प्रकृति जब अपना विकराल रूप दिखाती है, तो इंसान के बनाए तमाम साधन और तकनीकें खिलौना जैसी लगने लगती हैं। कुछ ऐसा ही मंजर हाल ही में नेपाल में देखने को मिला, जहां अचानक आई भीषण बाढ़ ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। इस तबाही के बीच एक ऐसी घटना सामने आई है जिस पर यकीन करना मुश्किल है, लेकिन वह शत-प्रतिशत सच है। मौत को बेहद करीब से देखने और उसके चंगुल से जिंदा वापस लौटने की यह दास्तान किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं है।
अचानक आई जलप्रलय और टनल का जाल
घटना के दिन आसमान से आफत बरस रही थी और चंद मिनटों में ही स्थानीय नदियां उफान पर आ गईं। पहाड़ों से नीचे की ओर बहता हुआ पानी अपने साथ भारी मलबा, चट्टानें और पेड़-पौधे लेकर आया। इसी दौरान हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट से जुड़ी एक भूमिगत वाटर टनल (सुरंग) इस जलप्रलय की चपेट में आ गई। उस टनल के अंदर दो कर्मचारी मौजूद थे, जिन्हें संभलने का मौका तक नहीं मिला।
देखते ही देखते टनल के मुहाने पर भारी मलबा जमा हो गया और अंदर पानी भर गया। बाहर मौजूद लोगों को लगा कि अब इन दोनों का बचना नामुमकिन है। तेज बहाव और घुप्प अंधेरे के बीच कोई उम्मीद की किरण नहीं बची थी। परिजनों ने भी मान लिया था कि कुदरत के इस कहर ने सब कुछ छीन लिया है।
अंधेरे के आगोश में जिंदगी की जंग
जैसे ही टनल में पानी घुसा, दोनों कर्मचारियों ने अपनी जान बचाने के लिए किसी तरह ऊपर के एक ऐसे हिस्से में शरण ली जहां पानी पूरी तरह नहीं पहुंच पाया था। लेकिन असली परीक्षा तो इसके बाद शुरू हुई। चारों तरफ मौत का सन्नाटा, दम घोंटता अंधेरा और ऊपर से पानी की लगातार आवाज़।
समय का कोई हिसाब नहीं था। दिन और रात का फर्क मिट चुका था। वे न तो बाहर किसी से संपर्क साध सकते थे और न ही उनके पास खाने के लिए कुछ ठोस था। केवल पीने के लिए पानी का एकमात्र स्रोत उनके पास था, जिसने किसी तरह उनके शरीर में जान बचाए रखी। मानसिक तनाव और ऑक्सीजन की कमी के बीच खुद को मानसिक रूप से मजबूत रखना सबसे बड़ी चुनौती थी।
कैसा बीता एक-एक पल?
उन नौ दिनों में हर गुजरता घंटा एक सदी की तरह बीत रहा था। जब भूख और कमजोरी से शरीर टूटने लगा, तब उनकी इच्छाशक्ति ने उन्हें थामे रखा। वे लगातार एक-दूसरे से बात करते रहे, पुरानी यादें ताजा करते रहे और खुद को दिलासा देते रहे कि कोई न कोई उन्हें बचाने जरूर आएगा।
- मानसिक दृढ़ता: निराशा के उन पलों में भी उन्होंने हार नहीं मानी और जीने की उम्मीद नहीं छोड़ी।
- संसाधनों की कमी: बिना भोजन के केवल पानी के सहारे शरीर की ऊर्जा को बनाए रखना किसी चमत्कार से कम नहीं था।
- परस्पर साथ: दो लोगों का एक साथ होना इस भीषण संकट में सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक सहारा साबित हुआ।
जब बाहर चल रहा था रेस्क्यू ऑपरेशन
दूसरी तरफ, बाहर प्रशासन और स्थानीय लोग राहत कार्य में जुटे हुए थे। मलबा इतना ज्यादा था कि उसे हटाने में भारी मशीनों को भी पसीने छूट रहे थे। किसी को यह अंदाजा नहीं था कि मलबे के उस विशाल ढेर के पीछे कोई जीवित भी हो सकता है। बचाव दल केवल मलबा साफ करने और लापता लोगों की तलाश करने के उद्देश्य से जुटा हुआ था।
दिन बीतते गए, सातवां दिन आया, फिर आठवां दिन बीता। उम्मीदें लगभग दम तोड़ चुकी थीं, लेकिन नौवें दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने सबको हैरान कर दिया।
नौवें दिन का चमत्कार
नौवें दिन जब बचाव दल ने टनल के एक हिस्से का मलबा पूरी तरह हटाकर अंदर प्रवेश किया, तो उन्हें अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। अंधेरे कोने से दो कमजोर, थके हुए लेकिन सांस लेते हुए इंसान बाहर आए। उनके चेहरे पर धूल और हताश के निशान थे, लेकिन आंखों में जीने की वह चमक थी जो तमाम मुश्किलों को चीरकर बाहर आई थी।
तुरंत उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला गया और प्राथमिक उपचार के लिए नजदीकी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने जब उनकी जांच की, तो वे भी हैरान रह गए कि बिना भोजन के नौ दिन तक कोई व्यक्ति कैसे जीवित रह सकता है। हालांकि, अत्यधिक कमजोरी और डिहाइड्रेशन के कारण उन्हें कुछ दिनों तक निगरानी में रखा गया।
निष्कर्ष: इंसानी जिजीविषा की जीत
यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि इंसान की जीने की इच्छा (Survival Instinct) दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है। जब चारों तरफ मौत मंडरा रही हो और सारे रास्ते बंद नजर आते हैं, तब भी उम्मीद का एक छोटा सा दिया अंधकार को चीर सकता है। नेपाल की इस टनल से बाहर आए दोनों शख्स आज न सिर्फ जीवित हैं, बल्कि वे पूरी दुनिया के लिए जीवटता और संघर्ष का एक जीता-जागता उदाहरण बन चुके हैं।