महाराष्ट्र का भंडारा शहर इन दिनों एक बेहद गंभीर प्रशासनिक और नागरिक संकट से जूझ रहा है। यहां की सफाई व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है, जिसका सीधा असर आम नागरिकों के दैनिक जीवन पर पड़ रहा है। हालात यह हैं कि शहर की गलियों और मोहल्लों में कचरे के ढेर लगने शुरू हो गए हैं, और घरों से कचरा उठाने की जो व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही थी, वह अब लगभग ठप हो चुकी है। इस बदहाली की सबसे बड़ी वजह पिछले तीन सालों से नए टेंडर का अटका रहना बताया जा रहा है, जिससे प्रशासनिक सुस्ती की कलई खुल गई है।
तीन साल से फाइल में कैद है नया टेंडर
किसी भी शहर के विकास और उसकी स्वच्छता के लिए नियमित सफाई और कचरा प्रबंधन रीढ़ की हड्डी माना जाता है। लेकिन भंडारा नगर परिषद की उदासीनता के चलते यह रीढ़ अब टूटती नजर आ रही है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, शहर में साफ-सफाई और घर-घर से कचरा संकलन (डोर-टू-डोर गार्बेज कलेक्शन) के लिए नया टेंडर निकाला जाना था, जिसकी प्रक्रिया पिछले पूरे तीन साल से कागजों और फाइलों के बीच उलझकर रह गई है।
लंबी समयावधि से टेंडर प्रक्रिया पूरी न होने के कारण पुराने अनुबंधों और व्यवस्थाओं के सहारे ही काम चलाया जा रहा था, जो अब पूरी तरह से फेल हो चुके हैं। जब पुराने वेंडर ने काम बंद किया, तब जाकर नगर प्रशासन की नींद टूटी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
कचरा संकलन बंद होने से नागरिकों की बढ़ी मुश्किलें
घर-घर कचरा संकलन बंद होने से शहरवासियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वे नियमित रूप से टैक्स भरते हैं, इसके बावजूद उन्हें बुनियादी सफाई सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं।
- बीमारियों का खतरा: गलियों और चौराहों पर कचरा जमा होने से मक्खी-मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है, जिससे संक्रामक बीमारियों के फैलने की आशंका लगातार बनी हुई है।
- दुर्गंध और प्रदूषण: खुले में पड़े कचरे से उठने वाली सड़न और दुर्गंध के कारण लोगों का घर से बाहर निकलना मुहाल हो गया है।
- बच्चों और बुजुर्गों पर असर: अस्वच्छ माहौल का सबसे बुरा असर घरों के छोटे बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
55 नए कर्मचारियों की वैकल्पिक व्यवस्था पर नया विवाद
कचरा संकलन का काम रुकने के बाद नगर परिषद ने संकट से निपटने के लिए एक वैकल्पिक रास्ता निकाला। प्रशासन ने फौरी राहत के तौर पर 55 नए कर्मचारियों को काम पर रखने की व्यवस्था की। हालांकि, यह कदम समस्याओं को सुलझाने के बजाय एक नए विवाद का कारण बन गया है।
इस वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठाए जा रहे हैं। जानकारों और पार्षदों का एक वर्ग इस बात पर आपत्ति जता रहा है कि जब पिछले तीन साल से टेंडर अटका हुआ था, तब स्थाई समाधान क्यों नहीं ढूंढा गया? इसके अलावा, इन 55 नए कर्मचारियों की नियुक्ति और उनके कामकाज के तौर-तरीकों को लेकर भी पारदर्शिता पर सवालिया निशान लग रहे हैं। विवाद इतना बढ़ गया है कि यह मामला अब शहर की मुख्य चर्चा का विषय बन गया है और विभिन्न राजनीतिक दल भी नगर प्रशासन के खिलाफ मुखर होने लगे हैं।
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
भंडारा नगर परिषद की इस लचर कार्यशैली ने एक बार फिर स्थानीय निकायों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ जहां सरकार 'स्वच्छ भारत मिशन' के तहत शहरों को सुंदर और कचरा मुक्त बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही के कारण धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आ रही है।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया और शहर की सफाई व्यवस्था को पटरी पर नहीं लाया गया, तो वे बड़े पैमाने पर आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।
आगे की राह और समाधान की उम्मीद
फिलहाल भंडारा के लोग यही उम्मीद कर रहे हैं कि जिला प्रशासन और नगर परिषद के उच्च अधिकारी इस मामले में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करेंगे। पिछले तीन साल से अटके पड़े टेंडर की प्रक्रिया को अब बिना किसी देरी के पारदर्शी तरीके से पूरा किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी नई एजेंसी को काम सौंपकर शहर को इस कचरे के संकट से मुक्त कराया जा सके। जब तक कोई स्थाई और दीर्घकालिक समाधान नहीं निकाला जाता, तब तक इस तरह के अस्थायी विवाद शहर की तस्वीर को धुंधला करते रहेंगे।