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गुजरात में 1700 करोड़ का राजनीतिक चंदा: काले धन को सफेद करने का अनोखा खेल?

गुजरात में 1700 करोड़ का राजनीतिक चंदा: काले धन को सफेद करने का अनोखा खेल?

भारतीय लोकतंत्र की भव्यता और विशालता दुनिया भर में चर्चा का विषय रहती है। यहाँ चुनाव का महापर्व किसी त्योहार से कम नहीं होता, जिसमें करोड़ों मतदाता अपनी भागीदारी निभाते हैं। लेकिन इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर कुछ ऐसे रास्ते भी निकल आते हैं, जो बड़े-बड़े आर्थिक विशेषज्ञों और जांच एजेंसियों को भी सोच में डाल देते हैं। हाल ही में राजनीतिक फंडिंग को लेकर एक ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने देश के वित्तीय और राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। बात साल 2023-24 की वित्तीय रिपोर्टों से जुड़ी है, जहाँ गुजरात की महज छह ऐसी राजनीतिक पार्टियों को रिकॉर्ड तोड़ चंदा मिला है, जिनके नाम शायद ही आम जनता ने कभी सुने होंगे।

अदृश्य पार्टियों की तिजोरी में कैसे पहुंचा 1700 करोड़ रुपये का फंड?

सामान्य तौर पर जब हम राजनीतिक चंदे की बात करते हैं, तो हमारे जेहन में देश की बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों—जैसे सत्ताधारी दल या मुख्य विपक्षी दलों—का नाम आता है। जिनकी देशव्यापी पहुंच होती है, जिनके लाखों कार्यकर्ता होते हैं और जिनके बड़े-बड़े चुनावी कार्यालय हर शहर में दिखाई देते हैं। लेकिन वित्तीय वर्ष 2023-24 के आंकड़े कुछ ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जो किसी को भी हैरान करने के लिए काफी है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, गुजरात की छह क्षेत्रीय और कागजी कही जाने वाली पार्टियों को कुल मिलाकर 1,700 करोड़ रुपये से अधिक का चंदा मिला। हैरानी की बात यह है कि देश की पांच प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों—जिनमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसी दिग्गज पार्टियां शामिल हैं—उन सभी को मिलाकर भी इस अवधि में लगभग 1,480 करोड़ रुपये का ही डोनेशन प्राप्त हुआ। अब सवाल यह उठता है कि जिन पार्टियों का जमीन पर कोई वजूद नहीं, जिनके दफ्तरों का अता-पता नहीं और जिनके बारे में स्थानीय लोग भी शायद ही कुछ जानते हों, उनकी झोली में इतने हजार करोड़ रुपए आखिर कहां से और कैसे आ गिरे?

काले धन को सफेद करने का नया और सेफ फॉर्मूला?

वित्तीय मामलों और चुनावी सुधारों पर नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि इस तरह के मामले इस बात की ओर इशारा करते हैं कि राजनीतिक फंडिंग के नियमों में मौजूद खामियों का फायदा किस प्रकार उठाया जा रहा है। भारत के कानूनों के मुताबिक, राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर कई तरह की कर छूट (Tax Exemptions) मिलती हैं। इसी का फायदा उठाकर कई बार ऐसे संगठनों का ताना-बाना बुना जाता है जिनका मुख्य उद्देश्य चुनाव लड़ना या लोकतंत्र को मजबूत करना नहीं, बल्कि वित्तीय लेन-देन को वैध बनाना होता है।

प्रक्रिया बेहद सरल बताई जाती है: एक कागजी पार्टी बना लीजिए, निर्वाचन आयोग से उसका रजिस्ट्रेशन करवा लीजिए, इसके लिए न तो किसी बड़े कार्यालय की आवश्यकता होती है और न ही कैडर्स की। इसके बाद, काले धन या बेहिसाबी संपत्ति को चंदे के रूप में इस पार्टी के खातों में दिखाया जाता है। चूंकि राजनीतिक दलों को मिलने वाले डोनेशन पर टैक्स की छूट होती है, इसलिए वह काला धन पूरी सफाई से सफेद और वैध धन में बदल जाता है।

वे छह पार्टियां जिनके नाम से हैरान हैं सब

आइए जरा उन छह पार्टियों के नामों पर भी गौर करते हैं, जिन्होंने इस भारी-भरकम चंदे को हासिल किया है। इन पार्टियों में शामिल हैं:

  • आम जनमत पार्टी
  • सत्यवादी रक्षक पार्टी
  • स्वतंत्र अभिव्यक्ति पार्टी
  • न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी
  • भारतीय नेशनल जनता पार्टी
  • गरीब कल्याण पार्टी

इनमें से अधिकांश पार्टियों का चुनावी इतिहास बेहद कमजोर रहा है। यदि इन्होंने कभी किसी विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे भी हैं, तो उनकी जमानत तक जब्त हो गई है। इसके बावजूद इनके बैंक खातों में हजारों करोड़ रुपए का आना अपने आप में एक बड़ा शोध का विषय है।

भारत में अनियंत्रित राजनीतिक दलों की भरमार

दुनिया के अन्य परिपक्व लोकतंत्रों की यदि हम तुलना करें, तो स्थिति बिल्कुल अलग दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में मुख्य रूप से दो ही बड़ी पार्टियां हैं—डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी। इसी तरह ब्रिटेन में टोरी (क कंजर्वेटिव), लेबर और लिबरल डेमोक्रेट्स जैसी गिनी-चुनी पार्टियां ही मुख्य राजनीतिक धुरी के रूप में कार्य करती हैं। वहाँ राजनीतिक दलों के गठन और उनके संचालन के नियम बेहद कड़े हैं।

इसके विपरीत, निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में 2,800 से अधिक पंजीकृत राजनीतिक दल मौजूद हैं। इनमें से बहुसंख्यक दल केवल कागजों पर ही जीवित हैं। न तो उनका कोई जनआधार होता है और न ही वे कभी चुनावी मैदान में गंभीरता से उतरते हैं। विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग लंबे समय से यह मांग करता आ रहा है कि देश में राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन और उनकी फंडिंग की प्रक्रिया को लेकर नियमों को बेहद कड़ा किया जाना चाहिए, ताकि लोकतंत्र के इस पवित्र मंदिर का इस्तेमाल किसी भी प्रकार के वित्तीय छलावा या मनी लॉन्ड्रिंग के लिए न किया जा सके।

आगे की राह और पारदर्शिता की जरूरत

आज के दौर में जब देश डिजिटल गवर्नेंस और वित्तीय पारदर्शिता की ओर तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे मामलों का सामने आना करदाताओं और आम नागरिकों के मन में कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि राजनीतिक दलों की आय और व्यय की निगरानी के तंत्र को और अधिक पुख्ता नहीं किया गया, तो यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की मूल भावना को आहत कर सकती है।

आवश्यकता इस बात की है कि चुनाव आयोग और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियां मिलकर ऐसे मामलों की गहराई से जांच करें। केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी करने वाली पार्टियों की मान्यता रद्द की जाए और उनके चंदे के स्रोतों की एक-एक पाई का हिसाब जनता के सामने रखा जाए। जब तक चुनावी चंदे की इस व्यवस्था में पूरी तरह से पारदर्शिता नहीं लाई जाती, तब तक 'हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा आए' की तर्ज पर काले धन को सफेद करने का यह खेल किसी न किसी रूप में परवान चढ़ता रहेगा।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

Writer (स्थानीय खबरें)

रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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