बरेली मंडल में हेपेटाइटिस का खतरा बढ़ने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग की तैयारियां नाकाफी साबित हो रही हैं। सरकारी अस्पतालों में वायरल लोड जांचने के लिए किट उपलब्ध न होने के कारण मरीजों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश के बरेली मंडल में हेपेटाइटिस संक्रमण के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य तंत्र की लचर व्यवस्था के कारण मरीजों की जांच प्रक्रिया ठप पड़ी है। सबसे खतरनाक माने जाने वाले हेपेटाइटिस-बी संक्रमण से अकेले बदायूं जिले में करीब 300 मरीजों का इलाज चल रहा है, जबकि सैकड़ों अन्य मरीज अपनी जांच कराने के लिए कतारों में खड़े हैं। जिन मरीजों के ब्लड सैंपल पहले ही लिए जा चुके हैं, उनके नमूने भी जांच किट के इंतजार में रखे हुए हैं।
केजीएमयू लखनऊ से सैंपल जांच बंद होने से बढ़ी समस्या
पूर्व व्यवस्था के तहत जिलों से हेपेटाइटिस के सैंपल लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU), लखनऊ (केजीएमयू) भेजे जाते थे, जहां वायरल लोड की सुविधा उपलब्ध थी। केजीएमयू से आमतौर पर 20 से 25 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट मिल जाती थी, जिसके आधार पर जिला अस्पतालों में मरीजों का उपचार शुरू कर दिया जाता था। हालांकि, बीते अप्रैल माह से केजीएमयू में हेपेटाइटिस के सैंपल लेना बंद कर दिया गया है। वहां किट न होने का हवाला देते हुए कई बार सैंपल वापस लौटाए जा चुके हैं, जिसके चलते जिलों से लखनऊ सैंपल भेजना पूरी तरह बंद करना पड़ा।
बदायूं और राजकीय मेडिकल कॉलेज के हालात
बदायूं जिला अस्पताल के प्रयासों से स्थानीय राजकीय मेडिकल कॉलेज में कुछ नमूनों का वायरल लोड टेस्ट किया जा रहा है, लेकिन रिपोर्ट आने में एक महीने तक का लंबा समय लग रहा है। बदायूं जिला अस्पताल के वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. एसएम कमल के अनुसार, मेडिकल कॉलेज के पास सीमित संख्या में ही जांच किट बची हैं, जिससे केवल काम चलाया जा रहा है। मेडिकल कॉलेज में रोजाना 50 से 55 ब्लड सैंपल ही लिए जा रहे हैं, जबकि जिला अस्पताल में एक हजार से अधिक सैंपल जांच के इंतजार में रखे हैं।
निजी जांच का महंगा विकल्प और आर्थिक बोझ
सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त इंतजाम न होने के कारण मरीजों को मजबूरी में निजी अस्पतालों और लैब का रुख करना पड़ रहा है। निजी स्तर पर हेपेटाइटिस की जांच कराने के लिए मरीजों को तीन से चार हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए यह खर्च उठाना बेहद कठिन साबित हो रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि हेपेटाइटिस-बी अत्यधिक गंभीर संक्रमण है और समय पर उचित इलाज न मिलने पर मरीज के लिए खतरा काफी बढ़ जाता है, जबकि हेपेटाइटिस-ए और सी समेत अन्य ग्रुप के संक्रमण अपेक्षाकृत कम गंभीर होते हैं। वर्तमान में जो मरीज निजी लैब से अपनी जांच रिपोर्ट लेकर पहुंच रहे हैं, केवल उन्हीं का उपचार सरकारी अस्पतालों में शुरू किया जा रहा है।