कानपुर के बहुचर्चित बिकरू कांड के मुख्य आरोपी और दुर्दांत अपराधी विकास दुबे को दुनिया छोड़े हुए लंबा वक्त बीत चुका है, लेकिन सरकारी फाइलों और कागजातों की दुनिया में वह आज भी जिंदा है। साल 2020 के जुलाई महीने में हुए उस खौफनाक एनकाउंटर को आज छह साल पूरे होने को हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि पुलिस और प्रशासन की फाइलों में उसका मृत्यु प्रमाण पत्र (Death Certificate) अब तक जारी नहीं किया जा सका है। इस तकनीकी पेंच ने कई कानूनी और प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके चलते अब जाकर मामला तूल पकड़ रहा है.
क्या है दस्तावेजों में इस देरी की मुख्य वजह?
आखिर एक कुख्यात अपराधी, जिसे पुलिस ने मुठभेड़ में ढेर कर दिया था, उसका डेथ सर्टिफिकेट छह साल बाद भी क्यों नहीं बन पाया? इस सवाल के पीछे एक बेहद मामूली लेकिन गंभीर कागजी भूल सामने आई है। शुरुआती दौर में जब पुलिस ने विकास दुबे का शव परिजनों को सौंपने की प्रक्रिया पूरी की और बॉडी डिस्पोजल स्लिप तैयार की, तो उसमें उसके पिता के नाम में एक टाइपोग्राफिकल या क्लर्कल गलती हो गई।
दस्तावेजों में विकास दुबे के पिता का नाम 'रामकुमार दुबे' की जगह गलती से 'राजकुमार दुबे' दर्ज हो गया। बस यही एक छोटी सी गलती प्रशासनिक तंत्र के लिए एक बड़ा अड़ंगा बन गई। इसी विसंगति के कारण स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम से उसका मृत्यु प्रमाण पत्र जारी नहीं हो सका। सरकारी नियमों के मुताबिक, जब तक कागजों में नाम का यह मिलान पूरी तरह से सही नहीं हो जाता, तब तक किसी भी मृत व्यक्ति का मृत्यु प्रमाणपत्र आधिकारिक रूप से तैयार नहीं किया जा सकता है।
हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद हरकत में आया प्रशासन
मृत्यु प्रमाण पत्र न बन पाने के कारण जब तमाम परेशानियां बढ़ने लगीं और विकास दुबे की पत्नी को अपने कानूनी अधिकारों के लिए दर-दर भटकना पड़ा, तब उन्होंने न्याय की गुहार लगाते हुए माननीय उच्च न्यायालय (High Court) का दरवाजा खटखटाया। उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल होने के बाद स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर दबाव बढ़ा।
अदालत के सख्त रुख और निर्देशों के बाद मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. हरिदत्त नेमी खुद सक्रिय हुए। उन्होंने मामले की गंभीरता को समझते हुए सीधे कानपुर के पोस्टमार्टम हाउस का औचक निरीक्षण किया और वहां रखे पुराने दस्तावेजों व फाइलों की बारीकी से जांच-पड़ताल की। सीएमओ ने मीडिया से बातचीत करते हुए स्पष्ट किया कि पुलिस विभाग की ओर से जैसे ही संशोधित रिपोर्ट और सही विवरण उपलब्ध करा दिया जाएगा, नाम में सुधार कर दिया जाएगा। इसके बाद पूरी आख्या (रिपोर्ट) न्यायालय को भेज दी जाएगी ताकि आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी हो सके।
बिकरू कांड: वह काली रात जिसने हिला दिया था पूरा देश
यह पूरा मामला 2 जुलाई 2020 की उस खौफनाक रात से जुड़ा है, जिसने पूरे उत्तर प्रदेश सहित देश को झकझोर कर रख दिया था। कानपुर के चौबेपुर क्षेत्र के बिकरू गांव में पुलिस दबिश देने गई थी। कुख्यात अपराधी विकास दुबे और उसके खतरनाक गुर्गों ने घात लगाकर पुलिस दल पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी थी। इस कायराना हमले में क्षेत्राधिकारी (CO) सहित आठ पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे।
इस जघन्य हत्याकांड के बाद उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और स्थानीय पुलिस ने युद्धस्तर पर अभियान चलाया था। पुलिस ने न केवल बिकरू गांव बल्कि आसपास के इलाकों में भी दबिश दी और एनकाउंटर में विकास दुबे समेत कुल 6 बदमाशों को ढेर कर दिया था। मुख्य आरोपी विकास दुबे को एसटीएफ मध्य प्रदेश के उज्जैन से गिरफ्तार करके कानपुर ला रही थी। इसी दौरान संचेडी थाने के पास कथित तौर पर पुलिस वाहन पलटने और उसके बाद भागने की कोशिश के दौरान हुई मुठभेड़ में विकास दुबे मारा गया था।
मृत्यु प्रमाण पत्र न होने से अटकी हैं कई संपत्तियां और बीमा पॉलिसी
कानूनी रूप से डेथ सर्टिफिकेट न होने के कारण विकास दुबे के परिवार को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कागजों में जिंदा होने की वजह से उसके नाम पर दर्ज संपत्तियों और वित्तीय मामलों का निपटारा नहीं हो पा रहा है:
- बीमा पॉलिसी का भुगतान: विकास दुबे के नाम पर कई बीमा (Insurance) पॉलिसी थीं। मृत्यु प्रमाण पत्र के अभाव में कानूनी उत्तराधिकारियों या नॉमिनी को उन पॉलिसियों का क्लेम नहीं मिल पा रहा है।
- जमीन और अचल संपत्तियां: उसके नाम से खरीदी गई जमीन और अन्य अचल संपत्तियों का नामांतरण (Mutation) उसकी पत्नी या परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर ट्रांसफर नहीं हो सका है।
- कानूनी अड़चनें: कई अन्य प्रकार के विधिक कार्यों और पारिवारिक उत्तराधिकार के दावों में भी यह कागजात न होना एक बड़ा रोड़ा बना हुआ है।
आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया
उच्च न्यायालय के निर्देश और सीएमओ के ताजा दौरे के बाद अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही दस्तावेजों में सुधार कर लिया जाएगा। पुलिस रिकॉर्ड और पोस्टमार्टम हाउस के दस्तावेजों में पिता के नाम की गलती को ठीक करने के लिए प्रशासनिक अमला तेजी से काम कर रहा है। जैसे ही यह सुधार प्रक्रिया पूरी होगी, वैसे ही बहुप्रतीक्षित मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाएगा, जिससे वर्षों से चली आ रही इस कानूनी उलझन का अंत हो सके।
यह मामला इस बात का भी एक बड़ा उदाहरण है कि कैसे एक छोटी सी टाइपिंग या नाम की गलती प्रशासनिक और कानूनी तंत्र में किस तरह बरसों तक फाइलों को उलझाए रख सकती है, जिससे आम नागरिकों के साथ-साथ कानूनी प्रक्रियाओं में भी भारी विलंब होता है।
