सिनेमा का इतिहास हमेशा से चमकीली रोशनी, ग्लैमर और तालियों की गड़गड़ाहट तक सीमित नहीं रहा है। इसके पीछे एक ऐसा स्याह और संघर्षपूर्ण पन्ना भी है, जहां पर्दे के पीछे के ड्रामे ने कई बार असल जिंदगी के रिश्तों को झकझोर कर रख दिया है। आज हम आपको भारतीय सिनेमा के उस सबसे बड़े और हैरान कर देने वाले विवाद के बारे में बताने जा रहे हैं, जो साल 1969 में शुरू हुआ था। इस वाकया ने न केवल उस दौर की व्यवस्था को हिला दिया था, बल्कि एक कलाकार के आत्मसम्मान और मानसिक स्थिति पर भी गहरा असर डाला था।
जब कैमरे के सामने टूट गईं अभिनेत्री
बात उन दिनों की है जब निर्देशक अपनी फिल्मों में कुछ ऐसा नया परोसना चाहते थे जो दर्शकों को अपनी सीटों से बांध ले। इसी होड़ में साल 1969 के दौरान एक ऐसी घटना घटी जिसकी गूंज लंबे समय तक बॉलीवुड के गलियारों में सुनाई देती रही। शूटिंग के दौरान एक ऐसा सीन फिल्माया जाना था, जिसकी स्क्रिप्ट के बारे में मुख्य अभिनेत्री को शायद पूरी तरह से अंदाजा नहीं था। जैसे ही निर्देशक ने 'एक्शन' बोला, सह-कलाकार ने अपनी सीमाएं लांघते हुए कुछ ऐसा कर दिया जिसकी उम्मीद उस अभिनेत्री ने कभी सपने में भी नहीं की थी।
इस अप्रत्याशित और आक्रामक हरकत से वह अभिनेत्री सेट पर ही सन्न रह गई। जैसे ही 'कट' हुआ, अभिनेत्री का सब्र टूट गया और वह फफक-फफक कर रो पड़ीं। उस दौर की पत्रिकाओं और अंदरूनी सूत्रों की मानें तो इस घटना ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था। सेट पर मौजूद तमाम लोग इस बात से अनजान थे कि एक सीन को 'रियलिस्टिक' दिखाने के चक्कर में किसी की गरिमा के साथ ऐसा खिलवाड़ हो जाएगा।
10 साल तक सेंसर बोर्ड के चक्कर काटती रही फिल्म
यह मामला सिर्फ एक सेट के विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर फिल्म के भविष्य पर भी पड़ा। जब यह फिल्म बनकर तैयार हुई और इसे सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) यानी सेंसर बोर्ड के पास भेजा गया, तो वहां भूचाल आ गया। बोर्ड के सदस्यों ने जब उस विवादित सीन को देखा, तो उन्होंने इसे भारतीय समाज और संस्कृति के खिलाफ मानते हुए तुरंत प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया।
निर्माता-निर्देशकों ने सीन को हटाने से साफ मना कर दिया, जिसके बाद शुरू हुआ कानूनी दांव-पेंच और सेंसरशिप का एक अंतहीन दौर। साल दर साल बीतते गए, सरकारें बदलीं, सिनेमैटोग्राफ एक्ट में संशोधन हुए, लेकिन उस फिल्म की फाइल एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर धूल फांकती रही। देखते ही देखते पूरे 10 साल बीत गए। एक दशक तक फिल्म का डिब्बे में बंद रहना अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड बन गया था।
क्या था उस सीन में ऐसा जो बना विवाद की जड़?
सवाल यह उठता है कि आखिर उस दृश्य में ऐसा क्या था जो इतने बड़े विवाद का कारण बना? जानकारों का मानना है कि उस दौर के लिहाज से वह सीन बेहद बोल्ड, हिंसक और असहज करने वाला था। जिस तरह से उसे शूट किया गया था, उसमें सहमति (Consent) के दायरे को ताक पर रख दिया गया था। भले ही आज के आधुनिक सिनेमा में इस तरह के विषयों पर खुलकर बात होती हो और अंतरंग दृश्यों या इंटिमेट सीन्स के लिए 'इंटीमेसी कोऑर्डिनेटर' रखे जाते हों, लेकिन 1960 के दशक में इन सब चीजों की कल्पना भी नहीं की गई थी।
कलाकारों के जीवन पर पड़ा गहरा प्रभाव
इस पूरे विवाद ने न सिर्फ फिल्म को नुकसान पहुंचाया, बल्कि इसमें काम करने वाले कलाकारों के करियर की दिशा भी बदल दी। जिस अभिनेत्री के साथ यह घटना घटी, उन्होंने इस सदमे से उबरने में काफी समय लिया। इस घटना के बाद उन्होंने इस तरह के विषयों और निर्देशकों से दूरी बना ली। वहीं, दूसरी ओर अभिनेता को भी इस विवाद के कारण भारी सामाजिक आलोचना का सामना करना पड़ा। हालांकि, समय के साथ सिनेमा ने करवट ली, लेकिन पुरानी यादें आज भी इस इंडस्ट्री के काले सच के रूप में दर्ज हैं।
आज के दौर से कितनी अलग थी वह दुनिया?
अगर आज के समय से तुलना करें, तो सिनेमा में काफी बदलाव आ चुका है। आज एक्टर्स के पास अपनी मर्जी से काम करने, स्क्रिप्ट पर खुलकर चर्चा करने और असहज होने पर सीन से इंकार करने का पूरा अधिकार होता है। फिल्म सेट पर अब 'सेफ वर्किंग एनवायरनमेंट' को प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन 1969 का वह दौर तानाशाही और निर्देशक की जिद का दौर माना जाता था, जहां कलाकारों की भावनाओं को दरकिनार कर केवल 'परफेक्शन' को अहमियत दी जाती थी।
निष्कर्ष
यह किस्सा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि मनोरंजन की दुनिया जितनी चमकदार बाहर से दिखती है, उसके अंदर उतनी ही गहरी और दर्दनाक कहानियां दबी होती हैं। 10 साल तक सेंसर की कैंची के नीचे सिसकने वाली यह फिल्म आज भले ही इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुकी हो, लेकिन यह घटना भारतीय सिनेमा के उन अध्यायों में से एक है जिसे कोई चाहकर भी भूला नहीं सकता।