आज की युवा पीढ़ी यानी Gen Z को लेकर देश में बहस छिड़ गई है। इसी बीच, योग गुरु बाबा रामदेव ने युवाओं के रहन-सहन, उनकी जीवनशैली और देश की चरमराती शिक्षा व्यवस्था पर एक ऐसा बयान दिया है, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। बाबा रामदेव ने जहां एक तरफ युवाओं की आदतों और आधुनिक लाइफस्टाइल पर गहरी चिंता जताई है, वहीं दूसरी तरफ देश के स्कूलों और परीक्षाओं के मौजूदा हाल को लेकर तीखा हमला बोला है। उन्होंने साफ चेतावनी दी है कि यदि शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो वह बड़ा आंदोलन करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
'सबको एक नजर से न देखें, लेकिन ये ट्रेंड चिंताजनक'
शनिवार को मीडिया से बातचीत के दौरान बाबा रामदेव ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को पूरी तरह से एक ही चश्मे से देखना गलत होगा। देश के लाखों युवा ऐसे हैं जो अपनी मेहनत के दम पर बहुत ही बेहतरीन काम कर रहे हैं और देश का नाम रोशन कर रहे हैं। हालांकि, उन्होंने इस बात से भी इनकार नहीं किया कि युवाओं का एक धड़ा ऐसा भी है जो तेजी से गलत रास्तों पर भटक रहा है।
युवाओं के बदलते लाइफस्टाइल पर खुलकर बात करते हुए उन्होंने कहा, 'कई Gen Z बहुत अच्छा कर रहे हैं, लेकिन कुछ युवा हिंसा में लिप्त हैं, उनके कई बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड हैं। कुछ लोग बीड़ी-सिगरेट पीने और शराब के नशे में बुरी तरह डूबे हुए हैं।' योग गुरु के इस बेबाक बयान ने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक नई बहस छेड़ दी है।
राजनीति और पीएम की कुर्सी पर तंज
देश की राजनीतिक स्थिति पर बात करते हुए बाबा रामदेव ने उन लोगों को आड़े हाथों लिया जो हर वक्त सरकार की आलोचना करने में लगे रहते हैं और जिन्हें लगता है कि देश में सब कुछ गलत हो रहा है। उन्होंने राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग राजनीतिक रूप से अत्यधिक हताश हैं और उन्हें लगता है कि वे कल ही प्रधानमंत्री बन जाएंगे।
'अगर देश को आपको प्रधानमंत्री बनाना होगा, तो थोड़ा धैर्य रखिए। पीएम बनने की हड़बड़ी में देश को अस्थिर मत करिए।'
उन्होंने यह भी जोड़ा कि लोकतंत्र में विपक्ष का होना पूरी तरह स्वाभाविक है, लेकिन राजनीतिक मतभेदों को कभी भी व्यक्तिगत दुश्मनी में नहीं बदलना चाहिए। साथ ही, जाति, वर्ग या समुदाय के नाम पर समाज को बांटने की राजनीति से भी बचने की सख्त जरूरत है।
शिक्षा व्यवस्था पर फूटा गुस्सा, दी आंदोलन की चेतावनी
बाबा रामदेव का सबसे तीखा रुख देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर देखने को मिला। उन्होंने शिक्षा प्रणाली में फैली अव्यवस्था पर गहरी नाराजगी जाहिर करते हुए चेतावनी दी कि अगर हालात नहीं सुधरे, तो वह एक बड़ा जन-आंदोलन छेड़ देंगे।
देश के बुनियादी शिक्षा ढांचे की पोल खोलते हुए उन्होंने कहा कि आज भी देश के कई दूर-दराज के इलाकों और छोटे स्कूलों में बच्चे शिक्षक, बिजली, पीने का पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। इन मूलभूत सुविधाओं के अभाव के कारण कई मासूम छात्र बीच में ही स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख समस्याएं जो बाबा रामदेव ने गिनाईं:
- संसाधनों की भारी कमी: कई स्कूलों में किताबें हैं तो शिक्षक नहीं हैं, और जहां शिक्षक हैं वहां पढ़ाई के लिए किताबें उपलब्ध नहीं हैं।
- पेपर लीक का नासूर: तमाम व्यवस्थाओं के बावजूद आज सबसे बड़ी समस्या पेपर लीक की बन चुकी है, जिससे युवाओं का भविष्य दांव पर लग जाता है।
- बोर्ड परीक्षाओं की प्रासंगिकता: उन्होंने 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं के औचित्य पर भी सवाल उठाए और कहा कि अब सारा फोकस सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं पर शिफ्ट हो गया है, जिससे बच्चों पर मानसिक दबाव कई गुना बढ़ गया है।
निश्चित तौर पर बाबा रामदेव के इन बวानों ने एक बार फिर से देश के दो सबसे अहम मुद्दों—युवाओं के नैतिक पतन और शिक्षा प्रणाली में सुधार—को केंद्र में ला दिया है। अब देखना यह होगा कि सरकार और खुद युवा वर्ग इन चेतावनियों को किस रूप में लेता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. बाबा रामदेव ने Gen Z को लेकर क्या मुख्य चिंता जताई है?
Ans. बाबा रामदेव ने कहा कि हालांकि कई युवा बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन Gen Z का एक वर्ग हिंसा, नशे (शराब, सिगरेट) और अस्थिर रिश्तों (कई बॉयफ्रेंड/गर्लफ्रेंड) जैसी आदतों का शिकार हो रहा है, जो चिंता का विषय है।
Q2. शिक्षा व्यवस्था को लेकर बाबा रामदेव ने क्या चेतावनी दी है?
Ans. उन्होंने स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, शिक्षकों व किताबों के अभाव और खासकर लगातार सामने आ रहे 'पेपर लीक' के मामलों पर गहरी नाराजगी जताई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो वह आंदोलन शुरू करेंगे।
Q3. बोर्ड परीक्षाओं को लेकर बाबा रामदेव का क्या कहना है?
Ans. उन्होंने 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं की उपयोगिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि मौजूदा समय में दाखिले केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए तय हो रहे हैं, जिससे छात्रों पर अनावश्यक मानसिक दबाव बढ़ रहा है।