भारतीय संगीत के इतिहास में कुछ ऐसी शख्सियतें हुई हैं जिनकी आवाज और धुनों ने न केवल लोगों के दिलों पर राज किया, बल्कि समाज की अंतरात्मा को भी झकझोर कर रख दिया। असम की सुरम्य वादियों में जन्मे महान संगीत साधक भूपेन हजारिका (Bhupen Hazarika) एक ऐसा ही नाम हैं, जिन्होंने अपनी अद्वितीय प्रतिभा के दम पर पूर्वोत्तर (North-East) से लेकर पूरे देश और दुनिया में अपनी कला का परचम लहराया। उनकी आवाज में एक ऐसा जादू और गहराई थी, जो सीधे सुनने वाले के दिल में उतर जाती थी। लेकिन जिस शख्स ने लाखों-करोड़ों दिलों में अपनी जगह बनाई, उनका अपना निजी जीवन संघर्षों, तन्हाइयों और अनकहे दर्दों की एक ऐसी दास्तान रहा है, जो हर किसी की आंखें नम कर दे।
बचपन से ही संगीत के प्रति अटूट प्रेम
दस भाई-बहनों में सबसे बड़े भूपेन हजारिका का बचपन से ही संगीत के प्रति विशेष झुकाव था। उनके घर का माहौल कलात्मक था, जिसका असर उनके बाल मन पर गहरा पड़ा। उन्होंने बेहद कम उम्र में ही सुरों से नाता जोड़ लिया था। भूपेन दा के भीतर छिपी उस अद्भुत प्रतिभा को सबसे पहले पहचाना प्रसिद्ध फिल्ममेकर और असमिया संस्कृति के पुरोधा ज्योतिप्रसाद अग्रवाल ने। उनकी सुरीली और कसी हुई आवाज से प्रभावित होकर उन्होंने भूपेन को अपनी कला को आगे बढ़ाने का पहला बड़ा अवसर प्रदान किया।
परिणामस्वरूप, साल 1936 में कोलकाता के एक स्टूडियो में उन्होंने अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया, जब वह महज 10 वर्ष के थे। संगीत की दुनिया में यह किसी करिश्मा से कम नहीं था कि इतनी कम उम्र में कोई बच्चा पेशेवर रिकॉर्डिंग करे। इसके ठीक तीन साल बाद, यानी 13 वर्ष की आयु में उन्होंने खुद अपने गीत लिखने और धुनें बनाने की शुरुआत कर दी थी। उनका यह सफर इस बात का गवाह था कि आने वाले समय में यह बाल कलाकार संगीत जगत का एक विशाल वटवृक्ष बनने वाला है।
शिक्षा, विदेश यात्रा और पत्रकारिता में पीएचडी
भूपेन हजारिका केवल एक बेहतरीन गायक या संगीतकार ही नहीं थे, बल्कि वह उच्च कोटि के बुद्धिजीवी भी थे। उन्होंने अपनी शुरुआती और कॉलेज की शिक्षा असम से पूरी करने के बाद प्रतिष्ठित बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से आगे की पढ़ाई की। इसके बाद उच्च शिक्षा यानी हायर एजुकेशन के लिए वह महासागर पार अमेरिका पहुंचे।
अमेरिका की प्रसिद्ध कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उन्होंने दाखिला लिया और जनर्लिज्म (पत्रकारिता) विषय में अपनी पीएचडी की डिग्री हासिल की। विदेश की धरती पर रहते हुए भी उनकी जड़ें अपनी संस्कृति से मजबूती से जुड़ी रहीं। भारत लौटने के बाद उन्होंने कुछ समय तक गुवाहाटी के ऑल इंडिया रेडियो में अपनी सेवाएं दीं। इस दौरान उन्होंने कई बंगाली गानों को हिंदी में डब कर अपनी अनूठी शैली में गाकर प्रसारित किया, जिसे श्रोताओं ने बेहद सराहा।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्यार और शादी का बंधन
कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अपनी पढ़ाई के दौरान ही भूपेन हजारिका के जीवन में एक नया मोड़ आया। वहां उनकी मुलाकात प्रियम्वदा पटेल से हुई। दोनों की मुलाकात धीरे-धीरे गहरी दोस्ती में बदली और फिर यह रिश्ता प्यार में तब्दील हो गया। साल 1950 में दोनों ने अमेरिका में ही विवाह कर लिया।
शादी के दो साल बाद उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ, जिससे उनकी खुशियां दोगुनी हो गईं। इसके बाद, साल 1953 में वह अपने परिवार के साथ अमेरिका से वापस भारत लौट आए। भारत लौटने पर उन्होंने गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में शिक्षक के रूप में युवाओं को पढ़ाना शुरू किया। वह चाहते थे कि शैक्षणिक जीवन के साथ-साथ वह अपनी कला को भी आगे बढ़ाएं, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
नौकरी छोड़ने का फैसला और बिखरा परिवार
भूपेन हजारिका की शख्सियत एक आजाद परिंदे की तरह थी, जिसे किसी पिंजरे में कैद नहीं किया जा सकता था। विश्वविद्यालय की नौकरी उनके कलात्मक स्वभाव और संगीत के प्रति असीम जुनून के आड़े आ रही थी। अपनी इसी कलात्मक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए उन्होंने जल्द ही शिक्षक की प्रतिष्ठित नौकरी से इस्तीफा (Resign) दे दिया।
नौकरी छोड़ने के बाद उनके जीवन में भारी आर्थिक मुसीबतें और उथल-पुथल शुरू हो गई। पैसों की लगातार तंगी और अनिश्चितता ने उनके पारिवारिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया। हालात इतने बिगड़े कि उनकी पत्नी प्रियम्वदा पटेल उन्हें छोड़कर चली गईं। परिवार के टूटने और अपनों के साथ छूटने का यह दर्द भूपेन दा के भीतर घर कर गया। एक ऐसा इंसान जो पूरी दुनिया को अपने सुरों से बांध रहा था, वह अपने ही घर को बचाने में असमर्थ साबित हुआ था।
संगीत को बनाया अपना हमसफर और रची अमर रचनाएं
परिवार के बिखरने और अकेलेपन के इस गहरे आघात के बाद भूपेन हजारिका ने खुद को पूरी तरह से संगीत और कला के प्रति समर्पित कर दिया। उन्होंने अपनी तन्हाई को अपनी ताकत बनाया और भारतीय सिनेमा को ऐसे नायाब तोहफे दिए, जो आज भी अमर हैं।
उन्होंने डिंपल कपाड़िया स्टारर और कल्पना लाजमी द्वारा निर्देशित फिल्म 'रुदाली' के लिए ऐसा संगीत दिया, जिसने इतिहास रच दिया। इस फिल्म का गाना 'दिल हुडूं आज फिर से...' आज भी लोगों की जुबान पर है, जिसे स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपनी जादुई आवाज से सजाया था। इसके अलावा 'साज', 'दरमियां', 'दमन' और एम.एफ. हुसैन की फिल्म 'गजगामिनी' जैसी कई अन्य सुपरहिट फिल्मों के लिए उन्होंने सदाबहार गीतों की रचना की।
एक हजार से ज्यादा गाने और साहित्य में योगदान
भूपेन हजारिका का रचनात्मक दायरा केवल फिल्मों या गानों तक सीमित नहीं था। उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में एक हजार से अधिक गानों की रचना की और उन्हें अपनी आवाज दी। संगीत के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान अतुलनीय रहा। उन्होंने अपने जीवन में लगभग 15 महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखीं, जो उनके गहरे अध्ययन और वैचारिक परिपक्वता को दर्शाती हैं।
उन्हें उनके असाधारण योगदान के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' (मरणोपरांत) सहित दादा साहब फाल्के पुरस्कार और पद्म भूषण जैसे कई प्रतिष्ठित अलंकरणों से नवाजा गया।
अंतिम समय में अकेलापन
भूपेन हजारिका को जीवन में बेशुमार शोहरत, मान-सम्मान और दुनिया भर के चाहने वाले मिले, लेकिन जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर उन्हें एक गहरे अकेलेपन ने घेर लिया था। 5 नवंबर 2011 को यह महान संगीत साधक इस नश्वर संसार को हमेशा के लिए अलविदा कह गया। आज भूपेन हजारिका हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनकी सुरीली आवाज और असम की माटी की खुशबू समेटे उनके गीत हमेशा के लिए अमर हो चुके हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सफलता की ऊंचाइयां भले ही कितनी भी बड़ी क्यों न हों, कभी-कभी इंसान अपनों के बीच भी अकेला रह जाता है।