भारत के महत्वाकांक्षी चीता पुनर्प्रवेश प्रोजेक्ट के लिहाज से आज का दिन बेहद ऐतिहासिक और उत्साहजनक है। मध्य प्रदेश के जंगलों में चीतों की बसाहट को विस्तार देने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया गया है। बोत्सवाना से लाई गई मादा चीता, जिसे आधिकारिक तौर पर CCB2 नाम दिया गया है, अब कूनो नेशनल पार्क से निकलकर गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य की वादियों में पहुंच चुकी है। इस बहुप्रतीक्षित वन्यजीव गतिविधि के तहत मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद आज इस मादा चीता को गांधी सागर के खुले जंगलों में अपनी मौजूदगी में रिलीज करने वाले हैं।
कूनो से गांधी सागर तक का सफर: क्यों उठाया गया यह कदम?
जब साल 2022 और उसके बाद भारत में नामीबिया और बोत्सवाना से चीतों को लाकर श्योपुर जिले के कूनो नेशनल पार्क में बसाया गया था, तब से ही इस प्रोजेक्ट के दूसरे ठिकानों की तलाश भी शुरू हो गई थी। वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स और मध्य प्रदेश वन विभाग की लगातार यह योजना थी कि चीतों के कुनबे को एक ही जगह तक सीमित न रखकर, राज्य के दूसरे उपयुक्त आवासों में भी बसाया जाए। इसी रणनीति के तहत मंदसौर और नीमच जिलों में फैला गांधी सागर अभयारण्य चीतों के लिए दूसरा सबसे मुफीद और सुरक्षित आशियाना बनकर उभरा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कूनो नेशनल पार्क में चीतों की संख्या बढ़ने के साथ ही उनके बीच टेरिटरी (क्षेत्राधिकार) को लेकर होने वाले संघर्ष को टालना जरूरी था। इसके अलावा, भौगोलिक दृष्टि से गांधी सागर का इलाका शाकाहारी वन्यजीवों की प्रचुरता और घास के मैदानों की उपलब्धता के कारण चीतों के प्राकृतिक रहन-सहन के अनुकूल है। मादा चीता CCB2 को कूनो के बाड़े से सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू कर विशेष वाहनों के जरिए गांधी सागर लाया गया है, जहां मेडिकल चेकअप के बाद उसे पूरी तरह स्वस्थ पाया गया है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव करेंगे चीता रिलीज
वन विभाग से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आज गांधी सागर अभयारण्य पहुंचेंगे। उनके हाथों से इस मादा चीता को बड़े बाड़े से होते हुए खुले जंगल के प्राकृतिक परिवेश में छोड़ा जाएगा। इस कार्यक्रम में राज्य सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री, वन विभाग के आला अधिकारी और देश-विदेश के जाने-माने चीता विशेषज्ञ भी ऑनलाइन या ऑफलाइन माध्यम से जुड़ रहे हैं।
प्रशासन ने इस महत्वपूर्ण आयोजन को लेकर सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण के कड़े इंतजाम किए हैं। मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर स्थानीय स्तर पर भी भारी उत्साह देखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि वीवीआईपी मूवमेंट और वन विभाग की कड़ी निगरानी के बीच चीता को रिलीज करने की यह प्रक्रिया पूरी तरह से वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के तहत ही अंजाम दी जा रही है, ताकि जानवर को किसी भी प्रकार का अनावश्यक तनाव न हो।
गांधी सागर में चीतों का नया आशियाना: क्या हैं तैयारियां?
गांधी सागर अभयारण्य को चीतों के लिए तैयार करने में पिछले एक साल से युद्धस्तर पर काम चल रहा था। यहाँ सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने के साथ-साथ शिकार के लिए चीतल, सांभर और नीलगाय जैसी प्रजातियों की संख्या को बढ़ाया गया है। पानी के प्राकृतिक स्रोतों को पुनर्जीवित किया गया है और मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए आसपास के गांवों में विशेष जागरूकता अभियान चलाए गए हैं।
- सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम: अभयारण्य के भीतर एंटी-पोचिंग कैंप बनाए गए हैं जहाँ वनरक्षक 24 घंटे गश्त कर रहे हैं।
- रेडियो कॉलर मॉनिटरिंग: CCB2 की हर गतिविधि पर नजर रखने के लिए उसकी गर्दन में अत्याधुनिक सैटेलाइट रेडियो कॉलर लगाया गया है, जिससे उसकी लोकेशन कंट्रोल रूम को मिलती रहेगी।
- स्थानीय रोजगार और सहभागिता: चीता प्रोजेक्ट के आने से गांधी सागर के आसपास पर्यटन को बढ़ावा मिला है, जिससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खुले हैं।
वन्यजीव प्रेमियों और शोधकर्ताओं में भारी उत्साह
भारत में चीतों के विलुप्त होने के दशकों बाद शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट दुनिया का अपनी तरह का पहला ऐसा ट्रांसकॉन्टिनेंटल वाइल्डलाइफ रिलोकेशन प्रोजेक्ट है। ऐसे में कूनो के अलावा दूसरे केंद्र के रूप में गांधी सागर का विकसित होना इस प्रोजेक्ट की सफलता की बड़ी गवाही देता है। दुनिया भर के वन्यजीव वैज्ञानिक इस बात पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं कि भारतीय परिस्थितियों में चीते किस प्रकार खुद को ढाल रहे हैं और उनका प्रजनन किस गति से आगे बढ़ रहा है।
मादा चीता CCB2 के गांधी सागर के जंगलों में उतरने से न केवल मध्य प्रदेश बल्कि पूरे देश के इको-टूरिज्म मैप पर एक नया मुकाम जुड़ गया है। आने वाले दिनों में यहाँ पर्यटकों को एक बार फिर से खुले में चीता निहारने का रोमांचक अवसर मिलेगा। वन विभाग ने पर्यटकों से अपील की है कि वे सफारी के दौरान नियमों का कड़ाई से पालन करें और वन्यजीवों की प्राइवेसी का सम्मान करें।
फिलहाल, सबकी निगाहें मुख्यमंत्री मोहन यादव के इस दौरे और मादा चीता के पहले खुले कदम पर टिकी हुई हैं। यह पल मध्य प्रदेश के वन इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ने जा रहा है।