जल ही जीवन है, लेकिन जब इसी जल के भीतर उतरकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़े, तो व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े होना लाजिमी है। ताज़ा मामला डुबान क्षेत्रों के उन विस्थापित परिवारों से जुड़ा है, जो लंबे समय से अपने पुनर्वास और भूमि आवंटन की मांग को लेकर संघर्षरत हैं। प्रशासन के तमाम आश्वासनों के बावजूद जब ज़मीन पर कोई ठोस परिणाम नजर नहीं आया, तो प्रभावितों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। आने वाली 12 तारीख से इन प्रभावितों ने जल सत्याग्रह शुरू करने का बहुप्रतीक्षित और कड़ा निर्णय लिया है, जिसकी गूंज प्रशासनिक गलियारों में साफ सुनाई दे रही है।
आखिर क्या है पूरा मामला और क्यों उठा यह कदम?
किसी भी विकास परियोजना के नाम पर अपना घर-द्वार, खेत-खलिहान और पुरखों की ज़मीन कुर्बान कर देना किसी बड़े सदमे से कम नहीं होता। लेकिन उससे भी बड़ा दर्द होता है उस वादे का टूट जाना, जो सरकार और प्रशासन विस्थापन के वक्त इन परिवारों से करते हैं। डुबान क्षेत्र के इन निवासियों का कहना है कि उन्हें परियोजना के चलते अपनी पुश्तैनी ज़मीनों से बेदखल तो कर दिया गया, परंतु इसके बदले में जो भूमि आवंटन किया जाना था, वह आज तक कागजों से बाहर नहीं निकल पाया है।
प्रभावितों का एक प्रतिनिधिमंडल हाल ही में संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से मिला और उन्हें एक कड़ा ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन के माध्यम से साफ कर दिया गया है कि यदि तय समय सीमा के भीतर उनकी मांगों पर विचार कर व्यावहारिक कदम नहीं उठाए गए, तो वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
प्रशासन को सौंपा गया ज्ञापन और अल्टीमेटम
संघर्ष समिति के बैनर तले एकजुट हुए ग्रामीणों और प्रभावित नागरिकों ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि वे अब झूठे आश्वासनों के जाल में फंसने वाले नहीं हैं। सौंपे गए ज्ञापन में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं को उठाया गया है:
- तत्प्रभाव से योग्य डुबान प्रभावित परिवारों को कृषि और आवासीय भूमि का आवंटन किया जाए।
- पूर्व में किए गए सर्वेक्षणों में जिन पात्र परिवारों के नाम छूट गए हैं, उनका पुनः सत्यापन पारदर्शिता के साथ हो।
- भूमि अधिग्रहण अधिनियम के नियमों के तहत विस्थापितों को मिलने वाले तमाम मुआवजे और सुविधाओं का पारदर्शी वितरण सुनिश्चित हो।
- आगामी 12 तारीख से शुरू होने वाले जल सत्याग्रह के मद्देनजर किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के बजाय सकारात्मक संवाद स्थापित किया जाए।
जल सत्याग्रह: संघर्ष का एक अनूठा और अहिंसक तरीका
गांधीवादी मार्ग पर चलते हुए 'जल सत्याग्रह' हमेशा से शासन और प्रशासन का ध्यान खींचने का एक अत्यंत प्रभावी माध्यम रहा है। जब पानी लोगों के सिर के ऊपर से गुजरने लगता है, तब वे पानी में उतरकर ही अपनी आवाज बुलंद करने को मजबूर होते हैं। आगामी 12 तारीख से शुरू होने वाले इस आंदोलन को लेकर स्थानीय स्तर पर तैयारियां तेज हो चुकी हैं। विभिन्न सामाजिक संगठनों, किसान यूनियनों और स्थानीय बुद्धिजीवियों ने भी इस आंदोलन को अपना समर्थन देने का ऐलान किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के विस्थापन और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों को यदि समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो यह न केवल सामाजिक असंतोष को जन्म देता है, बल्कि क्षेत्र के विकास कार्यों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
स्थानीय प्रशासन पर बढ़ा दबाव
डुबान प्रभावितों द्वारा जल सत्याग्रह का ऐलान किए जाने के बाद से जिला प्रशासन और संबंधित विभाग के अधिकारियों की नींद उड़ी हुई है। लगातार बैठकों का दौर जारी है और यह आकलन किया जा रहा है कि किस प्रकार इस संकट को टाला जाए। हालांकि, प्रभावितों का रुख इस बार बेहद सख्त है। उनका साफ कहना है कि इस बार मौखिक आश्वासनों पर आंदोलन समाप्त नहीं होगा, बल्कि जब तक आवंटन पत्र हाथों में नहीं आ जाते, तब तक पानी से बाहर पैर नहीं रखे जाएंगे।
आगे की क्या है रूपरेखा?
आगामी 12 तारीख को होने वाले इस जल सत्याग्रह में भारी संख्या में महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं के शामिल होने की उम्मीद है। सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए स्थानीय पुलिस प्रशासन भी सतर्क हो गया है। स्थल पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाने की चर्चा है, ताकि किसी भी तरह की कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न न हो।
यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या प्रशासन 12 तारीख से पहले कोई बीच का रास्ता निकालकर इन प्रभावितों को संतुष्ट कर पाता है या फिर राज्य को एक बार फिर से एक ऐतिहासिक और कड़े जल सत्याग्रह का गवाह बनना पड़ेगा। हर किसी की निगाहें अब प्रशासनिक अमले और विस्थापितों के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।