महाराष्ट्र का गोंदिया जिला इस समय एक गंभीर और संवेदनशील कृषि संकट के मुहाने पर खड़ा है। प्रकृति की बेरुखी और मानसून के असमान वितरण ने यहाँ के अन्नदाताओं की कमर तोड़ कर रख दी है। जिले भर से आ रही रिपोर्ट्स बताती हैं कि फसलें या तो पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं या फिर उनके उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका है। ऐसे में प्रशासन द्वारा जारी की गई हालिया सूखाग्रस्त तहसीलों की सूची ने किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है। इस सूची में जिले की केवल एक ही तहसील को सूखाग्रस्त माना गया है, जबकि बाकी की सात तहसीलें इस राहत से पूरी तरह वंचित रह गई हैं। इस फैसले के सामने आने के बाद से ही पूरे क्षेत्र में असंतोष की लहर दौड़ पड़ी है और किसान संगठनों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है.
अधूरा प्रशासनिक सर्वे और किसानों का बढ़ता आक्रोश
प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रशासनिक मशीनरी द्वारा किए गए फसल मूल्यांकन और वर्षा के आंकड़ों के आधार पर जिले की केवल तिरोड़ा तहसील को ही आधिकारिक तौर पर सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या प्रकृति का कहर सिर्फ एक ही तहसील तक सीमित रहता है? गोंदिया जिले की अन्य सातों तहसीलों—जिनमें आमगांव, गोरेगांव, सालेकुरुली, अर्जुनी मोरगांव, देवरी और खुद गोंदिया तहसील शामिल हैं—वहाँ के किसानों का कहना है कि उनकी स्थिति भी तिरोड़ा से अलग नहीं है। बारिश के अभाव में धान की रोपाई से लेकर कटाई तक के हर चरण में किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। भू-जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है और सिंचाई के पारंपरिक स्रोत भी सूख चुके हैं। ऐसे में सिर्फ एक तहसील को राहत मिलना और बाकी को नजरअंदाज करना सरासर अन्याय है.
स्थानीय किसानों और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि ज़मीनी हकीकत को दरकिनार कर केवल कागजी आंकड़ों के आधार पर यह निर्णय लिया गया है। किसानों का कहना है कि जब सूखे का असर पूरे जिले की आर्थिकी और खेतों पर साफ दिखाई दे रहा है, तो फिर प्रशासनिक आंकड़ों में यह असमानता क्यों है? इस भेदभावपूर्ण नीति के खिलाफ अब किसान खुलकर सड़कों पर आने की तैयारी कर रहे हैं.
किसानों की प्रमुख मांगें और आर्थिक संकट
धान के कटोरे के रूप में पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र के किसानों के सामने इस वक्त अस्तित्व की लड़ाई है। फसल बर्बाद होने के कारण किसानों पर बैंकों और साहूकारों का कर्ज चुकाने का भारी दबाव बन गया है। उनकी मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:
- सभी तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया जाए: जिले की बची हुई सातों तहसीलों को तुरंत सूखाग्रस्त सूची में शामिल किया जाए ताकि सभी प्रभावित किसानों को समान रूप से सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।
- तत्काल आर्थिक सहायता पैकेज: प्रत्येक प्रभावित परिवार को फौरी राहत के रूप में वित्तीय सहायता दी जाए ताकि वे अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें।
- कर्ज वसूली पर रोक और पुनर्गठन: किसानों के कृषि ऋणों की वसूली पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए और उन्हें दीर्घकालिक ऋण पुनर्गठन का लाभ दिया जाए।
- मुफ्त बिजली और खाद-बीज: आगामी सीजन की तैयारी के लिए किसानों को मुफ्त अथवा रियायती दरों पर बीज और उर्वरक उपलब्ध कराए जाएं।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं
इस मुद्दे ने अब तूल पकड़ लिया है और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता भी किसानों के समर्थन में उतरने लगे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार जानबूझकर राहत राशि और आंकड़ों में कटौती कर रही है ताकि वित्तीय बोझ को टाला जा सके। हालांकि, किसानों का कहना है कि यह राजनीति का नहीं, बल्कि उनके जीवन और भविष्य का सवाल है। यदि समय रहते सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो यह असंतोष एक बड़े जन आंदोलन का रूप ले सकता है.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले किसान यदि इस प्रकार संकट में रहेंगे, तो इसका असर पूरे क्षेत्र के व्यापार और बाजार पर पड़ना तय है। गोंदिया के ग्रामीण इलाकों में इस समय सन्नाटा पसरा हुआ है, और किसानों की निगाहें अब जिला प्रशासन और राज्य सरकार के अगले रुख पर टिकी हैं.