भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत उसके जागरूक नागरिकों में निहित है, और इस जागरूकता का एक सबसे मजबूत स्तंभ हैं हमारे देश के पूर्व सैनिक (Veterans)। सीमा पर वर्दी पहनकर 'राष्ट्र प्रथम' का संकल्प निभाने वाले ये जांबाज क्या सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक मोहरा बनते जा रहे हैं? यह सवाल आज देश के सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में बेहद प्रासंगिक हो गया है।
गढ़वाल राइफल्स के पूर्व सैनिक महेंद्र पाल सिंह रावत ने इस गंभीर विषय पर एक बेहद विचारणीय और निष्पक्ष विश्लेषण प्रस्तुत किया है। उनका स्पष्ट मानना है कि पूर्व सैनिकों का अनुशासन, निष्पक्षता और नैतिक नेतृत्व ही उनकी असली ताकत है, जिसे किसी भी राजनीतिक दल के हाथों की कठपुतली नहीं बनने देना चाहिए।
सेना की असली पहचान: जाति-धर्म नहीं, कर्तव्य और अनुशासन
भारतीय सेना की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वहां किसी व्यक्ति की पहचान जाति, धर्म, भाषा या राजनीतिक विचारधारा से नहीं होती। सीमा पर तैनात सैनिक का केवल एक ही धर्म होता है—'राष्ट्र प्रथम'। यही भावना सेवानिवृत्ति के बाद भी एक पूर्व सैनिक की सबसे बड़ी पहचान होनी चाहिए।
हालांकि, लोकतंत्र हर नागरिक को राजनीति में भाग लेने और चुनाव लड़ने का संवैधानिक अधिकार देता है। पूर्व सैनिक भी किसी पार्टी से जुड़ सकते हैं, लेकिन चिंता तब खड़ी होती है जब पूरी बिरादरी की सामूहिक पहचान को किसी एक राजनीतिक ध्रुव से जोड़ दिया जाता है।
राजनीतिक ध्रुवीकरण से पूर्व सैनिकों को क्या नुकसान?
जब सैनिक संगठन या पूर्व सैनिक पूरी तरह किसी एक राजनीतिक विचारधारा के रंग में रंगे दिखते हैं, तो उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठने लगते हैं। इसके सीधे नुकसान सैनिक समाज को उठाने पड़ते हैं:
- जनहित के मुद्दों का राजनीतिकरण: शहीदों के सम्मान, पूर्व सैनिकों के अधिकार और वीर नारियों की समस्याओं को दलगत चश्मे से देखा जाने लगता है।
- प्रशासनिक उपेक्षा: भूमि विवाद, पेंशन, प्रशासनिक देरी और रोजगार से जुड़ी पूर्व सैनिकों की समस्याओं पर सरकारें उतनी संवेदनशीलता नहीं दिखातीं।
- सामूहिक प्रभाव में कमी: जब पूर्व सैनिकों की ताकत बिखरेगी, तो शासन-प्रशासन के सामने उनकी सामूहिक आवाज भी कमजोर पड़ जाएगी।
राजनीति से दूरी नहीं, राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि रखने की जरूरत
समय की मांग यह बिल्कुल नहीं है कि पूर्व सैनिक राजनीति से पूरी तरह दूर रहें। असल जरूरत इस बात की है कि वे जहां भी रहें, वहां संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और समाज की एकता को सर्वोपरि रखें।
पूर्व सैनिक केवल अतीत के योद्धा नहीं हैं; वे वर्तमान समाज की नैतिक शक्ति हैं। उनकी वाणी में अनुभव है, विचारों में अनुशासन है और जीवन में राष्ट्रसेवा का प्रमाण है।"
निष्कर्ष: विभाजन नहीं, समाधान का रास्ता
समाज पूर्व सैनिकों से यह उम्मीद करता है कि वे राजनीतिक दलों की बिसात बनने के बजाय एक निष्पक्ष नैतिक शक्ति (Moral Pressure Group) के रूप में कार्य करें। उन्हें दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर सत्य, न्याय और समाज को जोड़ने का काम करना चाहिए। आखिरकार, राष्ट्र सर्वोपरि था, है और रहेगा—और यही एक सच्चे सैनिक की पहचान है।