रात के ठीक 11:30 बज रहे थे। दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड में मैं बस स्टैंड पर अकेला खड़ा था। आखिरी बस आने में अभी कुछ वक्त था। जेब में हाथ डाले मैं खुद को गर्म रखने की कोशिश कर रहा था, तभी मेरी नज़र कुछ दूरी पर बैठी एक बूढ़ी अम्मा पर पड़ी।
वह फटे हुए कंबल में लिपटी, ठंड से कांप रही थीं। उनके सामने एक छोटी सी टोकरी थी, जिसमें कुछ मिट्टी के दीये रखे थे। इस समय, इस ठंड में, कौन दीये खरीदेगा?
मैं उनके पास गया और पूछा, "अम्मा, इतनी रात को यहाँ क्यों बैठी हो? रात के ठीक 11:30 बज रहे थे। दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड में मैं बस स्टैंड पर अकेला खड़ा था। आखिरी बस आने में अभी कुछ वक्त था। जेब में हाथ डाले मैं खुद को गर्म रखने की कोशिश कर रहा था, तभी मेरी नज़र कुछ दूरी पर बैठी एक बूढ़ी अम्मा पर पड़ी।
वह फटे हुए कंबल में लिपटी, ठंड से कांप रही थीं। उनके सामने एक छोटी सी टोकरी थी, जिसमें कुछ मिट्टी के दीये रखे थे। इस समय, इस ठंड में, कौन दीये खरीदेगा?
मैं उनके पास गया और पूछा, "अम्मा, इतनी रात को यहाँ क्यों बैठी हो? घर जाओ, बहुत ठंड है।"
अम्मा ने अपनी कमज़ोर आँखें उठाईं और धीमी आवाज़ में बोलीं, "बेटा, घर पर बीमार पोती है। दवाई के लिए बस पचास रुपये कम पड़ रहे हैं। ये दीये बिक जाएं, तो दवा लेकर चली जाऊंगी।"
मेरा दिल पसीज गया। मैंने जेब में हाथ डाला, तो मालूम हुआ कि मेरे पास सिर्फ मेरी बस का टिकट कराने जितने ही पैसे बचे थे। अगर मैंने अम्मा को पैसे दे दिए, तो मैं 15 किलोमीटर दूर अपने घर पैदल कैसे जाऊंगा? इस रात के सन्नाटे में पैदल जाना खतरे से खाली नहीं था।
मैं एक पल के लिए ठिठका। मन में द्वंद्व था—अपनी सुरक्षा या उस मासूम बच्ची की जान?
तभी सामने से बस आती हुई दिखी। मैंने एक गहरा सांस लिया, अपनी जेब से वो आखिरी 100 रुपये का नोट निकाला और अम्मा के हाथ में रख दिया। मैंने कहा, "अम्मा, ये रखो। दीये मुझे नहीं चाहिए, आप बस घर जाओ और बिटिया की दवा ले आओ।"
अम्मा की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने मुझे ढेरों दुआएं दीं और तुरंत स्टेशन से बाहर चली गईं। बस मेरे सामने आकर रुकी। कंडक्टर ने चिल्लाया, "चलो भाई, आखरी बस है, बैठना है?"
मैंने भारी मन से कहा, "नहीं भाई, तुम जाओ।" बस चली गई।
अब मैं सड़क पर अकेला था, और आगे 15 किलोमीटर का अंधेरा रास्ता। मैंने पैदल चलना शुरू ही किया था कि अचानक एक महंगी कार मेरे पास आकर रुकी। शीशा नीचे हुआ, और एक नौजवान ने पूछा, "भाई साहब, इस वक्त यहाँ पैदल? कहाँ जाना है?"
मैंने उसे अपनी मजबूरी बताई। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बैठिए, मैं भी उसी तरफ जा रहा हूँ।"
रास्ते में हमारी बात होने लगी। मैंने बातों-बातों में अम्मा वाली बात भी बता दी। वो नौजवान अचानक गंभीर हो गया। उसने गाड़ी साइड में रोकी और मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में नमी थी।
उसने कहा, "भाई साहब, आप जिस अम्मा की बात कर रहे हैं, वो मेरी माँ हैं।"
मैं हैरान रह गया! मैंने पूछा, "अगर आप इतने अमीर हैं, तो आपकी माँ इस ठंड में दीये क्यों बेच रही थीं? और आपकी बेटी बीमार..."
उसने मुझे बीच में ही रोका और कहा, "मेरी कोई बेटी नहीं है, और न ही मेरी माँ गरीब हैं। दरअसल, मेरी माँ अंधविश्वास और पाखंड के खिलाफ हैं। वो हमेशा कहती हैं कि दुनिया में आज भी इंसानियत ज़िंदा है, और भगवान अच्छे लोगों की परीक्षा लेते हैं। वो हर महीने किसी न किसी रूप में बाहर निकलती हैं ताकि वो देख सकें कि समाज में आज भी दूसरों की मदद करने वाले लोग बचे हैं या नहीं। उन्होंने मुझे फोन करके बताया था कि आज एक लड़के ने अपनी आखिरी बस छोड़कर उनकी मदद की।"
उसने आगे कहा, "मेरी माँ ने मुझसे कहा था कि उस लड़के को ढूंढो और उसकी मदद करो। मुझे नहीं पता था कि आप मुझे इस तरह रास्ते में मिल जाएंगे।"
उसने जेब से एक लिफाफा निकाला और मेरी तरफ बढ़ा दिया। "यह मेरी माँ की तरफ से आपके लिए एक छोटा सा उपहार है। उन्होंने कहा है कि इंसानियत की कीमत कभी अधूरी नहीं रहती।"
जब मैं अपने घर पहुँचा और लिफाफा खोला, तो उसमें 50,000 रुपये और एक छोटा सा नोट था, जिस पर लिखा था: "बेटा, तुम्हारी बस तो छूट गई, लेकिन तुमने इंसानियत की गाड़ी को सही वक्त पर पकड़ लिया। खुश रहो।" है।"
अम्मा ने अपनी कमज़ोर आँखें उठाईं और धीमी आवाज़ में बोलीं, "बेटा, घर पर बीमार पोती है। दवाई के लिए बस पचास रुपये कम पड़ रहे हैं। ये दीये बिक जाएं, तो दवा लेकर चली जाऊंगी।"
मेरा दिल पसीज गया। मैंने जेब में हाथ डाला, तो मालूम हुआ कि मेरे पास सिर्फ मेरी बस का टिकट कराने जितने ही पैसे बचे थे। अगर मैंने अम्मा को पैसे दे दिए, तो मैं 15 किलोमीटर दूर अपने घर पैदल कैसे जाऊंगा? इस रात के सन्नाटे में पैदल जाना खतरे से खाली नहीं था।
मैं एक पल के लिए ठिठका। मन में द्वंद्व था—अपनी सुरक्षा या उस मासूम बच्ची की जान?
तभी सामने से बस आती हुई दिखी। मैंने एक गहरा सांस लिया, अपनी जेब से वो आखिरी 100 रुपये का नोट निकाला और अम्मा के हाथ में रख दिया। मैंने कहा, "अम्मा, ये रखो। दीये मुझे नहीं चाहिए, आप बस घर जाओ और बिटिया की दवा ले आओ।"
अम्मा की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने मुझे ढेरों दुआएं दीं और तुरंत स्टेशन से बाहर चली गईं। बस मेरे सामने आकर रुकी। कंडक्टर ने चिल्लाया, "चलो भाई, आखरी बस है, बैठना है?"
मैंने भारी मन से कहा, "नहीं भाई, तुम जाओ।" बस चली गई।
अब मैं सड़क पर अकेला था, और आगे 15 किलोमीटर का अंधेरा रास्ता। मैंने पैदल चलना शुरू ही किया था कि अचानक एक महंगी कार मेरे पास आकर रुकी। शीशा नीचे हुआ, और एक नौजवान ने पूछा, "भाई साहब, इस वक्त यहाँ पैदल? कहाँ जाना है?"
मैंने उसे अपनी मजबूरी बताई। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बैठिए, मैं भी उसी तरफ जा रहा हूँ।"
रास्ते में हमारी बात होने लगी। मैंने बातों-बातों में अम्मा वाली बात भी बता दी। वो नौजवान अचानक गंभीर हो गया। उसने गाड़ी साइड में रोकी और मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में नमी थी।
उसने कहा, "भाई साहब, आप जिस अम्मा की बात कर रहे हैं, वो मेरी माँ हैं।"
मैं हैरान रह गया! मैंने पूछा, "अगर आप इतने अमीर हैं, तो आपकी माँ इस ठंड में दीये क्यों बेच रही थीं? और आपकी बेटी बीमार..."
उसने मुझे बीच में ही रोका और कहा, "मेरी कोई बेटी नहीं है, और न ही मेरी माँ गरीब हैं। दरअसल, मेरी माँ अंधविश्वास और पाखंड के खिलाफ हैं। वो हमेशा कहती हैं कि दुनिया में आज भी इंसानियत ज़िंदा है, और भगवान अच्छे लोगों की परीक्षा लेते हैं। वो हर महीने किसी न किसी रूप में बाहर निकलती हैं ताकि वो देख सकें कि समाज में आज भी दूसरों की मदद करने वाले लोग बचे हैं या नहीं। उन्होंने मुझे फोन करके बताया था कि आज एक लड़के ने अपनी आखिरी बस छोड़कर उनकी मदद की।"
उसने आगे कहा, "मेरी माँ ने मुझसे कहा था कि उस लड़के को ढूंढो और उसकी मदद करो। मुझे नहीं पता था कि आप मुझे इस तरह रास्ते में मिल जाएंगे।"
उसने जेब से एक लिफाफा निकाला और मेरी तरफ बढ़ा दिया। "यह मेरी माँ की तरफ से आपके लिए एक छोटा सा उपहार है। उन्होंने कहा है कि इंसानियत की कीमत कभी अधूरी नहीं रहती।"
जब मैं अपने घर पहुँचा और लिफाफा खोला, तो उसमें 50,000 रुपये और एक छोटा सा नोट था, जिस पर लिखा था: "बेटा, तुम्हारी बस तो छूट गई, लेकिन तुमने इंसानियत की गाड़ी को सही वक्त पर पकड़ लिया। खुश रहो।"