महाराष्ट्र की प्रशासनिक सेवा परीक्षा यानी MPSC को लेकर छात्रों का गुस्सा अब एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है। पिछले नौ दिनों से पुणे की सड़कों पर अपनी मांगों को लेकर अड़े अभ्यर्थियों के समर्थन में अब राजनीतिक और सामाजिक हस्तियां भी खुलकर सामने आने लगी हैं। इसी कड़ी में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) के विधायक रोहित पवार ने एक बेहद अहम और बड़ा बयान दिया है, जिसने इस पूरे आंदोलन को एक नया मोड़ दे दिया है।
छात्रों के एक बड़े समूह ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन करने की योजना बनाई थी। हालांकि, प्रशासनिक और परिवहन संबंधी अड़चनों के कारण जब छात्रों की ट्रेनें रद्द कर दी गईं और उन्हें दिल्ली जाने से रोका गया, तो आंदोलन की दिशा थोड़ी प्रभावित होती नजर आई। इस स्थिति को भांपते हुए रोहित पवार ने तुरंत मोर्चा संभाला और सोशल मीडिया के माध्यम से एक तीखा और स्पष्ट आह्वान किया।
दिल्ली नहीं पहुंचे तो क्या हुआ, पुणे में दिखाएं ताकत
रोहित पवार ने अपनी अपील में कहा कि यदि प्रशासनिक बाधाओं के चलते युवा दिल्ली के जंतर-मंतर या अन्य तय स्थानों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, तो उन्हें निराश होने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी ऊर्जा को बेकार न जाने दें और पुणे में पिछले नौ दिनों से चल रहे इस ऐतिहासिक सत्याग्रह का हिस्सा बनें।
"युवाओं की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। यदि रास्ते रोके जाएंगे, तो संघर्ष के नए रास्ते खुद-ब-खुद निकलेंगे। जो छात्र दिल्ली नहीं पहुंच पाए हैं, वे तुरंत पुणे पहुंचे और यहां चल रहे सत्याग्रह को और अधिक मजबूत करें।"
पुणे में चल रहा यह धरना प्रदर्शन केवल एक परीक्षा की तारीखों या सीटों से जुड़ा मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह देश और राज्य के युवाओं के भविष्य, रोजगार और पारदर्शी चयन प्रक्रियाओं की एक बड़ी लड़ाई बन चुका है। छात्र पिछले कई दिनों से लगातार अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं, लेकिन प्रशासन की तरफ से अभी तक कोई ठोस समाधान न मिलने के कारण उनका असंतोष दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है।
क्यों सुलग रहा है MPSC के छात्रों का यह गुस्सा?
आइए जानते हैं कि आखिर छात्र इस कड़कड़ाती धूप और खुले आसमान के नीचे पिछले नौ दिनों से क्यों बैठे हैं:
- परीक्षा परिणाम में देरी: छात्रों का मुख्य आरोप है कि विभिन्न चरणों की परीक्षाओं के परिणाम समय पर घोषित नहीं किए जाते हैं, जिससे उनका बहुमूल्य समय बर्बाद होता है।
- रिक्त पदों की संख्या: विज्ञापित पदों और वास्तव में भरी जाने वाली रिक्तियों में भारी अंतर होने के कारण युवाओं में भारी निराशा है।
- पारदर्शिता की कमी: चयन प्रक्रिया में और अधिक पारदर्शिता लाने तथा तकनीकी गड़बड़ियों को दूर करने की मांग लंबे समय से की जा रही है।
- आयु सीमा में छूट: कोविड काल और अन्य प्रशासनिक कारणों से जिन छात्रों के प्रयास व्यर्थ गए, उन्हें आयु सीमा में विशेष छूट देने की मांग प्रमुखता से उठाई जा रही है।
राजनीतिक सरगर्मी तेज, सरकार पर बढ़ रहा दबाव
जैसे-जैसे आंदोलन के दिन बीत रहे हैं, राज्य सरकार पर भी इसका दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। विपक्षी दल इस मुद्दे को पूरी तरह से भुनाने की कोशिश में हैं और वे सीधे तौर पर युवाओं के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। रोहित पवार का पुणे के आंदोलन स्थल पर जाने का और छात्रों से व्यक्तिगत रूप से मिलने का कार्यक्रम भी तय माना जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते इस मामले पर कोई सार्थक बातचीत नहीं की गई, तो यह आंदोलन पुणे से निकलकर पूरे महाराष्ट्र में फैल सकता है, जिसका असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। छात्र किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नहीं हैं और उनका साफ कहना है कि जब तक उनकी सभी मांगें लिखित रूप में पूरी नहीं हो जातीं, यह सत्याग्रह यूं ही जारी रहेगा।
आम जनता और अभिभावकों का भी मिल रहा है समर्थन
पुणे के स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और देश के विभिन्न हिस्सों से आए अभिभावकों ने भी इन छात्रों के प्रति अपनी एकजुटता दिखाई है। आंदोलन स्थल पर खाने-पीने और चिकित्सीय सुविधाओं के लिए स्थानीय लोग खुद आगे आ रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि आम जनता भी इन युवाओं के संघर्ष को भली-भांति समझ रही है और उनके साथ खड़ी है।
आने वाले 24 से 48 घंटे इस आंदोलन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं। क्या प्रशासन इन युवाओं की सुध लेगा या फिर आंदोलन और अधिक उग्र होगा? इन तमाम सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलने की पूरी संभावना है। फिलहाल, सभी की निगाहें पुणे के उस मुख्य चौक पर टिकी हैं जहां ये युवा अपने उज्ज्वल भविष्य की आस में डटे हुए हैं।