ब्रज की ऐतिहासिक धरती ताजनगरी आगरा इन दिनों पूरी तरह से रूहानी रंगों में रंगी हुई है। अवसर है आगरा के प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल गुरुद्वारा गुरु का ताल पर आयोजित होने वाले 39वें सालाना तीन दिवसीय भव्य गुरमत समागम का। इस तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान के दूसरे दिन गुरु वाणी, मनमोहक कीर्तन और प्रेरणादायी कथा विचारों की ऐसी त्रिवेणी बही कि पूरा परिसर भक्ति और श्रद्धा के अथाह सागर में डूब गया। देश के कोने-कोने से पहुंचे प्रख्यात रागी जत्थों, कथा वाचकों और सिंह साहिबान ने अपनी इलाही वाणी के माध्यम से उपस्थित संगत को सीधे गुरु चरणों से जोड़ने का अलौकिक कार्य किया।
भक्ति और अनुशासन से सजा भाई नंदलाल दीवान हॉल
समागम के दूसरे दिन की शुरुआत अहले सुबह भाई नंदलाल दीवान हॉल में बेहद भव्य और अनुशासित तरीके से हुई। सुबह ठीक आठ बजे पावन गुरु ग्रंथ साहिब जी की सवारी अत्यंत सत्कार के साथ दीवान हॉल में लाई गई। गुरु महाराज के प्रकाश के साथ ही मुख्य कीर्तन समागम का औपचारिक शुभारंभ हुआ। इस पवित्र बेला में सबसे पहले गुरुद्वारा गुरु का ताल परिसर में ही संचालित गुरमत विद्यालय के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने अपनी मधुर आवाज में शबद कीर्तन गाकर उपस्थित तमाम श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। इसके पश्चात, गुरुद्वारा गुरु का ताल के हजूरी रागी जत्थों ने अपनी हाजिरी लगाकर समागम के माहौल को पूरी तरह से आध्यात्मिक बना दिया।
वीर रस के कीर्तन और गुरुओं की शौर्य गाथाओं ने भरा जोश
धार्मिक अनुष्ठान के इस पावन सफर में उस वक्त एक अलग ही ऊर्जा का संचार हुआ जब मंच पर विशेष रूप से आमंत्रित रागी भाई हरजोत सिंह जख्मी और भाई तरनवीर सिंह रब्बी ने अपनी हाजिरी दी। उन्होंने रूहानी गुरबाणी कीर्तन से संगत को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं, पंजाब से पधारीं बीबी दिलेर कौर खालसा के दाढ़ी जत्थे ने जब वीर रस से ओत-प्रोत गुरुओं की महान शौर्य गाथाओं का गायन किया, तो पूरा पंडाल जोश और उत्साह से भर उठा। श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सिक्ख इतिहास की इन गौरवशाली गाथाओं को सुनते रहे।
देशभर के दिग्गज प्रचारकों ने दिए जीवन के मूल्य
समागम में शिरकत करने के लिए देश के प्रमुख गुरुद्वारों से महान विद्वान और प्रचारक पहुंचे थे। इनमें:
- गुरुद्वारा बंगला साहिब नई दिल्ली के हेड ग्रंथी ज्ञानी रणजीत सिंह
- गुरुद्वारा शीशगंज साहिब चांदनी चौक दिल्ली के हेड ग्रंथी ज्ञानी अंग्रेज सिंह
- दरबार साहिब अमृतसर से विशेष तौर पर पधारे सिंह साहिब निशान सिंह
- प्रसिद्ध पंजाबी कथा वाचक भाई रणजीत सिंह गौहरे मस्कीन
इन सभी वक्ताओं ने अपने ओजस्वी कथा विचारों के माध्यम से संगत को गुरमत के मूल सिद्धांतों से गहराई से अवगत कराया। उन्होंने विशेष रूप से नई पीढ़ी का आह्वान किया कि वे आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ में अपनी जड़ों को न भूलें, बल्कि सिक्खी की महान राह पर चलते हुए पूरी निष्ठा से गुरु मर्यादा का पालन करें और अपनी वाणी को गुरु वाणी से जोड़ें।
श्रद्धा और सेवा का अद्भुत संगम: अटूट लंगर
गुरु घर के समागमों की सबसे बड़ी विशेषता उनका सेवा भाव होता है। गुरुद्वारा गुरु का ताल में आयोजित इस तीन दिवसीय महासमागम में भी सेवा का यह दृश्य देखने लायक था। इस भव्य आयोजन में शामिल होने के लिए उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर, पीलीभीत, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश के धौलपुर, डबरा, ग्वालियर और पंजाब तक से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हैं। दूर-दराज से आने वाले इन सभी मेहमानों और संगत के ठहरने, विश्राम करने, भोजन और चाय की अत्यंत भव्य व्यवस्था की गई है।
लंगर की इस विशाल व्यवस्था को पिछले कई वर्षों से संभाल रहे सेवादार बाबा अमरीक सिंह ने जानकारी दी कि कीर्तन समागम के दौरान चौबीसों घंटे (24x7) लंगर और चाय की सेवा अनवरत जारी रहती है। संगत की संख्या को देखते हुए हर चार से पांच घंटे के अंतराल पर नए और ताजे व्यंजन तैयार किए जाते हैं। इन व्यंजनों में उड़द और चने की दाल, पौष्टिक मूंग की दाल, पारंपरिक बेसन की कढ़ी, स्वादिष्ट आलू की सब्जी, गरमा-गरम पूरियां, मलाईदार खीर और विशेष रूप से परोसी जाने वाली कुरकुरी जलेबी शामिल है, जिसका आनंद हर श्रद्धालु ले रहा है।
इस पूरी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए उत्तराखंड के सितारगंज से भाई मंजसेवा समिति के 150 से अधिक समर्पित सदस्य विशेष रूप से आगरा पहुंचे हैं जो दिन-रात अपनी सेवाएं दे रहे हैं। गुरुद्वारा गुरु का ताल के मौजूदा मुखी संत बाबा प्रीतम सिंह खुद हर एक व्यवस्था पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। वे लगातार कीर्तन दरबार में उपस्थिति दर्ज कराने के साथ-साथ संगत के ठहरने के स्थान, लंगर हॉल और चाय वितरण केंद्रों का व्यक्तिगत रूप से निरीक्षण करते नजर आ रहे हैं ताकि किसी भी श्रद्धालु को असुविधा का सामना न करना पड़े।
संतों की स्मृति और लंबी चलने वाली दीवान परंपरा
इस वार्षिक आयोजन के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए संत बाबा प्रीतम सिंह ने बताया कि गुरुद्वारा गुरु का ताल की सेवा संभालकर इसे भव्यता और दिव्यता प्रदान करने वाले महान संत बाबा साधू सिंह जी मौनी और संत बाबा निरंजन सिंह जी की पवित्र स्मृति में हर साल यह गुरमत समागम बहुत ही श्रद्धा के साथ आयोजित किया जाता है।
दूसरे दिन के कार्यक्रमों की श्रृंखला में शाम छह बजे संध्या के समय रहिरास साहिब के पावन पाठ से दूसरे दीवान की शुरुआत हुई। इसके बाद रात के सन्नाटे में भी कीर्तन और कथा विचारों का सिलसिला लंबी अवधि तक चलता रहा। अंततः रात करीब दो बजे आनंद साहिब के पाठ के पश्चात समाप्ति की अरदास हुई और तदुपरांत हुकुमनामा लेकर इस अलौकिक दीवान को विश्राम दिया गया।
आज सुबह होगा अमृत संचार
समागम के अंतिम चरण और बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में, मीडिया प्रभारी जसबीर सिंह जस्सी ने जानकारी दी है कि आज यानी 3 अक्टूबर 2026 को सुबह के वक्त गुरुद्वारा मंजी साहिब में विशेष अमृत संचार का आयोजन किया जाएगा। इस पवित्र अमृत पान समारोह में भाग लेने वाले सभी उत्सुक श्रद्धालुओं से अपील की गई है कि वे सुबह भोर में अच्छी तरह केसी स्नान कर स्वच्छ और पवित्र वस्त्र धारण करके निर्धारित समयानुसार सुबह नौ बजे तक गुरुद्वारा मंजी साहिब में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करें।
दिल्ली से पधारे आदरणीय पंज प्यारे श्रद्धालुओं को विधि-विधान के साथ अमृत पान कराएंगे। इसके साथ ही, अमृत पान के लिए आने वाले सभी श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए आवश्यक ककार (पाँच ककार) दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि किसी भी श्रद्धालु को कोई परेशानी न हो।
गरिमापूर्ण उपस्थिति
इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक समागम के दौरान उत्तर भारत के कई प्रतिष्ठित धार्मिक और सामाजिक चेहरे अपनी उपस्थिति दर्ज कराने पहुंचे। इनमें प्रमुख रूप से:
- जत्थेदार बाबा पाल सिंह (सितारगंज)
- जत्थेदार बाबा अमर सिंह (बंडा, शाहजहांपुर)
- जत्थेदार सतनाम सिंह (निजामाबाद)
- महंत महेंद्र सिंह एवं महंत हरपाल सिंह
- श्री गुरु सिंह सभा के प्रधान कवलदीप सिंह
- गुरुद्वारा माईथान के हेड ग्रंथी ज्ञानी कुलविंदर सिंह
- राजू सलूजा, दलजीत सिंह सेतिया, उपेंद्र सिंह लवली, बॉबी वालिया
- परमजीत सिंह सरना, श्याम भोजवानी, चौधरी मनजीत सिंह
- ग्रंथी अजायब सिंह टीटू, ग्रंथी हरबंस सिंह, ग्रंथी सतवीर सिंह सुशील, हरनाम सिंह, ज्ञानी केवल सिंह और भाई जोगा सिंह
इन सभी गणमान्य लोगों की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा को और अधिक बढ़ा दिया। आगरा का यह गुरमत समागम न केवल सिख समुदाय बल्कि सभी धर्म प्रेमियों के लिए आस्था, संस्कृति और मानवीय सेवा का एक बेजोड़ उदाहरण बनकर उभरा है।