डिजिटल युग में भी नहीं थमा है प्रिंट का असर
आज के दौर में जब हर खबर एक क्लिक पर मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध है, तब भी पारंपरिक माध्यमों की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। तकनीक चाहे जितनी आगे बढ़ जाए, लेकिन सुबह की पहली चाय के साथ अखबार के पन्ने पलटने का सुकून आज भी अलग है। हाल ही में वरिष्ठ अधिकारी डीजी बीके सिंह ने एक ऐसा ही गहरा और विचारोत्तेजक बयान दिया है, जिसने पढ़ने की संस्कृति और प्रिंट मीडिया के महत्व पर एक बार फिर से सभी का ध्यान केंद्रित किया है।
मूक मार्गदर्शक है अखबार: डीजी बीके सिंह
एक विशेष बातचीत और संबोधन के दौरान डीजी बीके सिंह ने अपने जीवन के सफर को याद करते हुए अखबारों के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन को यदि किसी सबसे बड़े माध्यम ने आकार दिया है, तो वह प्रिंट मीडिया यानी अखबार है। इसे उन्होंने 'मूक मार्गदर्शक' की संज्ञा दी। उनका यह बयान इस बात का प्रमाण है कि बिना कुछ बोले भी अखबार किस प्रकार एक व्यक्ति के व्यक्तित्व, सोच और बौद्धिक क्षमता को तराशने में अहम भूमिका निभाते हैं।
बचपन के दिनों से जुड़ी हैं यादें
डीजी बीके सिंह ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि कैसे हर सुबह अखबार का इंतजार करना और उसकी सुर्खियों को पढ़ना उनकी दिनचर्या का एक अनिवार्य हिस्सा हुआ करता था। उस दौर में सूचनाओं के स्रोत सीमित हुआ करते थे, और ऐसे में अखबार ही दुनिया की खिड़की हुआ करता था। उन्होंने साझा किया कि कैसे अखबार के संपादकीय और दुनिया भर की खबरें पढ़कर उनके भीतर जिज्ञासा, विश्लेषण करने की क्षमता और न्यायप्रियता के गुण विकसित हुए।
क्यों खास है यह बयान?
- अनुशासन और निरंतरता: हर सुबह तय समय पर अखबार का पहुंचना और उसे पढ़ने की आदत व्यक्ति में अनुशासन पैदा करती है।
- वैचारिक गहराई: सोशल मीडिया की सतही जानकारियों के उलट अखबारों में मिलने वाली विस्तृत रिपोर्टिंग वैचारिक गहराई देती है।
- भाषा पर पकड़: नियमित पठन से न केवल ज्ञान बढ़ता है, बल्कि अभिव्यक्ति और भाषा पर भी मजबूत पकड़ बनती है।
आज की पीढ़ी के लिए एक जरूरी संदेश
मौजूदा समय में जब युवा पीढ़ी तेजी से रील्स और शॉर्ट्स के माध्यम से खबरें ले रही है, तब डीजी बीके सिंह का यह बयान एक आईने की तरह है। यह हमें याद दिलाता है कि गहराई से अध्ययन करने की आदत हमारे बौद्धिक विकास के लिए कितनी जरूरी है। सतह पर तैरने वाली जानकारियां कभी भी किसी इंसान को एक मजबूत और दूरदर्शी व्यक्तित्व नहीं दे सकतीं। इसके लिए गंभीर पठन-पाठन की आवश्यकता होती है, जो आज भी केवल पुस्तकों और गुणवत्तापूर्ण समाचार पत्रों से ही संभव है।
निष्कर्ष
डिजिटल क्रान्ति अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रिंट मीडिया की खुशबू और उसकी विश्वसनीयता का कोई विकल्प नहीं हो सकता। डीजी बीके सिंह के इन शब्दों ने यह साबित कर दिया है कि हमारे जीवन के शुरुआती और संघर्षपूर्ण दौर में जो माध्यम हमारा मौन साथी बनता है, उसकी अहमियत समय बीतने के साथ और अधिक बढ़ जाती है। यह बयान उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो जीवन में कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं और अपनी सोच को परिपक्व बनाना चाहते हैं।