मध्य पूर्व में फिर गरमाया माहौल, मारिब पर सऊदी गठबंधन का पलटवार
मिडल ईस्ट के भू-राजनीतिक मानचित्र पर एक बार फिर हिंसा और तनाव के काले बादल मंडराने लगे हैं। यमन के रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण शहर मारिब पर सऊदी नीत गठबंधन ने भीषण हवाई हमले किए हैं। यह सैन्य कार्रवाई ऐसे समय में सामने आई है जब कुछ समय पहले ही यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के प्रमुख तेल प्रतिष्ठानों और सामरिक हवाई अड्डों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमलों की बौछार कर दी थी। इस ताज़ा सैन्य टकराव ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नींद उड़ा दी है, क्योंकि इस क्षेत्र की अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ना तय माना जा रहा है।
हूती विद्रोहियों और सऊदी गठबंधन के बीच चल रहा यह संघर्ष कोई नया नहीं है, लेकिन पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से हमलों की तीव्रता बढ़ी है, उसने इस दशक के सबसे बड़े क्षेत्रीय संकट को फिर से जिंदा कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति दोनों पक्षों के बीच किसी बड़े और निर्णायक सैन्य संघर्ष की शुरुआत का संकेत हो सकती है। आम नागरिकों के लिए यह दौर भारी अनिश्चितता और खौफ लेकर आया है, जो अपनी जान बचाने के लिए सुरक्षित ठिकानों की तलाश में भटक रहे हैं।
सऊदी अरामको पर हमले के बाद भड़का रियाद
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के ऊर्जा बुनियादी ढाचे पर किए गए दुस्साहसिक हमले हैं। विद्रोही गुट ने सऊदी अरामको (Saudi Aramco) की तेल सुविधाओं और देश के चुनिंदा सैन्य एयरबेस पर एक साथ कई ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलें दाग दी थीं। हालांकि सऊदी रक्षा प्रणालियों ने इनमें से अधिकांश हमलों को हवा में ही नाकाम करने का दावा किया था, फिर भी इन हमलों ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों में सनसनी फैला दी थी।
सऊदी अरब के नीति निर्माताओं के लिए यह हमला केवल एक सैन्य चुनौती नहीं, बल्कि उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता पर सीधा प्रहार था। दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देशों में शुमार सऊदी अरब ने इसे बेहद गंभीरता से लिया और इसके तुरंत बाद यमन के भीतर हूती ठिकानों को नेस्तनाबूद करने के लिए अपने लड़ाकू विमानों को आसमान में उतार दिया।
मारिब शहर क्यों बना इस जंग का सबसे बड़ा अखाड़ा?
यमन का मारिब शहर इस समय दोनों पक्षों के बीच वर्चस्व की लड़ाई का केंद्र बिंदु बन चुका है। मारिब पर नियंत्रण हासिल करना हूती विद्रोहियों और सऊदी समर्थित सरकार दोनों के लिए रणनीतिक रूप से जीवन-मरण का प्रश्न है। आइए जानते हैं कि यह क्षेत्र इतना महत्वपूर्ण क्यों है:
- तेल और गैस के अपार भंडार: मारिब यमन का मुख्य ऊर्जा केंद्र है, जहां देश के सबसे बड़े तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार मौजूद हैं। इस क्षेत्र पर नियंत्रण रखने का मतलब है देश की अर्थव्यवस्था की चाबी अपने हाथ में होना।
- उत्तर यमन का प्रवेश द्वार: यह शहर सामरिक दृष्टि से एक अहम जंक्शन है जो उत्तर और दक्षिण यमन को जोड़ता है। सैन्य अभियानों के संचालन के लिए हर पक्ष इसे अपने कब्जे में रखना चाहता है।
- शरणार्थियों का ठिकाना: यमन के गृहयुद्ध के दौरान देश के अन्य हिस्सों से विस्थापित हुए लाखों लोगों ने मारिब में शरण ली है, जिससे यहाँ मानवीय संकट हमेशा बना रहता है।
- भौगोलिक स्थिति: पहाड़ों से घिरे होने के कारण यह क्षेत्र प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करता है, जिस वजह से यहाँ सैन्य बढ़त हासिल करना बेहद कठिन माना जाता है।
हवाई हमलों के बाद ज़मीनी हालात बेहद भयावह
सऊदी गठबंधन द्वारा मारिब पर बरसाए गए बमों के बाद ज़मीन पर हालात बेहद भयावह हो चुके हैं। स्थानीय सूत्रों से मिल रही शुरुआती जानकारियों के अनुसार, कई रिहायशी इलाकों और सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुँचा है। आसमान में हर तरफ धुएं के काले गुबार देखे जा सकते हैं और लड़ाकू विमानों की गड़गड़ाहट से पूरा इलाका थर्रा उठा है।
हालाँकि गठबंधन सेना का दावा है कि उनके ये हमले केवल हूती विद्रोहियों के कमांड सेंटरों, हथियारों के गोदामों और लॉन्च पैड्स को ध्यान में रखकर किए गए हैं, लेकिन युद्ध के इस दौर में सबसे ज्यादा कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ रही है। स्थानीय अस्पतालों में घायलों की संख्या लगातार बढ़ रही है और चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ रहा है गहरा असर
मारिब में भड़की इस नई जंग ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य पश्चिमी देशों की कूटनीतिक कोशिशों को करारा झटका दिया है। शांति वार्ताओं के जरिए इस दशक पुराने संकट को सुलझाने के जितने भी प्रयास अब तक किए गए थे, वे इन ताज़ा हमलों की भेंट चढ़ते नजर आ रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है, क्योंकि यमन पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकट का सामना कर रहा है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इस संघर्ष में क्षेत्रीय ताकतों की परोक्ष भागीदारी (Proxy War) स्थिति को और अधिक जटिल बना रही है। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई मजबूत और बाध्यकारी कूटनीतिक पहल नहीं की जाती, तब तक मिडल ईस्ट के इस हिस्से में शांति की उम्मीद करना बेमानी होगा।
आगे क्या हो सकता है?
आने वाले दिनों में इस संघर्ष का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि हूती विद्रोही सऊदी गठबंधन के इन हवाई हमलों का क्या जवाब देते हैं। यदि विद्रोही संगठन ने एक बार फिर सीमा पार से हमले करने की कोशिश की, तो यह संघर्ष और अधिक व्यापक रूप ले सकता है, जिससे पूरे क्षेत्र में एक पूर्ण युद्ध जैसे हालात पैदा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
फिलहाल, पूरी दुनिया की निगाहें मारिब की हर एक गतिविधि पर टिकी हुई हैं, जहाँ यमन का भविष्य एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा नजर आ रहा है।