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बाढ़ से पहले पता चलेगा कौन सा इलाका डूबेगा, 3डी डिजिटल ट्विन से होगा आंकलन

बाढ़ से पहले पता चलेगा कौन सा इलाका डूबेगा, 3डी डिजिटल ट्विन से होगा आंकलन

प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के तौर-तरीकों में अब तकनीक एक बड़ा बदलाव लेकर आ रही है। खासकर बाढ़ जैसी विभीषिका के दौरान होने वाले नुकसान को कम करने के लिए अब सटीक भविष्यवाणियों और उन्नत तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र वाराणसी (काशी) में एक बेहद अनूठी और क्रांतिकारी पहल की शुरुआत की गई है। अब बाढ़ आने के बाद राहत कार्यों में जुटने के बजाय, प्रशासन ने आपदा से पहले ही खतरे का सटीक आकलन करने की तैयारी कर ली है। इसके लिए 'थ्री-डी अर्बन स्पेशियल डिजिटल ट्विन' (3D Urban Spatial Digital Twin) तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसकी मदद से यह पहले ही पता लगाया जा सकेगा कि नदी का जलस्तर बढ़ने पर कौन-कौन से इलाके पानी में डूब सकते हैं।

पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर आधुनिक तकनीक की ओर कदम

भारत में अमूमन यह देखा गया है कि जब भी नदियां उफान पर होती हैं और बाढ़ के हालात बनते हैं, तब प्रशासन और राहत एजेंसियां पानी के गांवों या शहरी बस्तियों में घुसने के बाद सक्रिय होती हैं। हालांकि, बदलते वक्त और आधुनिक तकनीक के साथ अब इस परिदृश्य को बदलने की कोशिश हो रही है। डिजिटल ट्विन तकनीक के जरिए प्रशासनिक अमला अब एक केंद्रीयकृत डिजिटल मॉडल पर काम कर रहा है। इसके माध्यम से बाढ़ की स्थिति का पूर्वानुमान बहुत पहले ही लगाया जा सकेगा, जिससे समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और राहत सामग्री व संसाधनों की सही जगह पर तैनाती करने में आसानी होगी।

क्या है 'डिजिटल ट्विन' तकनीक और कैसे करती है काम?

आम भाषा में समझें तो 'डिजिटल ट्विन' किसी वास्तविक भौतिक दुनिया या भौगोलिक क्षेत्र की एक वर्चुअल या डिजिटल प्रतिकृति (Copy) होती है। कंप्यूटर स्क्रीन पर तैयार इस 3डी मॉडल के जरिए किसी भी शहर की भौगोलिक स्थिति, भवनों की ऊंचाई, सड़कों के नक्शे और जल निकास प्रणालियों का बारीकी से अध्ययन किया जा सकता है। वाराणसी में इस तकनीक का उपयोग शहरी नियोजन के साथ-साथ आपदा प्रबंधन के लिए पूर्वानुमान आधारित तैयारी के रूप में किया जा रहा है। जब गंगा नदी का जलस्तर बढ़ना शुरू होता है, तो यह डिजिटल मॉडल तुरंत सिमुलेशन के जरिए यह दिखा सकता है कि पानी बढ़ने पर शहर के किस वार्ड या किस मोहल्ले में कितनी गहराई तक पानी भर सकता है।

काशी के 160 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की हुई थ्री-डी मैपिंग

इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत वाराणसी के एक बहुत बड़े हिस्से को डिजिटल दायरे में लाया गया है। स्मार्ट सिटी के मुख्य महाप्रबंधक अमरेंद्र तिवारी से मिली जानकारी के अनुसार, काशी के करीब 160 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की विस्तृत थ्री-डी मैपिंग पूरी कर ली गई है। इस पूरी मैपिंग प्रक्रिया को बेहद बारीक स्तर पर अंजाम दिया गया है, जिसमें 100 से अधिक थीमैटिक लेयर (Thematic Layers) को शामिल किया गया है। इन लेयरों में जमीन की ऊंचाई-नीचाई (Topography), ड्रेनेज सिस्टम, आबादी घनत्व और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे का डेटा शामिल है। यही वजह है कि यह डिजिटल मॉडल प्रशासन के लिए एक अचूक हथियार साबित होने जा रहा है।

डूबने वाले घरों और प्रभावित इलाकों की होगी सटीक पहचान

अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) डॉ. सदानंद गुप्ता ने इस तकनीक के फायदों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा में समय पर मिलने वाली सटीक जानकारी ही इंसानी जिंदगियों और संपत्तियों को बचा सकती है। थ्री-डी डिजिटल ट्विन और जीआईएस (GIS) तकनीक के समन्वय से प्रशासन अब संभावित बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का पूर्व आकलन करने में सक्षम हो गया है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसकी मदद से निम्नलिखित बातों का पहले ही अनुमान लगाया जा सकता है:

  • गंगा नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर जाने पर कौन-कौन से क्षेत्र सबसे पहले जलमग्न होंगे।
  • शहर के किन विशिष्ट स्थानों और चौराहों पर पानी भरने से ट्रैफिक व्यवस्था ठप हो सकती है।
  • बाढ़ के पानी की चपेट में आने वाले संभावित घरों और रिहायशी इलाकों की सटीक संख्या।
  • किस इलाके में कितने लोग प्रभावित हो सकते हैं, जिससे विस्थापन की योजना आसानी से बने।

राहत शिविरों और बचाव दलों की रणनीतिक तैनाती

जब किसी आपदा के आने से पहले ही उसका पूरा पैमाना (Scale) पता चल जाता है, तो उससे मुकाबला करना आसान हो जाता है। इस डिजिटल मॉडल के आधार पर वाराणसी प्रशासन अब बाढ़ से निपटने के लिए एक पुख्ता और चरणबद्ध रणनीति तैयार कर रहा है। जरूरत के अनुसार राहत शिविरों (Relief Camps) की स्थापना उन इलाकों के नजदीक की जाएगी, जिनके इस तकनीक के जरिए सबसे पहले डूबने की संभावना होगी। इसके अलावा, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) की टीमों तथा मोटरबोट्स की तैनाती भी उन्हीं बिंदुओं पर की जाएगी जहां इनकी सबसे ज्यादा और तुरंत जरूरत होगी।

शहरी आपदा प्रबंधन के लिए एक नया मील का पत्थर

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के ऐतिहासिक और प्राचीन शहरों में बसावट घनी होने के कारण बाढ़ या जलभराव की स्थिति में राहत कार्य चलाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। ऐसे में वाराणसी में थ्री-डी डिजिटल ट्विन तकनीक का यह प्रयोग देश के अन्य बाढ़ प्रभावित शहरों के लिए भी एक बड़ा उदाहरण पेश कर रहा है। तकनीक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के इस मेल से न केवल आपदा के दौरान होने वाले जान-माल के नुकसान को न्यूनतम किया जा सकेगा, बल्कि संकट की घड़ी में नागरिकों को तुरंत और प्रभावी सहायता भी मुहैया कराई जा सकेगी। आने वाले समय में यह तकनीक देश के अन्य हिस्सों में भी आपदा प्रबंधन की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

Writer (स्थानीय खबरें)

रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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