भारतीय रेलवे के इतिहास के उन पन्नों को पलटना आज भी रूह कंपा देता है, जिन पर देश के सबसे भयानक रेल हादसों की स्याही गहरी दर्ज है। बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित रफीगंज रेलवे स्टेशन के पास हुआ राजधानी एक्सप्रेस का वह भीषण हादसा आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। इस बहुचर्चित और दर्दनाक रेल दुर्घटना को पूरे 24 साल बीत चुके हैं। हाल ही में इस हादसे की 24वीं बरसी पर घटनास्थल यानी धावा नदी के पास एक विशेष श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया, जहां हर आंख नम थी और हर दिल में उस भयानक रात का खौफ साफ झलक रहा था।
धावा नदी के तट पर गूंजी नम आंखों की प्रार्थना
पंडित दीनदयाल उपाध्याय-गया रेलखंड पर रफीगंज रेलवे स्टेशन से करीब चार किलोमीटर पश्चिम में स्थित धावा नदी के पुल के समीप बुधवार को एक अलग ही और गमगीन माहौल देखने को मिला। रेलवे कर्मचारियों, स्थानीय नागरिकों और विभिन्न राजनीतिक दलों के समाजसेवियों ने एकजुट होकर घटनास्थल पर पूजा-अर्चना की। सभी ने मोमबत्तियां जलाईं और दो मिनट का मौन रखकर उस भयानक हादसे में अपनी जान गंवाने वाले मासूम यात्रियों की आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।
कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने बताया कि भले ही इस घटना को दो दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन इस रूट से गुजरने वाली हर ट्रेन और धावा नदी का यह पुल आज भी उन चीखों और सिसकियों को बयां करता है, जो 9 सितंबर 2002 की आधी रात को हवा में गूंजी थीं।
9 सितंबर 2002: वह काली रात जब थम गई थीं सांसें
इतिहास के पन्नों में दर्ज वह तारीख यानी 9 सितंबर 2002, भारतीय रेल के लिए एक कभी न भरने वाला घाव है। हावड़ा से नई दिल्ली की ओर जा रही प्रतिष्ठित राजधानी एक्सप्रेस उस रात अपनी पूरी रफ्तार में थी। गाड़ी जब रफीगंज के पास धावा नदी के पुल को पार कर रही थी, तभी अचानक एक भयंकर झटका लगा और ट्रेन के कई डिब्बे पटरी से उतरकर सीधे नदी और उसके आसपास के इलाकों में जा गिरे।
हादसा इतना भीषण था कि डिब्बे आपस में बुरी तरह से पिचक गए। इस दिल दहला देने वाली दुर्घटना में 150 से अधिक यात्रियों की दर्दनाक मौत हो गई थी, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। राहत और बचाव कार्य करने वाले दल भी उस तबाही के मंजर को देखकर सन्न रह गए थे। चारों तरफ चीख-पुकार मची हुई थी और हर तरफ केवल अपनों को तलाशते बेबस लोग नजर आ रहे थे।
हर साल बरसी पर जुटते हैं लोग और देते हैं संदेश
स्थानीय निवासियों और रेलवे से जुड़े लोगों का कहना है कि वे इस दुखद घटना को कभी भुला नहीं सकते। यही वजह है कि हर साल 9 सितंबर को रेलवे कर्मी, आरपीएफ के जवान, स्थानीय जनप्रतिनिधि और आम नागरिक बड़ी संख्या में धावा नदी के तट पर पहुंचते हैं। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य न केवल उन मृतकों को श्रद्धांजलि देना है, बल्कि रेलवे सुरक्षा प्रणाली को लेकर एक कड़ा संदेश देना भी है ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी बड़ी लापरवाही या प्राकृतिक आपदा से बचा जा सके।
पीडब्ल्यूआई इंचार्ज गौरव कुमार, कांग्रेस नेता डॉ. तुलसी यादव और जदयू नेता विनोद कुमार ने मीडिया से बातचीत करते हुए उस रात के भयानक अनुभवों को साझा किया। उन्होंने बताया कि इस दुर्घटना के बाद से इलाके के लोगों के दिलों में एक अजीब सा डर बैठ गया था, जो आज भी हर बरसी पर ताजा हो जाता है।
श्रद्धांजलि सभा में शामिल रहे ये प्रमुख लोग
इस मर्माहत कर देने वाले श्रद्धांजलि कार्यक्रम में औरंगाबाद और आसपास के कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सभा में प्रमुख रूप से डॉ. तुलसी यादव, जदयू वरिष्ठ नेता विनोद कुमार, शुभम सिंह, पप्पू यादव बाबा, अजय कुमार, संदीप कुमार, मनोज कुमार मधुकर, आजाद कुमार मधुकर, गौरव कुमार, रात्रि प्रहरी महीप कुमार, रविशंकर, खेमचंद लखड़ा, रामदास मांझी और कृष्ण मुरारी कुमार समेत सैकड़ों की संख्या में स्थानीय ग्रामीण और रेलवे कर्मचारी शामिल हुए। सभी ने एक सुर में यही कहा कि मानवीय भूल या सिस्टम की कमियों से होने वाले ऐसे हादसों से सबक लेना ही मृतकों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।