हिमालयी राज्यों में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव ने पर्यावरणविदों और शासन-प्रशासन की नींद उड़ा दी है। हाल ही में सामने आए आंकड़े डराने वाले हैं। देवभूमि उत्तराखंड में विज्ञानियों और शोधकर्ताओं ने कुल 344 हिमनद झीलों (ग्लेशियल लेक्स) की पहचान की है। ये झीलें ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित हैं, और इनमें से कई का आकार लगातार बढ़ रहा है, जो आने वाले समय में बड़ी प्राकृतिक आपदा का कारण बन सकती हैं।
खतरे की घंटी: 13 हाई रिस्क वाली झीलें
राज्य के संवेदनशील इलाकों में लगातार हो रहे भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों से पता चला है कि इन 344 झीलों में से 13 झीलें ऐसी हैं जिन्हें बेहद 'हाई रिस्क' (अत्यधिक जोखिम वाली) श्रेणी में रखा गया है। इन झीलों के फटने या इनके जलस्तर में अचानक भारी वृद्धि होने से नीचे बसी बस्तियों, जलविद्युत परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंच सकता है। यही वजह है कि प्रशासन ने इन पर अपनी पैनी नजर गड़ा दी है और युद्ध स्तर पर अध्ययन शुरू कर दिया गया है।
सुरक्षा के एहतियाती कदमों के तहत, इन 13 अति-संवेदनशील झीलों में से छह झीलों का 'बैथीमेट्री सर्वे' (Bathymetric Survey) सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। इस सर्वे के जरिए झीलों की गहराई, उनके भीतर जमा तलछट (sediments) और पानी की कुल मात्रा का सटीक आकलन किया जाता है, ताकि समय रहते ठोस कदम उठाए जा सकें।
क्या होता है बैथीमेट्री सर्वे और क्यों है यह जरूरी?
आम भाषा में समझें तो बैथीमेट्री सर्वे पानी के भीतर की टोपोग्राफी या गहराई मापने की वैज्ञानिक तकनीक है। इसके माध्यम से वैज्ञानिकों को निम्नलिखित अहम जानकारियां मिलती हैं:
- झील की अधिकतम और औसत गहराई कितनी है।
- झील के अंदर पानी की कुल क्षमता (Volume) क्या है।
- भविष्य में यदि कोई आपदा आती है, तो पानी का बहाव किस दिशा में और कितनी तेजी से होगा।
- ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार और झील के विस्तार की गति क्या है।
इन छह झीलों का सर्वे पूरा होने के बाद अब विशेषज्ञों के पास पुख्ता आंकड़े उपलब्ध हैं। इन आंकड़ों के आधार पर ही आगे की कार्ययोजना तैयार की जा रही है ताकि किसी भी संभावित आपदा से पहले ही बचाव के पुख्ता इंतजाम किए जा सकें।
जलवायु परिवर्तन का असर और भविष्य की चुनौतियां
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो उनके मलबे (मोरैन) के पीछे पानी इकट्ठा होने लगता है और प्राकृतिक झीलों का निर्माण होता है। इन झीलों की दीवारें अक्सर कमजोर होती हैं और अत्यधिक बारिश या भूकंपीय गतिविधियों के कारण ये अचानक टूट सकती हैं, जिसे 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOF) कहा जाता है।
उत्तराखंड का पिछला इतिहास ऐसी कई घटनाओं का गवाह रहा है, जहां अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी। साल 2013 की केदारनाथ आपदा और हाल के वर्षों में चमोली जिले में हुई घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि पहाड़ों में प्रकृति के साथ हो रहे खिलवाड़ और जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम कितने भयानक हो सकते हैं। यही कारण है कि इस बार सरकार और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं हैं।
बाकी झीलों पर भी जल्द शुरू होगा काम
प्रशासनिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जिन छह झीलों का बैथीमेट्री सर्वे पूरा हो चुका है, उनकी रिपोर्ट का गहराई से विश्लेषण किया जा रहा है। इसके साथ ही, बाकी बची हुई हाई रिस्क झीलों और अन्य जलस्रोतों का सर्वे भी तय समय सीमा के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए आधुनिक तकनीकों, ड्रोन मैपिंग और सैटेलाइट इमेजरी की मदद ली जा रही है ताकि दुर्गम इलाकों में भी सटीक डेटा जुटाया जा सके.
आम जनता और पर्यटकों के लिए चेतावनी
प्रशासन ने पर्यटकों और स्थानीय लोगों से अपील की है कि वे अत्यधिक ऊंचाई वाले और संवेदनशील ग्लेशियल क्षेत्रों में यात्रा के दौरान पूरी सावधानी बरतें। मौसम विभाग की चेतावनियों को नजरअंदाज न करें और स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करें।
यह पूरा घटनाक्रम न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते इन प्राकृतिक झीलों के प्रबंधन और जल निकासी (Water Drainage) के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए, तो आने वाले दिनों में यह बड़ी मुसीबत का सबब बन सकता है। फिलहाल, वैज्ञानिकों और प्रशासन की यह संयुक्त पहल एक सकारात्मक कदम जरूर है, लेकिन असली परीक्षा इन आंकड़ों के आधार पर जमीन पर उतारे जाने वाले सुरक्षा उपायों की होगी।