान में ये सभी लोग निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं रह गए हैं, इसलिए वे किसी भी रूप में मानदेय पाने के हकदार नहीं हैं।

कितना मिलता था मानदेय और क्या है नियम?

आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में कुल 58,213 ग्राम पंचायतें, 827 क्षेत्र पंचायतें और 75 जिला पंचायतें हैं। जब ये त्रिस्तरीय पंचायतें अपने पूर्ण कार्यकाल में होती हैं, तो इनके चुनिंदा पदाधिकारियों के लिए मानदेय का स्पष्ट प्रावधान होता है:

  • ग्राम प्रधान: 5,000 रुपये प्रति माह
  • ब्लॉक प्रमुख (क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष): 11,300 रुपये प्रति माह
  • जिला पंचायत अध्यक्ष: 15,500 रुपये प्रति माह

लेकिन जैसे ही इनका कार्यकाल समाप्त होता है और वे केवल प्रशासक की भूमिका में आ जाते हैं, यह वित्तीय सहायता बंद हो जाती है। विभागीय नियमों के मुताबिक, जब कभी भी प्रशासनिक व्यवस्था के तहत एडीओ (ADO) पंचायत को भी प्रशासक बनाया जाता था, तो उन्हें भी इस अवधि में कोई अतिरिक्त मानदेय नहीं दिया जाता था। यही नियम अब प्रशासक बनाए गए पूर्व प्रधानों पर भी पूरी तरह से लागू होता है।

गांव के विकास कार्यों पर क्या पड़ेगा असर?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मानदेय न मिलने से गांवों में चल रहे विकास कार्यों पर कोई असर पड़ेगा? विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासक के रूप में कार्य करने का मुख्य उद्देश्य केवल और केवल प्रशासनिक शून्यता (Administrative Vacuum) को रोकना है। ताकि गांव के जरूरी काम, जैसे जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, छोटे-मोटे भुगतान और आपातकालीन कार्य रुके न।

हालांकि, पूर्व प्रधानों के एक बड़े वर्ग में इस बात को लेकर मायूसी जरूर है कि बिना मानदेय के प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाना उनके लिए मानसिक और व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो रहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: क्या कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को मानदेय मिलेगा?

उत्तर: नहीं, शासन ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासक के रूप में कार्य कर रहे पूर्व ग्राम प्रधानों को मानदेय नहीं मिलेगा क्योंकि वे अब निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं हैं।

Q2: यूपी में ग्राम प्रधानों को प्रति माह कितना मानदेय मिलता था?

उत्तर: अपने कार्यकाल के दौरान उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को प्रति माह 5,000 रुपये का मानदेय मिलता था।

Q3: वर्तमान में ग्राम प्रधान किस पद पर कार्य कर रहे हैं?

उत्तर: मई में कार्यकाल समाप्त होने के बाद अब वे प्रशासक के तौर पर पंचायतों के जरूरी कामकाज को संभाल रहे हैं, जब तक कि नए पंचायत चुनाव संपन्न नहीं हो जाते।

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गुंजा पांडेय

गुंजा पांडेय

Chief Sub Editor

गुंजा पांडेय तेज़ी से बदलती खबरों की दुनिया में अपनी पकड़ के लिए जानी जाती हैं। वे खेल और विज्ञान जैसे विषयों को न सिर्फ अपडेटेड रखती हैं, बल्कि उन...

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