बिहार की मिट्टी में कला और संस्कृति की सुगंध हमेशा से रची-बसी रही है। जब भी इस महान भूमि की बात होती है, तो बौद्ध धर्म, ज्ञान और मोक्ष की धरती गया का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। लेकिन, इसी गया जिले के भीतर एक ऐसा जादुई कोना भी मौजूद है, जिसके बारे में जानकर अच्छे-अच्छे संगीत प्रेमी भी दंग रह जाएंगे। परैया प्रखंड के अंतर्गत बसा 'ईश्वरपुर' कोई आम गांव नहीं है, बल्कि यह शास्त्रीय संगीत की एक ऐसी जीवंत प्रयोगशाला है, जहां हवाओं में भी सुर तैरते हैं।
महज 250 घरों वाले इस छोटे से गांव की पहचान पूरी दुनिया में 'संगीत के गढ़' के रूप में है। हैरानी की बात यह है कि इस छोटी सी आबादी में 300 से अधिक पेशेवर संगीतकार और गायक रहते हैं। यहां सुबह की पहली किरण किसी अलार्म की आवाज से नहीं, बल्कि तानपुरा, सितार और हारमोनियम की सुरीली धुनों के साथ होती है। सदियों पुरानी इस परंपरा ने इस गांव को वह मुकाम दिलाया है, जहां देश ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार बैठे लोग भी नतमस्तक होते हैं।
टिकारी राज के गुस्से वाले हाथी और संगीत का जादुई कनेक्शन
ईश्वरपुर गांव के इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो ऐसे-ऐसे किस्से सामने आते हैं जो किसी फिल्मी कहानी जैसे प्रतीत होते हैं। बुजुर्गों के किस्सों के मुताबिक, एक जमाना था जब टिकारी राज का साम्राज्य हुआ करता था। उस वक्त राजमहल में एक ऐसा हाथी था जो अपने गुस्से और आक्रामक स्वभाव के लिए कुख्यात था। जब वह हाथी बेकाबू हो जाता था, तो उसे काबू करना किसी के बस की बात नहीं होती थी। ऐसे में ईश्वरपुर के संगीतज्ञों की कला काम आती थी।
गांव के कलाकारों ने अपनी शास्त्रीय धुनों और गायकी के बल पर उस खूंखार और गुस्से में लाल हाथी को भी शांत करने की महारत हासिल कर रखी थी। संगीत की इस अनोखी शक्ति और हुनर से प्रभावित होकर तत्कालीन टिकारी महाराज ने इन कलाकारों को राजदरबार में विशेष सम्मान दिया। इतना ही नहीं, उनकी कला को सहेजने के लिए महाराज ने करीब 1,100 एकड़ जमीन दान में दी और यहीं से अस्तित्व में आया 'ईश्वरपुर' गांव।
तानसेन की परंपरा और संगीत के चार पट
संगीत सम्राट तानसेन की शैली से गहराई से जुड़ा यह गांव आज भी अपनी सदियों पुरानी विरासत को पूरी शिद्दत के साथ संजोए हुए है। मुगल काल के दौरान जब राजस्थान के राजघरानों में कलाकारों का प्रभाव कम होने लगा, तब इस नए संगीत युग का प्रादुर्भाव बिहार की इस उर्वरा भूमि पर हुआ।
यहां के कलाकार शास्त्रीय गायन के चारों प्रमुख पट—ध्रुपद, धमाल, ठुमरी और ख्याल—को अपनी साधना से सींचते आ रहे हैं। संगीत शिक्षक मनीष कुमार पाठक बताते हैं कि गांव की रग-रग में शास्त्रीय संगीत बसा हुआ है। बच्चों को चलना सीखने से पहले सुरों की पहचान कराई जाती है। यहां के कलाकारों को गायन के साथ-साथ तबला, हारमोनियम, सितार और पखावज जैसे कठिन वाद्य यंत्रों को बजाने में महारत हासिल है।
दिग्गज कलाकारों की जन्मस्थली
ईश्वरपुर ने देश को ऐसे-ऐसे संगीत के नगीने दिए हैं जिन्होंने पूरी दुनिया में भारत का परचम लहराया है। 'सितार-ए-हिंद' की उपाधि से सम्मानित स्वर्गीय बलिराम पाठक इसी माटी की उपज थे, जिन्हें देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सम्मानित किया था।
इसके अलावा, संगीत नाटक अकादमी से सम्मानित स्वर्गीय कामेश्वर पाठक को शास्त्रीय गायन का बेताज बादशाह माना जाता था। वर्तमान समय में प्रसिद्ध ध्रुपद गायक कृष्ण मोहन पाठक को उनकी कला के लिए देश के राष्ट्रपति द्वारा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। बलदेव उपाध्याय, तबला वादक स्वर्गीय मदन मोहन उपाध्याय, प्रसिद्ध पखावज वादक रामजी उपाध्याय, सुदिन पाठक, विख्यात ठुमरी व ख्याल गायक श्रीकांत पाठक, और विश्व प्रसिद्ध ठुमरी गायक स्वर्गीय जयराम तिवारी जैसे नामों ने इस गांव को राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान दिलाई है।
विदेशों तक गूंज रही है ईश्वरपुर की तान
इस गांव के सुरों की खुशबू अब देश की सीमाओं को लांघकर सात समंदर पार तक पहुंच चुकी है। ईश्वरपुर के पंडित अशोक पाठक आज नीदरलैंड (हालैंड) में रहकर शास्त्रीय संगीत और सितार वादन का परचम लहरा रहे हैं। वहां के लोगों को भारतीय शास्त्रीय संगीत से रूबरू कराने में उनका अहम योगदान है।
वहीं, विनय पाठक मुंबई में रहकर अपनी कला का विस्तार कर रहे हैं और नियमित रूप से अमेरिका के कई प्रतिष्ठित संगीत संस्थानों में ऑनलाइन और ऑफलाइन कक्षाएं लेते हैं। रवि शंकर उपाध्याय जैसे विद्वान संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली में प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
एक खालीपन और बदलता दौर
जिस गांव को कभी विश्वविख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर ने 'ईश्वर का गांव' कहकर पुकारा था, वहां आज वक्त के साथ कुछ बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं। आधुनिकता की दौड़ और रोजगार की अनिश्चितताओं के बीच अब नई पीढ़ी का झुकाव थोड़ा बदला है।
आज के युवा पारंपरिक संगीत के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं और आधुनिक करियर की तरफ भी तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। गांव की गलियों में जो शामें कभी अनवरत रियाज और वाद्य यंत्रों की गूंज से आबाद हुआ करती थीं, वहां अब कई बार एक गहरा सन्नाटा भी पसर जाता है। हालांकि, ईश्वरपुर के बुजुर्गों और संगीत प्रेमियों को पूरा भरोसा है कि उनकी यह सदियों पुरानी थाती कभी विलुप्त नहीं होगी, क्योंकि इस गांव के बच्चों के खून में संगीत बहता है।
ईश्वरपुर की यह कहानी केवल एक गांव की नहीं है, बल्कि यह भारत की उस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दस्तावेज है, जो आधुनिकता की आंधी में भी अपनी जड़ों से मजबूती के साथ जुड़ी हुई है।